कमलेश्वर के जन्मदिन पर उनके विचारों पर चर्चा 

कमलेश्वर के जन्मदिन पर उनके विचारों पर चर्चा

जगदीश्वर चतुर्वेदी

कमलेश्वर ने हिंदी के माहौल पर लिखा है – “हिंदी में रिश्तों और दोस्तियों से रचना का महत्व तय नहीं होता था,बल्कि ‘रचना’ से दोस्तियों का निर्माण होता था।”

इन दिनों दिल्ली में मामला उलट गया है। अब दोस्ती से रचना मूल्य तय होता है। नकली प्रशंसाएं छपती हैं। फेसबुक और बाजार ऐसी रचनाओं और उनकी प्रशंसाओं से भरा पड़ा है। हिंदी लेखकों में फ़िल्म जगत को हेय दृष्टि से देखने वालों की संख्या बहुत है। इस पर कमलेश्वर ने लिखा – ” फिल्मों और फिल्मी लेखन को मैंने कभी हेय दृष्टि से नहीं देखा। मैं मानता था और मानता हूँ कि अपनी 70 प्रतिशत निरक्षर आबादी तक पहुँचने का माध्यम टेलीविजन,रेडियो और फिल्में ही हैं। मेरे साहित्यकार साथी अपनी जिद के कारण इन माध्यमों की उपेक्षा बड़ी लालची मानसिकता से करते रहे हैं। वे इन संचार माध्यमों से सघन अवैध रिश्ता तो चाहते रहे हैं ,परन्तु वैध रिश्ता बनाने से दूर भागते रहे हैं। उनमें इतना साहस ही नहीं कि वे इस रिश्ते को मंजूर कर सकें।” हिन्दी लेखकों का अभी यह रवैय्या बरकरार है।

कमलेश्वर ने अपने जीवन के सबसे कठिन क्षणों का वर्णन करते हुए कैसर साहब का एक शेर उद्धृत किया है। शेर है- हम अपनी जिंदगी को कहाँ तक सँभालते। इस कीमती किताब का कागज़ खराब था।।

कमलेश्वर के औरतों के बारे में लिखे विचार बहुत महत्वपूर्ण हैं, उन्होंने लिखा, “यह एक अत्यन्त क्रूर सत्य है कि आदमी कभी भी औरत को उसके आहत अतीत से बाहर नहीं आने देता। आदमी उदार और आधुनिक होने का मुखौटा ज़रूर लगाये रहता है परंतु जब उसकी कुण्ठा ग्रँथियाँ जाग्रत होती हैं तो वह हमेशा औरत को उसके अतीत में अपमानित करता है।”

कमलेश्वर ने यह भी लिखा है- ” किसी औरत के व्यक्तिगत और जीवनगत रहस्यों को जानना बहुत खतरनाक साबित होता है। वह दुनिया को माफ कर देती है पर उसे नहीं जो उसके रहस्य जानता है। रहस्य जानने वाला मित्र उस औरत का सतत अमित्र बन जाता है।”

कमलेश्वर ने साहित्य और लेखक पर भारत विभाजन के असर के बारे में लिखा है – “विभाजन मात्र एक मानवीय कत्ले-आम का भयावह दौर नहीं था, इसने मनुष्य की आंतरिक दुनिया को भी बदल दिया था। निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों से आने वाले लेखकों-कवियों के भीतर की दैहिक जड़ता टूट रही थी। उनके सौंदर्य के प्रतिमान बदल रहे थे । जिंदगी कुछ ज्यादा ही मांसल हो रही थी और दैहिक नैतिकता और संबंधों के शाश्वत आवेग परिवर्तित हो रहे थे। इस दौर के लोग घर-परिवार की अदृश्य बेड़ियों से अभी भी बंधे थे,पर उनके मन की सर्प-गाँठ खुल चुकी थी।” फेसबुक वॉल से साभार

लेखक -जगदीश्वर चतुर्वेदी

 

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