मनजीत सिंह की हरियाणवी रागनी- हाय रे सर्दी! हाय रे सर्दी!
आओ रे लोगो, ध्यान लगाओ, सुन लो मेरी बात,
सर्दी का टेम आवै सै, सब गर्म कपड़ा में हो दुभात।
सर्दी आवै, ठंड सतावै, बाहर मारै कोहरा,
कपड़े लपेटे फिरैं सैं, गाम-गाम का छोरा।
कुण सै कुण, ना पहचान, मुँह ढक्यां सैं सारे,
देखण आला भी बोले—राम राम जी म्हारे।
हाय रे सर्दी! हाय रे सर्दी!
सब नै घणी सुहाय रे सर्दी!
खरीफ कटगी, रबी बोई, हर्षायां सैं खेत,
किसानां की मेहनत देखो, सोना उगलैं मेड़।
बागां में फूल मुस्कावैं, जंगल बोलै तान,
धरती मैया सज-धज कै, लागै दुल्हन समान।
हाय रे सर्दी! हाय रे सर्दी!
सब नै घणी सुहाय रे सर्दी!
ऊनी कुरते, ऊन की टोपी, गलां में सै लोई,
सीमा पै जो सिपाही खड़ा, उसनै ठंड ना होई।
रात-दिन जागै देश खातर, सीना ताण कै खड़ा,
ऐसे वीरां खातर म्हारी, सीना सीधा गर्व सै भरा।
हाय रे सर्दी! हाय रे सर्दी!
वीरां नै भी रास आय रे सर्दी!
अलाव जळै चौकां में, हाथ तापैं लोग,
आग देख कै भूल जावैं, सारे दुख-रोग।
हल्की धूप नै देख कै, मन हो जावै खुश,
रजाई-कंबल छोड़ण नै, कोई भी ना होश।
ओस टपकै, कोहरा छावै, धरती भी जावै भीज,
नीला गगन भी लाज सै, ओढ़ै धुंध की चादर चीज।
मक्के की रोटी, सरसों का साग, माखण संग खाय,
गरम पानी ना मिलै तो, हफ्त्यां नहाण भूल जाय।
हाय रे सर्दी! हाय रे सर्दी!
खाण-पाण में मौज कराय रे सर्दी!
पतझड़ आवै, पात झरैं, कोंपल लेवै को अंगड़ाई,
बसंत नै देकै न्योता, सर्दी बोली—अब जाई।
पेट की आग बढ़ै सै जी, शक्करपारे खाणे लागैं प्यारे,
खुशी में उड़ैं सैं अरमान, खुले पड़े भाग म्हारे।
हाय रे सर्दी! हाय रे सर्दी!
खाण-पाण में मौज कराय रे सर्दी!
अदरक वाली चाय बनै, संग पकोड़ा तला,
मिर्ची भजिया, चटणी सै, मज़ा दुगणा फला।
कहै मनजीत रागनी आखरी बात, ध्यान धर लो भाई,
सर्दी का टेम सै जी लाग्ये सब नै घणा भाई!
हाय रे सर्दी! हाय रे सर्दी!
खाण-पाण में मौज कराय रे सर्दी!
