थरूर-दिग्विजय पर क्षण भर

थरूर-दिग्विजय पर क्षण भर

अरुण माहेश्वरी

कांग्रेस में शशि थरूर के बाद अब दिग्विजय सिंह । वैसे ही जैसे पहले सिंधिया और कई दूसरे रईसजादे !

राजनीति में कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से जनतंत्र का सत्य रही है और बीजेपी सांप्रदायिक फासीवाद का असत्य ।

मानव प्रमाता का सत्य सभ्यता की ओर प्रगति से जुड़ा है और मनुष्य में असभ्यता की ओर पश्चगामिता असत्य का सूचक है ।

प्रमाता (subject) सत्य का धारक, परिवर्तन का वाहक होता है । इसके विपरीत जड़ मनुष्य यथास्थिति या पश्चगामिता की द्योतक । यही राजनीति के सत्य-असत्य का पैमाना है।

भारत के प्राचीन दार्शनिक अभिनवगुप्त से लेकर पश्चिम के अधुनातन ऐलेन बाद्यू तक की दार्शनिक दृष्टि में सत्य को प्रक्रियात्मक माना गया है जो मानव के प्रमातृत्व (subjectivity) से व्यक्त होता है ।

पर हमें कई बार सत्य ही नहीं, असत्य भी प्रक्रियात्मक दिखाई देता है ।

जैसे आज दिग्विजय या थरूर जैसे लोग आज आरएसएस-भाजपा के संगठन और थोथी लफ्फाजियों से प्रभावित हैं, कभी उसी प्रकार आरएसएस ने गांधी जी को अपने शिविर में ले जाकर उन्हें अपने संगठन और अनुशासन से सम्मोहित करने की कोशिश की थी ।

पर गांधी जी ने उन्हें प्रमाता मानने से साफ इंकार कर दिया । उनके शिविर में ही गांधी जी का दो टूक कथन था – संगठन और अनुशासन तो हिटलर और मुसोलिनी का भी है । तब क्या उन्हें सत्य मान लें ।

हम जानते हैं कि कैसे जर्मनी की अपेक्षाकृत चेतना संपन्न जनता को हिटलर ने बोधशून्य, कर्तव्यनिष्ठ हत्यारों में बदल दिया था । वह भी हमारे जीवन की एक घटना ही थी जो मानव चेतना के स्तर पर प्रक्रियात्मक भी थी । जर्मनी के बड़ी संख्या में चेतना-संपन्न लोग भी सुप्रहम के आदेश की संरचना में प्रमाता न रहकर सुप्रहम के वाहक बन गए।

इसीलिए हर घटना समान अर्थ में ‘प्रक्रियात्मक’ नहीं होती । स्थिति के दबाव, भय, पहचान और सत्ता-संरचना से उत्पन्न प्रक्रिया मुक्तिकामी मानव सत्य के विपरीत असत्य की सूचक होती है, जिसे अभिनवगुप्त ने चेतना का ‘संकुचन’, ‘आवरण’ कहा था। प्रक्रिया मात्र सत्य की गारंटी नहीं है ।

बाद्यू जैसे ‘घटना’ (event) को मुक्तिदायी, समावेशी और समानतापूर्ण मानते हैं, हमें उसके समानांतर असत्य पर टिकी छद्म-घटना की भी एक प्रक्रिया नजर आती है, जो यथास्थिति को बल पहुंचाती है, अन्य के अस्तित्व से इंकार करती है और मनुष्य को हत्यारों तक में बदल देती है ।

इसीलिये प्रमात्रीकरण (subjectivization) हमेशा नैतिक दिशा में नहीं होता । हर निष्ठा सत्य-निष्ठा नहीं होती । हर प्रक्रिया मुक्तिदायी नहीं होती, बल्कि कभी-कभी पूरी तरह से पतनशील भी होती है ।

सत्य और असत्य दोनों प्रक्रियात्मक हैं । अंतर उनके परिणाम में नहीं, बल्कि उनके आंतरिक नैतिक-संरचनात्मक स्रोत में है । कानून और मानव स्वभाव के विपरीत, superego (सुप्रमहम) के आदेश के तहत प्रमात्रीकरण असत्य की प्रक्रिया कहलायेगा ।

इसे लकानियन जुएसॉंस का प्रमात्रीकरण भी कह सकते हैं ।

सत्ता की कभी न तृप्त होने वाली लालसा, जैसी अभी थरूर, दिग्विजय में दिख रही है, उसी जुएसॉंस का एक लक्षण है । ऐसे लोग प्रमाता नहीं, शुद्ध सुप्रहम के वाहक होते हैं ।

अब या तो थरूर, दिग्विजय अपनी लिप्साओं के असत्य से निकलें, असत्य की संरचनाओं के प्रभाव से मुक्त हों या पागलों की तरह सत्ता पाने सरे-बाजार, कपड़े फाड़ कर घूमें, असत्य के गंदे नाले में सड़ें । सत्य और असत्य की दो नावों की एक साथ सवारी ज्यादा दूर तक संभव नहीं है ।

यह निर्णय अंतिम नहीं, पर चेतावनी अवश्य है क्योंकि इतिहास ने दिखाया है कि सुप्रहम से चालित प्रक्रिया से वापसी हमेशा संभव नहीं होती । वह मृत्युमुखी-छलांग (death drive) में ही बदला करती है । यह चेतावनी किसी राजनीतिक समतुल्यता की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सत्य की रक्षा की है जिसके कारण कांग्रेस और भाजपा एक ही धरातल पर खड़े नहीं हो सकते।

अरुण माहेश्वरी हिंदी के वरिष्ठ समालोचक, राजनीतिक चिंतक हैं।

लेखक – अरुण माहेश्वरी

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