हरियाणाः जूझते जुझारू लोग
लम्बी लड़ाई के योद्धा – राजबीर बेरवाल
सत्यपाल सिवाच
आप दशकों से एक शख्स को जानते हैं ; पहचानते हैं और आपकी नजरों में उनका व्यक्तित्व निरंतर जगह बनाए रखता है, ऐसे लोग समाज में हैसियत रखते हैं। राजबीर बेरवाल मेरे लिए कुछ ऐसे ही हैं। उनका जन्म 18 मई 1964 में गांव माजरा, तहसील नारनौंद, जिला हिसार में अमरसिंह और श्रीमती भरपाई देवी के यहाँ हुआ था। उन्हें तीसरी व चौथी कक्षा में गुरुकुल में भेजा गया, फिर नौवीं तक नारनौंद के सरकारी स्कूल में पढ़े। सन् 1980 में दसवीं कक्षा एस.डी. हाई स्कूल जीन्द से उत्तीर्ण की। सन् 1982 डी.एन. कॉलेज हिसार से प्री-मेडिकल करके रोहतक मेडिकल कॉलेज से ऑप्थेल्मिक में दो वर्षीय डिप्लोमा किया। नौकरी में आने के बाद उन्होंने ऑप्टोमिट्री में मास्टर डिग्री और एम.ए. पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई की।
22 जून 1985 को उन्हें तदर्थ आधार पर स्वास्थ्य विभाग में ऑप्थेल्मिक एसिस्टेंट पद पर नौकरी मिली। इसके पश्चात 30 सितंबर 1988 को दो वर्ष के आधार पर सेवाएं नियमित हो गईं। वे 31 मई 2022 को चीफ ऑप्थेल्मिक ऑफिसर पद से सेवानिवृत्त हुए।
राजबीर बेरवाल हिसार के बरवाला में रहते हुए यूनियन में रुचि लेने लगे थे। सन् 1987 में जीन्द में आए और फिर झोझूकलां व बड़ागुढ़ा (सिरसा) में रहे। उन दिनों स्वास्थ्य विभाग में हरफूल सिंह भट्टी चर्चित नेताओं में थे। जब राजबीर बेरवाल इनके संपर्क में आए तो पहले से अधिक सक्रिय होकर काम करने लगे। ऑप्थेल्मिक एसोसिएशन को पंजीकृत करवाया गया और वे लगातार इसके महासचिव रहे।
बाद में कुछ अन्य साथियों से मिलकर किए गए प्रयासों से देश के स्तर पर नेशनल ऑप्थेल्मिक एसोसिएशन गठित हुई। बेरवाल उसके भी महासचिव रहे। वे सर्वकर्मचारी संघ जिला जीन्द के अध्यक्ष थे तो उस समय स्थानीय मामले पर आन्दोलन चलाया। उस समय महीनों लम्बी लड़ाई के बाद जीन्द को ए-श्रेणी तथा सफीदों व नरवाना को बी-श्रेणी शहरों का दर्जा दिलवाने में सफलता मिली। इससे हजारों कर्मचारी-अधिकारी लाभान्वित हुए।
राजबीर बेरवाल बहुत बार सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा की केन्द्रीय कमेटी में पदाधिकारी रहे। वे उन गिनती के नेताओं में शामिल रहे जिन्हें राज्य भर में कहीं भी भेजा जा सकता था। उन्हें सन् 1993, 1997, 2005, 2010, 2013, 2016 और 2019 में संघ का ऑडिटर तथा 2001 में प्रैस सचिव चुना गया।
वे आन्दोलनों में स्वयं को झोंक देने के आदी हैं। इसी विशेषता के कारण प्रशासन की आँखों में खटकते रहे हैं। वे पहली बार 1989 में रोडवेज बस स्टैंड से गिरफ्तार हुए। इसके बाद उन्हें 1993 की हड़ताल के दौरान भी गिरफ्तार किया गया और धारा 311(2) ए.बी.सी. के तहत बर्खास्त किया गया। सन् 1998 के नर्सिंग आन्दोलन में वे 15 दिन जेल में रहे। उसी आन्दोलन के दौरान दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में दर्ज मुकदमे में उन्हें अन्य साथियों के साथ बारह साल तारीखें भुगतनी पड़ी। अन्ततः वह मामला खारिज करवाने में सफलता मिली। जब 1998 में संघ की केन्द्रीय कमेटी को गिरफ्तार किया गया तब भी वे चार दिन हिसार जेल में रहे।
राजबीर बेरवाल अपने स्वभाव से ही समाज सेवक हैं। उन्होंने वर्षों तक सिविल अस्पताल जीन्द में सेवाएं देते हुए अपने काम में प्रतिष्ठा हासिल की, बल्कि अपनी सीमाओं से बाहर जाकर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के लिए संघर्ष भी किया। अपने सेवाकाल के अंतिम दौर में उन्हें सिविल सर्जन जीन्द की करतूतों को रोकने के लिए नुकसान भी उठाना पड़ा। समझौताहीन ढंग से संघर्ष जारी रखने के कारण उन्हें साजिश के तहत चार्जशीट किया गया; निलंबित किया गया और अन्ततः दो साल के लिए उनकी पेंशन में दस प्रतिशत कटौती की सजा सुनाई गई, जिसके खिलाफ अपील विचाराधीन है। बेरवाल को इस आर्थिक नुकसान के लिए भी पछतावा नहीं है। उनका मानना है कि न्याय और सच्चाई मुफ्त नहीं मिलती, कुछ मूल्य देना पड़ता है। उन्हें गर्व है कि वे गलत बात के आगे नहीं झुके।
निजी स्तर पर उन्होंने अपना समय आँखों के नि:शुल्क शिविर लगाने में समर्पित किया है। वे वर्षों से उत्तरप्रदेश के एक आश्रम में कैम्प में जाते रहे हैं। जनसंगठनों या किसी संस्था द्वारा आयोजित कैम्पों में वे जाते हैं। किसान आन्दोलन के दौर भी उन्होंने स्वास्थ्य सेवा की दृष्टि से अच्छा योगदान दिया। संगठनों के सम्मेलनों में भी वे स्वास्थ्य विभाग के अन्य साथियों को लेकर उपलब्ध रहे हैं। वे अपने पेशे के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। सन् 2010 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुई “वर्ल्ड कांग्रेस ऑन रिफ्रेक्टिव अरर” में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पेपर प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
वर्ष 2015 में अमेरिकन अकेडमी ऑफ ऑप्टोमिट्री द्वारा यूएस के Neworleans में हुए अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन “बेस्ट ऑप्टोमेट्रिस्ट” अवार्ड से नवाजा गया। एक सामान्य कर्मचारी के लिए इतने उच्च स्तर तक पहुंचना बहुत असामान्य बात है। मोतीलाल स्कूल में लड़कियों के साथ हुए अत्याचार के मामले में, पेगा गांव में पटवारी की हत्या के मामले में और जहाँ कहीं भी अत्याचार हुआ सब मामलों में न्याय के पक्ष में उनकी अग्रणी उपस्थिति रही है।
राजबीर प्रगतिशील और जनतांत्रिक विचारों के व्यक्ति हैं। वे हरफूल सिंह भट्टी के प्रभाव से मार्क्सवाद के विचारों से प्रभावित हुए और जीवन भर के लिए अग्रगामी, न्यायसंगत और समानता के दर्शन को अंगीकार कर लिया। वे बहुत मिलनसार और सहयोगी स्वभाव के हैं। आप रात को भी कुछ काम उनके जिम्मे लगाएंगे तो वे हाजिर होने की चेष्टा करते हैं। इसलिए उन पर हर कोई भरोसा कर पाता है। (सौजन्य:ओम सिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच
