जींद में जलेस ने आयोजित की विचार गोष्ठी एवं काव्य पाठ
जींद। रविवार , आज स्थानीय अक्षर भवन शिव कालोनी में जनवादी लेखक संघ जींद की ओर से काव्य गोष्ठी एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता जिलाध्यक्ष राममेहर सिंह खर्ब ‘कमेरा’ ने की तथा संचालन जिला सचिव मंगतराम शास्त्री ने किया। गोष्ठी में विक्रम राही, सुनील सीना, प्रवेश कुमार, राजेश भेंट, कर्मजीत ढुल, अनिल कुण्डू, आजाद सिंह, अंकित, रामफल दहिया, गुलाब सिंह व डॉ शमशेर सिंह ने भाग लिया।
गोष्ठी में “युद्ध के खिलाफ और शान्ति के लिए लेखन” विषय पर मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए डॉ शमशेर ने कहा कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं होता बल्कि मंहगाई, भूखमरी, बेरोजगारी, औरतों और बच्चों पर ज़ुल्म, आर्थिक मंदी व राजनीतिक अस्थिरता जैसी अनेक समस्याओं को पैदा कर देता है।आज हर संवेदनशील लेखक के लिए युद्ध के खिलाफ और शान्ति के लिए लिखना अति अनिवार्य हो गया है। उन्होंने कहा कि जहां भी दूसरे की अवधारणा हावी होती है वहीं अपनत्व का भाव खत्म हो जाता है। रामफल दहिया ने कहा कि सभी लेखकों व कलाकारों को चाहिए कि वे अपने हुनर से प्यार-मुहब्बत और मनुष्यता के लिए काम करें और युद्ध के खिलाफ लिखें।
इस अवसर पर कविता गोष्ठी में उपस्थित कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ भी किया।
मंगतराम शास्त्री ने पढ़ा:-
“अमरीका इजरायल नै इसे कर दिये हाल जमान्ने म्हं।
बडी लोमड़ी बड़ गी हो जणों जगती मुरगीखान्ने म्हं।।
दुनिया म्हं तै अमन -चैन होत्ता बरबाद दिखाई दे
तान्नाशाही गुण्डागरदी का फैल्या उन्माद दिखाई दे
नये ढाल़ का नाजीवाद और फासीवाद दिखाई दे
दुनिया पै कब्जा करता साम्राज्यवाद दिखाई दे
कोए बुझावणिया ना दिक्खै आग लगी असमान्ने म्हं।”
विक्रम राही ने सामाजिक विघटन को संबोधित करते हुए रागनी में कहा:-
“तुम रोज ताण ल्यो कट्टे पिस्टल,जेल़ी और तलवारां नै
या हांग्गे आल़ी जिद ले बैट्ठी,बहोत घणे परिवारां नै।।”
सुनील सैनी ‘सीना’ ने प्रेम की राही को आग पर चलने जैसा बताते हुए कहा:-
“प्यार करणा इतना भी आसान कोन्या
आग पै चलणे का करतब दिखा ले गा के?
मैं कोन्या फुक्कूं चुल्हे म्हं फुकणी तै
न्यूं बता गैस सिलेंडर भरवा ले गा के?”
प्रवेश कुमार ने युद्ध की विभीषिका को अपनी कविता में कुछ यूं दर्शाया:-
“बंधू ! युद्ध को जानो
जानो तुम फिलिस्तानियों की वो दास्तान
जिस युद्ध के गुबार से उड़ गई
एक देश की बेबस आवाम।।”
राजेश भेंट ने धन्ना भगत के किस्से से उस मौके की रागनी सुणाई जब साधू के भेष में श्री कृष्ण कहता है:-
“तनै दे रया बीज मैं बड़े काम के जा खेत म्हं छांट लिये।
या तौल़ी हो ज्या त्यार फसल चाहे म्हीन्ने भीत्तर काट लिये।।”
आजाद सिंह ने शासकों के अहंकार को धिक्कारते हुए कविता पढ़ी:-
“वक्त के हाथों मुकद्दर के सिकंदर पिट गये
तेरी क्या औकात शहंशाहों के शहंशाह मिट गये।”
कर्मजीत ढुल ने कहा कि युद्ध में नेताओं के बच्चे जाने लगें तो उन्हें पता चले कि युद्ध कितना घातक होता है। उन्होंने अपनी कविता में कहा:-
“संसार में हर प्राणी की जान की बराबर कीमत होनी चाहिए
जो हो इंसानियत के खिलाफ उसे गलत कहने की हिम्मत होनी चाहिए।”
अनिल कुण्डू ने तरन्नुम में कविता पढ़ी, उसके कुछ बोल देखियेगा:-
“सौ सौ पड़ी मुसीबत देक्खो आग लगी मैदान में
बारूदों की बू उठ्ठै सै आज सारे जहान में।”
गुलाब सिंह ने अपनी कविता में कुछ यूं व्यंग्य पढ़ा :-
“लोकतंत्र की आशा लिख दे।
देती रोज दिलाशा लिख दे।।”
गोष्ठी के अध्यक्ष राममेहर सिंह खर्ब ‘कमेरा’ ने दोहे पढ़े। एक बानगी देखिए:-
“फांसी पर आंसू चढ़े,सूली पर सद्भाव
मानवता को मारना, सत्ता का स्वभाव।”
अंत में आगामी 21 मार्च को कविता दिवस के रूप में मनाने के फैसले के साथ गोष्ठी का समापन हुआ।
रिपोर्ट और शास्त्री
जिला सचिव जनवादी लेखक संघ जींद।
