कर्मचारी आन्दोलन से निकले जागरूक नागरिक व योद्धा – ओमप्रकाश

हरियाणा : जूझते जुझारू लोग – 161

कर्मचारी आन्दोलन से निकले जागरूक नागरिक व योद्धा – ओमप्रकाश

सत्यपाल सिवाच

बिजली कर्मचारी आन्दोलन के मंच से सर्वकर्मचारी संघ, किसान सभा और अन्य नागरिक मंचों पर दशकों तक सक्रिय रहे कामरेड प्रकाश (ओमप्रकाश) स्वभाव से ही गतिशील और ऊर्जावान व्यक्ति रहे हैं। उन्होंने जहाँ भी काम किया वहीं अलग पहचान बनाने में सफलता प्राप्त की। उसका मुख्य कारण उनका हर मौके पर जरूरत के अनुरूप तत्काल पहल और हस्तक्षेप करना रहा है। वे संघर्ष के समय जुझारू हस्तक्षेप के अलावा निजी स्तर पर भी अपने साथियों की मदद के लिए उपलब्ध रहे हैं। इसीलिए सभी मिलने वालों से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध बन जाता था।

उनका जन्म रिकॉर्ड के अनुसार 06.05.1947 को गाँव सैमाण में श्रीमती भरपाई और श्री हजारीलाल के घर किसान परिवार में हुआ। उनके पिता जी गाँव-गुहांड में बहुत समझदार, भरोसेमंद, टिकाऊ और व्यावहारिक शख्सियत के अलावा सहयोगी प्रकृति के लिए प्रसिद्ध थे। उनके स्वाभाविक गुण सहज ढंग से पुत्र को भी प्राप्त हो गए। वे 5 भाई-बहन हैं। चारों बहनें उनसे बड़ी हैं।

कामरेड प्रकाश ने आईटीआई और दस कक्षा उत्तीर्ण की थी। पहले आईटीआई की और फिर दसवीं। बिजली बोर्ड में आने से पहले वे नवभारत फैक्ट्री में नौकरी करने लगे, लेकिन आन्दोलन के दौरान उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। वे सन् 1970 में एएलएम के रूप में डेलिवेजिज पर बिजली बोर्ड में आए थे। उन्होंने पाँच वर्ष पहले 31.05.2000 को फोरमैन पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।

ओमप्रकाश के दिल में न्याय, अधिकार और समानता के लिए स्वाभाविक लगाव था। इसलिए वे 1973 के आन्दोलन के समय से संघर्ष व संगठन से जुड़ गए थे। वे हड़ताल में शामिल हुए और जेल में गए। जब सन् 1981 में जनतांत्रिक कार्यप्रणाली को लेकर संघर्ष शुरू हुआ तो वे प्रेमसागर शर्मा व बनवारीलाल बिश्नोई के नेतृत्व वाले संगठन का हिस्सा बने। उन्होंने प्रगतिशील विचार के साथ जुड़कर महम और रोहतक में अच्छी भूमिका अदा की।

उन दिनों स्थापित नेता नए उभरते कार्यकर्ताओं को डरा-धमकाकर भगा देना चाहते थे। यह सन् 1988-89 की बात है। तब यूनियन बनाना इतना आसान न था। रामगोविंद हुड्डा, जयसिंह, रणबीर देसवाल, राजपाल सिक्का आदि अनेक नेताओं के साथ मिलकर संगठन का निर्माण किया। उसी दौर में देवेन्द्र सिंह हुड्डा के सोहना से रोहतक आने के बाद गुंडागर्दी से संगठन चलाने वालों को पछाड़ना संभव हो पाया।

देवेन्द्र हुड्डा के आक्रामक तेवरों को देखकर कुछ पुराने साथियों को लगता था कि कहीं अनावश्यक झगड़ों में फंस जाएं, लेकिन ओमप्रकाश इस विचार के प्रबल व पक्के समर्थक थे कि यदि गुण्डागर्दी को सींगों से नहीं पकड़ा तो हमारे संगठन को जगह नहीं मिलेगी।

जब 1986-87 में सर्वकर्मचारी संघ के बैनर तले आन्दोलन शुरू हुआ तो रोहतक जिला नए उभार का साक्षी बना। ओमप्रकाश ने महम क्षेत्र में संघर्ष और संगठन का नेतृत्व किया। वे इस आन्दोलन में चण्डीगढ़ की बुड़ेल जेल में रहे और सोलह दिन बाद छूटे। इससे पहले वे 1973 में दिल्ली की तिहाड़ जेल में रह चुके थे। दिनांक 03.05.1987 को बोट क्लब पर हुई रैली के समय पुलिस के साथ हुई भिड़ंत में भी वे अग्रणी थे। उन्हें 1989 में रोडवेज की हड़ताल के समय बस स्टैंड से हिरासत में लिया गया था। सन् 1973 से 2000 में रिटायरमेंट लेने तक ऐसा कोई आन्दोलन नहीं रहा जिसमें उनकी हिस्सेदारी न रही हो। उन्हें 1993 में सेवा से बर्खास्त किया गया था जो आदेश समझौते के बाद निष्प्रभावी हुआ। पालिका आन्दोलन, नर्सिंग आन्दोलन और समस्त अखिल भारतीय हड़तालों में अग्रणी रहे।

जब वे लाइनमैन से फोरमैन पदोन्नत होकर उचाना में स्थानांतरित हुए तो वहाँ दूसरी यूनियन का प्रभाव अधिक था। उन्होंने सहज स्वभाव और धैर्य से काम लेते हुए स्थानीय कार्यकर्ताओं को जोड़ा। सुरेश राठी व धर्मवीर शर्मा जैसे जागरूक युवा मिलने के बाद वहाँ यूनियन का दबदबा बढ़ाने में मदद मिली।

सन् 1991 में जब साक्षरता आन्दोलन चला तो वे पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में इस अभियान में जुटे। उन्होंने महम ब्लॉक में को-ऑर्डिनेटर के रूप में काम किया। यह नए ढंग का समाज सुधार आन्दोलन था जिसमें अक्षर ज्ञान के साथ आम जागरूकता का लक्ष्य तय किया और उसे सफलतापूर्वक लागू किया गया। वे नौकरी के दौरान भी और बाद में भी किसानों व दूसरे जनसंगठनों के आन्दोलन में सक्रिय रहते थे। गाँव के स्तर पर समाज सुधार व सामुदायिक कार्यों में भी उनकी भागीदारी रहती। अंधविश्वास के खिलाफ वे साहसिक ढंग से पेश आते। वे उपदेशक की तरह नहीं, बल्कि कर्ता की तरह मैदान में रहते। गाँव में नौकरी करते समय वे बिजली कर्मचारी के रूप में कभी निशाने पर नहीं आए, क्योंकि वे बाहर भी होते तो आते ही शिकायतों का निपटारा करते।

कामरेड एक प्रगतिशील किसान थे। एच ए यू कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में खेती करते और अच्छी फसलें उगाते। उन्हें सन् 2008 में जिले में सर्वश्रेष्ठ किसान के रूप में सम्मानित किया गया था और इसके लिए पच्चीस हजार रुपए ईनाम दिया गया। घरेलू और सामूहिक कार्य दोनों को तालमेल से करने का उनमें अच्छा हुनर था। इसी के चलते वे भविष्य के लिए जमीन, पैट्रोल पंप आदि संसाधन जुटाने में सफल रहे। मेरे लिए तो संघर्ष के साथी बढ़कर अभिभावक की तरह रहे। जब भी जरूरत पड़ती अवश्य मदद करते। कभी मदद देने का अहसान नहीं दिखाते थे।

क्योंकि वे सामाजिक जनजीवन में सक्रिय रहते थे, उसके चलते इलाके राजनीतिक व्यक्तियों में उनकी पहचान थी। अपने परिवार व बच्चों के लिए तो सिफारिश नहीं लगवा पाए लेकिन दूसरों की मदद के लिए किसी के पास जाने में नहीं झिझकते थे। वे सामाजिक स्तर पर आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए पंचायतों में जाते थे। वे हमेशा सत्य के पक्ष में और आपसी संवाद से सकारात्मक हल निकालने के पक्ष में रहते थे। समाज में मौजूद ऊँच-नीच पर आधारित जातिवादी ढांचे में वे गरीब लोगों के पक्षधर बनकर सामने आते।

ओमप्रकाश का विवाह श्रीमती राजरती के साथ हुआ। इनकी तीन संतान हुई। बेटी सुनीता ने बी.एससी. होमसाइंस, एम ए सोशियोलॉजी और बी.एड. तक शिक्षा हासिल की। उन्होंने अपना स्कूल चलाया। सुनीता की असमय बीमारी के चलते मृत्यु हो गई। दामाद जितेन्द्र खत्री रिटायर्ड जिला शिक्षा अधिकारी हैं। बड़ा बेटे हितेन्द्र सिंह ने एम ए, बी.एड. और एल.एल.बी. की है। वे गाँव में पैट्रोल पंप व दूसरा कारोबार संभालते हैं। उन्हें दादा हजारी व पिता जी की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उपयुक्त वारिस कह सकते हैं। छोटा बेटा जितेन्द्र सिंह दस+दो तक पढ़ा है। वे खेती व दूसरे काम को संभालने में मदद करते हैं। किसान आन्दोलन के दौरान उन्होंने अच्छी भूमिका निभाते हुए कामरेड ओमप्रकाश के मिशन को आगे बढ़ाया। दोनों भाइयों का संयुक्त परिवार गाँव में ही है। सौजन्य -ओमसिंह अशफ़ाक

लेखक – सत्यपाल सिवाच

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