अंबाला के साहित्यकारों ने देश के वर्तमान हालात पर गहरी चिंता व्यक्त की
- बिलासपुर में कहानीकार मनोज रूपड़ा के साथ विश्वविद्यालय के कुलपति के व्यवहार की भर्त्सना की
- साहित्यकारों ने कहा, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी कम खरतनाक नहीं
- ज्ञानरंजन, विनोद कुमार शुक्ल, अंग्रेज सिंह अलेवा और रामधारी सिंह खटकड़ के निधन पर जताया शोक
- जलेस और प्रलेस अंबाला का संयुक्त आयोजन
अंबाला। अंबाला छावनी के गांव नन्हेड़ा स्थित प्रोफेसर गुरुदेव सिंह देव के निवास पर आयोजित विचार गोष्ठी और कविता-पाठ केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि समय, समाज और सत्ता के बीच चल रहे जटिल संवाद को समझने का एक गंभीर बौद्धिक प्रयत्न रहा। जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ की अंबाला इकाई द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. सुदर्शन गासो ने की।
गोष्ठी का आरंभ गहन शोक-संवेदना के साथ हुआ। ज्ञानपीठ सम्मान से विभूषित विनोद कुमार शुक्ल और ‘पहल’ पत्रिका के संपादक व प्रतिष्ठित कथाकार ज्ञानरंजन के निधन को साहित्य-जगत की अपूरणीय क्षति बताते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। इसके साथ ही हरियाणा की जनवादी और लोकधर्मी रचनाशीलता के सशक्त हस्ताक्षर अंग्रेज सिंह अलेवा और रामधारी सिंह खटकड़ के असामयिक देहावसान पर भी उपस्थित रचनाकारों ने भावभीनी संवेदना व्यक्त की और उनके सृजनात्मक अवदान को नमन किया।
विचार-विमर्श के दौरान देश के वर्तमान हालात पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज का लेखक अभूतपूर्व राजनीतिक दबावों और वैचारिक संकुचनों के बीच रचना कर रहा है। सत्य के पक्ष में निर्भीक होकर खड़ा होना और उसे रचना में अभिव्यक्त करना इस समय की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में विभिन्न साहित्यिक संगठनों और वैचारिक धाराओं से जुड़े लेखकों को एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सुदर्शन गासो ने कहा कि आज पूरी दुनिया जिस तरह के हालात से गुजर रही है, उसमें साहित्यकारों को समाज को जगाने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभानी होगी। साहित्यकार त्रिकालदर्शी माने जाते हैं, उन्हें अपनी आत्मा को जगाकर समय के सामने आना होगा और अपने दायित्वों का निर्वाह करना होगा। उन्होंने कहा कि समाज, मानवता, देश और इंसानियत के प्रति अपने हर फर्ज को निभाने के लिए लेखकों को आगे आकर अपनी भूमिका अदा करनी होगी।
छत्तीसगढ़ की गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर के कुलपति द्वारा प्रख्यात कथाकार मनोज रूपड़ा के अपमान की तीव्र भर्त्सना करते हुए वक्ताओं ने इसे समूचे साहित्य-संसार का अपमान बताया। इसे सत्ता के उस अहंकार का प्रतीक बताया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शीर्ष पर बैठे लोगों के मन में स्वतंत्र विचार और रचनात्मक चेतना के प्रति कितना सम्मान शेष रह गया है।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर भी गंभीर चिंता प्रकट की गई। इस्राइल-फिलिस्तीन और रूस-यूक्रेन संघर्षों के बीच अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्राध्यक्ष के अपहरण तथा ग्रीनलैंड, मेक्सिको, वियतनाम, ईरान जैसे देशों को दी जा रही धमकियों का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि विश्व को जानबूझकर युद्ध जैसी स्थितियों की ओर धकेला जा रहा है। यह हिंसक और अमानवीय प्रवृत्तियां पूरी मानवता के भविष्य के लिए घातक संकेत हैं।
वक्ताओं ने रेखांकित किया कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का समाज के विकास और चेतना पर सीधा प्रभाव पड़ता है। रचनाकार अपने समय और समाज से निरपेक्ष होकर सृजन नहीं कर सकता; वह अपने युग का सजीव साक्ष्य होता है। इसलिए अहंकारी राष्ट्राध्यक्षों और तानाशाही प्रवृत्तियों का प्रतिरोध आज केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि एक गहन मानवीय और साहित्यिक दायित्व है।
इस परिचर्चा में जलेस अंबाला की अध्यक्षा अनुपम शर्मा, जलेस प्रदेशाध्यक्ष जयपाल, प्रलेस अंबाला अध्यक्ष तनवीर जाफरी, प्रलेस राज्य सचिव प्रोफेसर गुरुदेव सिंह देव, प्रलेस के संयुक्त सचिव एस.पी. भाटिया, डॉ. सुदर्शन गासो, सुनील शर्मा, गुरमीत सिंह, आत्मा सिंह, यादविंदर सिंह कलोली, राजविंदर सिंह, भगवंत सिंह भानु सहित अनेक रचनाकारों और साहित्यकारों ने सक्रिय सहभागिता की। इस अवसर पर शोक प्रस्ताव और छत्तीसगढ़ की जी.जी. यूनिवर्सिटी के विरुद्ध प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए गए।
कविता पाठ से संवेदना को स्वर
कार्यक्रम के अंतिम चरण में कविता-पाठ ने विचारों को संवेदना और अनुभूति का स्वर दिया। डॉ. सुदर्शन गासो, गुरुदेव सिंह देव, यादविंदर सिंह, अनुपम शर्मा, सुनील शर्मा, जयपाल, एस.पी. भाटिया, आत्मा सिंह, तनवीर जाफरी, राजविंदर कौर सहित उपस्थित कवियों और रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं के माध्यम से समय के सत्य, पीड़ा, प्रतिरोध और मानवीय सरोकारों को शब्द दिए। कार्यक्रम का संयमित और गरिमामय संचालन प्रोफेसर गुरुदेव सिंह देव ने किया, जिससे यह गोष्ठी एक स्मरणीय बौद्धिक-सांस्कृतिक संवाद के रूप में स्थापित हुई।
