बात बेबात
अगर डर न होता तो क्या ये कहानी होती
विजय शंकर पांडेय
हर कर्ण को कुंती से मिलने का अधिकार है। चार दिन का था बच्चा। नाम नहीं, जाति नहीं, पिता तो दूर—कहानी भी अधूरी। कुंवारी मां ने उसे अनाथ आश्रम में छोड़ा और समाज ने चैन की सांस ली—चलो, एक “समस्या” कम हुई। आश्रम वालों ने रजिस्टर में लिखा: मां—अज्ञात, भविष्य—ईश्वर भरोसे।
ईश्वर ने शायद डच पासपोर्ट निकाल रखा था। बच्चा बड़ा हुआ, साइकिल चलाना सीखा, कर चुकाना सीखा और सबसे ज़रूरी—ईमानदारी सीखी। वहीं भारत में उसकी मां चुप्पी का घूंघट ओढ़े, मोहल्ले की पंचायतों से बचती रही।
40 साल बाद खबर आई—नीदरलैंड से एक मेयर तीसरी बार अपनी मां को तलाशने भारत आया है। एयरपोर्ट पर माला, ढोल, कैमरे। सब पूछ रहे थे—“भारत माता की जय?” उसने पूछा—“मेरी मां कहां है?”
अब शहर के नेता परेशान। कोई बोला—विदेशी मेयर है, वीज़ा देखो। कोई बोला—कुंवारी मां का मुद्दा संवेदनशील है, प्रेस मत बुलाओ। समाज को सबसे ज़्यादा डर इस बात का था कि अगर मां मिल गई तो सवाल भी मिल जाएंगे।
मां मिल भी जाए तो कैसा नज़ारा होगा। कांपते हाथ, भीगी आंखें। बेटा बोला—“आपने छोड़ा, मैंने सीखा। आपने डर चुना, मैंने देश।”
तालियां बजीं। समाज ने कहा—देखो, संघर्ष से सफलता।
बस किसी ने ये नहीं पूछा—अगर डर न होता, तो क्या ये कहानी होती?

लेखक – विजय शंकर पांडेय
