हिंदी लेखकों की दुनिया में कमजोर उपस्थिति का क्या कारण है?

बीच बहस में

हिंदी लेखकों की दुनिया में कमजोर उपस्थिति क्यों है?

शंभुनाथ

कभी–कभी अचानक यह प्रश्न दिमाग में आता है कि हिंदी में पिछले सौ वर्षों में ऐसे साहित्यकार क्यों नहीं हुए जिन्हें नोबेल पुरस्कार भले न मिला हो पर वे दुनिया के देशों में उस तरह याद किए जाते हों जिस तरह अफ्रीका, लैटिन अमेरिका या यूरोप के दो–तीन करोड़ की आबादी वाले छोटे देशों के पाब्लो नेरुदा, न्यूगी वा थ्योंगो जैसे अनगिनत लेखक याद किए जाते हैं। हिंदी लेखकों की दुनिया में कमजोर उपस्थिति का क्या कारण है?

1947 के पहले के हिंदी लेखक कितने सामंती दबावों और आर्थिक तंगी में काम कर रहे थे, हम जानते हैं। प्रेमचंद, प्रसाद, निराला और इस काठी के लेखकों में से किसी को किसी दूसरे देश में जाने का अवसर नहीं मिला था जबकि रवींद्रनाथ 17 साल की अवस्था में, 1877 में साल भर इंग्लैंड रह आए थे।

विश्व भ्रमण उस समय ज्ञान–संवेदना के विस्तार में काफी सहायक साबित हो रहा था। इससे वंचित होने के बावजूद उस दौर में सामने आए हिंदी साहित्यकारों ने तब बहुत कुछ बहुमूल्य दिया जो संजो कर रखने लायक है। वे महज लेखक नहीं साहित्यकार थे।

विदेशों के हिंदी जानने वाले कुछ अध्यापकों द्वारा कुछेक हिंदी किताबों का विदेशी भाषाओं में अनुवाद करा लेने के बावजूद देखा जाए तो, पिछले 50 सालों में उभरे हिंदी लेखकों की विश्व उपस्थिति जीरो है। यह एक कटु सच्चाई है, पचपन करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी के लेखकों को पढ़ने में विदेशी पाठकों का जरा भी उत्साह नहीं है, जिस तरह हममें विदेशी लेखकों और सिद्धांतकारों को पढ़ने के लिए रहता है।

हिंदी लेखकों की विश्व उपस्थिति को प्रधान कसौटी न भी बनाया जाए, तब भी प्रश्न रखा जा सकता है कि पिछले 50 सालों में उभरे लेखकों के लिखे में क्या–क्या है जो संजो कर रखा जाना चाहिए और ऐसी कृतियाँ कम क्यों हैं जिन्हें श्रेष्ठ कहा जाए। यदि हिंदी लेखकों के पुरस्कारों/ सम्मानों से लदे होने के बावजूद उनके लिखे से संजो कर रखे जाने लायक बहुत कम है तो इसके क्या कारण हैं? इन कारणों पर ध्यान दिया जा सकता है :

1) सामान्यतः हिंदी लेखकों ने प्रभाव और अनुकरण में फर्क नहीं किया। उन्होंने पश्चिमी साहित्यिक दुनियाओं के चर्वितचर्वन से भिन्न बहुत कम दिया, जैसा कि अफ्रीकी–लैटिन अमेरिकी भाषाओं के लेखकों ने पश्चिमी साहित्य और सिद्धांतों से भिन्न बहुत कुछ दिया। इसलिए विदेशी पाठकों ने हिंदी के अंग्रेजी अनुवादों में अपना ही जूठा खाना पसंद नहीं किया!

2) ज्यादातर हिंदी लेखक प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी ’रचनाकार’ कम ’खिलाड़ी’ ज्यादा बनते गए। किसी अन्य ने नहीं सत्ता में पैठे उनके अपने संरक्षकों ने उन्हें ऐसा ही प्रशिक्षण दिया। इसका असर उनके मन की निर्मलता पर ही नहीं, उनकी रचनात्मकता और गुणवत्ता पर भी पड़ा।

3) अब के हिंदी लेखकों के विदेश भ्रमण कम नहीं हैं, सम्पन्नता के मामले में भी ऊंचाइयां हैं, पहले की तरह आमतौर पर आर्थिक तंगी नहीं है। पर आम परिदृश्य के अनुरूप ’भौतिक उत्थान तथा बौद्धिक–नैतिक पतन’ का सुविधावादी मामला बढ़ा–चढ़ा है।

पिछले कुछ दशकों से हिंदी लेखकों के संसार में इतनी अधिक स्वार्थपरता, वैचारिक दृढ़ता का अभाव, अध्ययन की कमी, गुटबाजी, गंभीरता की कमी या ’ तुरंत डिलीवरी’ , स्थानीयतावाद, व्यक्तिगत पसंद–नापसंद, ’विचारधारा से मुनाफाखोरी’ और ’खेल’ में इतनी अधिक लिप्तता है कि ऐसी चीजों के बीच रहते हुए महान लेखन क्या अच्छा लेखन भी संभव नहीं है!

फिर इन दिनों निहुरे–निहुरे ऊंटों की जमकर चोरी हो रही है! पचपन करोड़ हिंदी भाषियों के बीच हमारा हिंदी साहित्य अब महज चार–पांच हजार लोगों की क्षमता वाला स्टेडियम है! आम हिंदी भाषियों की नजर में कुमार विश्वास जैसे व्यक्ति ही महाकवि हैं। साहित्य के अधिकांश लोग कभी फेन्स के इधर हैं कभी उधर, रीढ़ गल रही है!

 

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