बात बेबात
जब तर्क छुट्टी पर हो, तब बयान ड्यूटी पर होते हैं
विजय शंकर पांडेय
पाकिस्तानी राजनीति में जब महंगाई बढ़ती है, बयान सस्ते हो जाते हैं। ख्वाजा आसिफ ने सोचा—मादुरो अगवा हो सकता है तो नेतन्याहू क्यों नहीं? अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को उन्होंने “ओला-उबर” समझ लिया है—जहाँ अमेरिका से कहा जाता है, एक अगवा कर दीजिए, लोकेशन भेज दूँगा।

तुर्की अपहरण करे, पाकिस्तान दुआ करे, अमेरिका डिलीवरी दे—पूरा मामला संयुक्त राष्ट्र नहीं, संयुक्त कल्पना लगता है। विदेश नीति अब नक्शों से नहीं, व्हाट्सऐप ग्रुप से चल रही है।
देश में बिजली नहीं, आटा नहीं, मगर आइडिया की कोई कमी नहीं। यहाँ बयान ऐसे आते हैं जैसे सैटायर खुद मंत्री बन गया हो।
उधर, अमेरिकी राजनीति में जब तर्क छुट्टी पर हो, तब बयान ड्यूटी पर होते हैं। ज़ेलेंस्की ने बस इतना कहा कि मादुरो के बाद पुतिन का नंबर भी आ सकता है, और ट्रंप ने तुरंत दिल की बात कह दी—“ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।” मानो दुनिया की सत्ता कोई टू-डू लिस्ट हो, जिसे ट्रंप ने पहले ही कैंसिल कर दिया हो।
ट्रंप के मुताबिक पुतिन से रिश्ते हमेशा अच्छे रहे हैं। इतने अच्छे कि कभी-कभी लगता है दोनों एक ही जिम में नैतिकता की एक्सरसाइज़ करते हैं। एक प्रेस करता है, दूसरा पुश-अप। लोकतंत्र बीच में पसीना पोंछता रह जाता है।
ज़ेलेंस्की शायद युद्ध के बीच भविष्य पढ़ रहे थे, और ट्रंप अतीत में दोस्ती ढूंढ रहे थे। एक को टैंक दिखते हैं, दूसरे को ट्वीट। एक को मिसाइलें सुनाई देती हैं, दूसरे को तालियां।
ट्रंप की दुनिया में तानाशाह भी तब तक तानाशाह नहीं होता, जब तक वो दोस्त हो। दोस्ती की परिभाषा भी सरल है—जो सवाल न पूछे, वही सच्चा मित्र। अंतरराष्ट्रीय क़ानून? वो तो बस पुराने ज़माने का व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड है।
तो पुतिन का नंबर नहीं आएगा। क्यों आएगा? दोस्त का नंबर तो स्पीड डायल में होता है। और जब दोस्ती हो, तो इतिहास भी म्यूट पर चला जाता है। दुनिया देखती रहती है, और ट्रंप मुस्कुराकर कहते हैं—“ऑल इज़ वेल।”
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लेखक- विजय शंकर पांडेय
