बिना किताबों के हमारा विश्व कैसा होगा?

बिना किताबों के हमारा विश्व कैसा होगा

शंभुनाथ

कोलकाता पुस्तक मेला चल रहा है, 3 फरवरी तक रहेगा। कई बार सोचता हूं, पुस्तकों के बिना यह दुनिया कैसी होगी। यह उस जंगल की तरह होगी जहां पेड़ होंगे पर चिड़ियों का गाना नहीं होगा! इस दुनिया में ऐसी भाषा छा जाएगी जिसमें न महान स्मृतियां होंगी और न बड़े सपने होंगे। पुस्तकहीन विश्व में मनुष्य के पास खुद सोचने की शक्ति नहीं रह जाएगी।

कोलकाता पुस्तक मेला एक जीवन उत्सव है जहां पुस्तक प्रेम एक दिखावा नहीं, हरेक की आत्मा का अंग है। दुनिया के विभिन्न देशों में बुक फेयर प्रसिद्ध हैं, जहां आम पाठक लेखकों से अनौपचारिक संवाद करते हैं। लेकिन शायद ही दुनिया के अन्य किसी देश में जयपुर या इस चरित्र के फूहड़ लिटरेरी फेस्टिवल इतनी बड़ी संख्या में होते हों, जितने भारत में होने लगे हैं। अब अन्य हिंदी प्रदेशों में भी शिक्षा और संस्कृति के व्यापारी बड़े होटलों में लिट फेस्ट करने लगे हैं। स्टेटस का मामला है। इस देश में यह एक स्थानीय शहरी फैशन हो चला है। ये फेस्टिवल अकादमियों की तरह लेखकों को पुरस्कार के रूप में राजनीतिक बख्शीश भी देने लगे हैं!

हमारे देश में लिटरेरी फेस्ट की यह हालत है कि यहां फोकस अवार्डधारी लेखक पर होता है, पुस्तक और पढ़ने की संस्कृति पर नहीं। यहां चमक–धमक होती है पर आवाज नहीं। या आवाज होती भी है तो फाइव स्टार चमक–दमक के बीच सैंडविच बनी हुई! यहां कहीं–कहीं तो पॉप कल्चर का आतंक रहता है। हालांकि हर कहीं ही विचार पूरी तरह मनोविलास में बदल जाते हैं। बड़े महानगरों के उच्च मध्यवर्गीय लिट फेस्ट में हिंदी सहित हर भारतीय भाषा अंग्रेजी की दासी नजर आती है!

आज की एक बड़ी चुनौती है कि लेखक अपनी ऐतिहासिक भूमिका कैसे बचाकर रख सकता है। क्योंकि कहा जा रहा है, नए हाईटेक विश्व में लेखक की भूमिका समाप्त हो चुकी है। बड़े पांच सितारा–सात सितारा होटलों में बड़े व्यापारियों द्वारा किए जा रहे लिटरेरी फेस्ट में लेखकों का शामिल होना उनका अपना ’परिपूर्ण सांस्कृतिक आत्मविसर्जन’ है, एक तरह से अपनी भूमिका खत्म होने की घोषणा। यह अपने साहित्य की अपने हाथों अंत्येष्टि है!

हमारे सामने चुनौती बढ़ गई है कि इस वातावरण में हम अपने छोटे– छोटे समानांतर प्रयासों से भी यह बताएं कि किस तरह लेखक की आज भी अपनी एक ऐतिहासिक भूमिका है

लिट फेस्ट में केवल जीवित लेखक होते हैं स्वनाम–धन्य, जबकि पुस्तक मेले में सैकड़ों साल से धरती पर अनुपस्थित कवि–लेखक भी हमारे बगल में खड़े सहयात्री होते हैं! पुस्तक मेला कवि–लेखकों का गणतंत्र है, जबकि लिट फेस्ट वस्तुतः राजनीति–पोषित बड़े व्यापारियों के कला–सांस्कृतिक दरबार से अधिक नहीं हैं!

मेरा लेखक ही मेरी दुनिया नहीं है, यह जो पुस्तकों का अनंत संसार है मैं उसका नागरिक हूं!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *