उमराव सिंह – श्रेष्ठतम देने वाले योद्धा

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग -74

उमराव सिंह – श्रेष्ठतम देने वाले योद्धा

सत्यपाल सिवाच

उमराव सिंह उन कार्यकर्ताओं में शामिल हैं जिन्होंने अपने कार्यक्षेत्र में राज्यभर में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके दिखाया। वे तत्कालीन हिसार (अब भिवानी) के मोरका गांव में 9 अप्रैल 1959 को पैदा हुए। उनकी माता जी का नाम श्रीमती हरकौर और पिता जी का नाम श्री हेतराम है। उनके पिता वन राजिक अधिकारी थे और सेवा के दौरान ही सन् 1995 में उनका देहावसान हो गया था। वर्तमान में इनका परिवार 2764 सेक्टर-4 पार्ट-2, हिसार में रहता है। ये दो भाई हैं। उमराव सिंह ने बी.एससी. (नॉन मेडिकल) और बी.एड. तक शिक्षा प्राप्त की। वे शिक्षा विभाग में 17 अगस्त 1983 में गणित अध्यापक नियुक्त हो गए और दिनांक 30 अप्रैल 2017 को मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए।

उमराव सिंह सिवानी क्षेत्र में सर्वकर्मचारी संघ और अध्यापक संघ के ऐसे कार्यकर्ता रहे जो अपने को संगठन में आत्मसात् कर लेते हैं। वे अपने शैक्षिक उत्तरदायित्व और सांगठनिक कार्यों के बीच अनोखे अंदाज में तालमेल रखते थे। इसका मुख्य कारण उनका जनसेवा में गहरी आस्था होना है। काम उन्हें बोझ नहीं, जीवन लगता है। मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि उनके नेतृत्व में सिवानी खण्ड राज्य में अव्वल स्थान पर बना रहा है। यह ऐसा क्षेत्र रहा है जिसके लगभग 99 प्रतिशत तक शिक्षक और कर्मचारी हड़ताल पर चले जाते थे। यह उमराव सिंह और सुभाष कौशिक जैसे लगनशील नेतृत्व की वजह से हुआ है।

वे 2000 से 2006 और 2014-17 तक चार बार सिवानी खण्ड में हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के अध्यक्ष रहे। वे बाद में सेवानिवृत्ति तक जिला भिवानी के मुख्य सलाहकार रहे। इसके साथ ही वे 2000 से 2006 सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा, खण्ड सिवानी के सचिव चुने गए। सेवानिवृत्त होने के कुछ ही समय बाद किसान आन्दोलन शुरू हो गया तो उन्होंने अखिल भारतीय किसान सभा के बैनर तले उसमें बढ़चढ़कर भाग लिया। वे सन् 2022 से अब किसान सभा जिला भिवानी के कोषाध्यक्ष का दायित्व निभा रहे हैं।

वे महसूस करते थे कि अधिकारों की रक्षा और न्याय के लिए संगठन बनाना बहुत जरूरी है। इसी सांगठनिक सोच के चलते वे यूनियन से जुड़े।

एक बार जुड़ने के बाद अब तक बने रहने का मुख्य कारण यह रहा कि साथी अध्यापकों द्वारा पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया गया और उन्होंने दिया भी।

उन्हें लगता है कि अकेला व्यक्ति वह प्राप्त नहीं कर सकता जो यूनियन के साथ मिलकर काम किया जा सकता है। इससे अपने समाज में पहचान भी मिलती है।

उमराव सिंह आरंभ से ही सामाजिक कार्यों में रुचि लेते थे और उनकी यह रुचि अभी तक कायम है। इसके चलते वे विद्यार्थी जीवन से ही गांव के सामुदायिक कार्यों में यथा संभव योगदान देते रहे हैं।

सन् 1993 में उन्होंने सर्व कर्मचारी संघ के आह्वान पर चंडीगढ़ में गिरफ्तारी दी और सात दिन बुडैल जेल में बंद रहे। वहां से रिहा हुए तो सिवानी पुलिस ने स्कूल से पुनः गिरफ्तार करके हिसार जेल में भेज दिया जहां आठ दिन बंद रहे। इसके अलावा पुलिस हिरासत और लाठीचार्ज जैसे उत्पीड़न तो उन दिनों आम बात थी। ये कार्रवाइयां बाद में समझौते के साथ निरस्त कर दी गईं। उमराव सिंह को यूनियन में काम करने का अनुभव सुखद महसूस हुआ। विभिन्न विभागों के कर्मचारियों के साथ मिलकर काम करने का मौका मिला। सुभाष कौशिक जैसे अथक साथी से काम करने की नई उर्जा और दिशा मिली।

व्यक्तित्व की दृष्टि से उनमें काम करने की क्षमता और ऊर्जा तो राज्य स्तर की रही, परन्तु शैक्षिक और घरेलू कामों के बीच संतुलन बनाए रखने की इच्छा ज्यादातर सिवानी तहसील ही कार्य स्थली रही। वे किसान सभा में यहीं काम करते रहे हैं। उन्होंने सामाजिक योगदान देते हुए परिवार के सदस्यों को अपने विश्वास में रखा। परिवार के सहयोग के बिना कोई भी व्यक्ति इतने लंबे समय तक काम नहीं कर सकता। माता -पिता, पत्नी और बच्चों का सहयोग हमेशा से मिलता रहा है। साथी अध्यापकों ने भी सदा भरपूर मदद की है।

वे कभी नेताओं के पीछे नहीं भागे। किसी भी राजनेता से ज्यादा संपर्क नहीं किया और नही कभी इसकी जरूरत महसूस हुई।

वे महसूस करते हैं कि बी.एससी. के बाद एम.एससी. करनी चाहिए थी, बी. एड. नहीं। उससे आगे बढ़ने के ज्यादा अवसर मिल सकते थे। दूसरा, उन्हें लगता है विज्ञान अध्यापक के पद पर कार्यभार ग्रहण करते तो वह अभिरुचि के अनुरूप होता। उस समय जो मौका पहले मिल गया वह ले लिया।

उमराव सिंह का दिल अभी भी गांव और अपने क्षेत्र में ही रमा हुआ है। उन्हें लगता है कि हिसार शिफ्ट नहीं होना चाहिए था, लेकिन बच्चों के कारण ऐसा करना पड़ा।

नयी पीढी के कार्यकर्ताओं और युवाओं से वे उम्मीद करते हैं कि वे अपने कर्तव्य की अनुपालना लगन से करें; समाज और साथियों का सहयोग करें तथा सामाजिक दायित्वों का निर्वहन निजी कार्यों जितनी लगन के साथ करें। वे अपने युवा काल और वर्तमान समय में काफी बदलाव देखते हैं। लोग भौतिक सुविधाओं के आदी हो गये हैं। थोड़ी भी असुविधा और कष्ट सहन करना नहीं चाहते। सरकार का डर भी लगता है कि कहीं नौकरी को कोई खतरा न हो जाए। ज्यादातर एकल परिवार हो गये हैं, ऐसे में घर की सारी जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति पर रहती है।

श्री उमराव सिंह और सुश्री अनीता का विवाह 18 जून 1979 को हुआ। दम्पति साथ साथ ही सक्रिय हैं। 4-5 अक्टूबर को भट्टू मंडी में अखिल भारतीय किसान सभा के राज्य प्रतिनिधि सम्मेलन में और 16 अक्तूबर को उपायुक्त कार्यालय भिवानी में अखिल भारतीय किसान सभा के 350 करोड़ रुपए के कपास बीमा क्लेम’2023 के भुगतान को लेकर उपायुक्त महोदय को ज्ञापन सौंपने के दौरान सपत्नीक उपस्थित रहे। श्रीमती अनीता जी भी किसान सभा और संयुक्त किसान मोर्चे के कार्यक्रमों में भाग ले रही हैं और जनवादी महिला समिति के साथ मिलकर काम कर रही है। उनकी एक बेटी सुलझन है जो डी.एन. कॉलेज हिसार में प्राध्यापिका हैं। दो बेटे संदीप और कुलदीप हैं। बड़ा बेटा एस बी आई बैंक में ब्रांच मैनेजर है और छोटा बेटा आर्मी सिग्नल कोर में जे. सी. ओ. है। वे अभी भी पहले की तरह ही सामाजिक कार्यों में और किसानों के बीच सक्रिय रहते हैं। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

 लेखक: सत्यपाल सिवाच

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