ट्रांसजेंडर समुदाय और कानूनी संघर्ष 

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के संदर्भ में

ट्रांसजेंडर समुदाय और कानूनी संघर्ष

 

मनजीत राठी

 

‘ट्रांसजेंडर’ शब्द 1990 के दशक में व्यापक रूप से प्रचलित हुआ। “ट्रांसजेंडर” केवल शरीर से जुड़ा प्रश्न नहीं है, बल्कि पहचान और आत्म-स्वीकृति से जुड़ा है। यह कई पहचानों को समेटे एक सामूहिक शब्द है, जो उन लोगों का वर्णन करता है जो पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को लांघते हैं और स्वयं को ऐसे व्यक्ति के रूप में अनुभव करते हैं जो मानो गलत शरीर में कैद हों।ट्रांसजेंडर या LGBTQIA+ समुदाय में वे सभी व्यक्ति शामिल हैं जिनका जन्म से प्राप्त लिंग उनके जेंडर या यौन रुझान (जिसे हम मनोवैज्ञानिक लिंग भी कह सकते हैं) से मेल नहीं खाता।

इसे हम यूँ समझ सकते हैं कि एक व्यक्ति पुरुष के रूप में पैदा हुआ लेकिन वह लैंगिक/ यौनिक रूप से स्वयं को स्त्री की तरह महसूस करता है और वयस्क होने पर उसने अपनी पहचान स्त्री के रूप में स्थापित की (ट्रांस स्त्री), या फिर इस विपरीत एक स्त्री शरीर मे जन्मा व्यक्ति स्वयं को पुरुष महसूस करता है (ट्रांस पुरुष)। दूसरे शब्दों में कहें, तो स्त्री शरीर में जन्मा खुद को पुरुष अनुभव करता है जबकि पुरुष देह मे जन्मा मानसिक रूप से स्वयं को एक स्त्री अनुभव करती है।

इसका अर्थ यह हुआ कि बड़े होते होते “तीसरे जेंडर” के लोग मानसिक रूप से स्वयं को गलत शरीर में कैद महसूस करने लगते हैं- और इन की लैंगिक पहचान जन्म के समय प्राप्त लिंग से मेल नहीं खाती। जिन लोगों की बड़े होने पर मन से महसूस की गई लेंगिक पहचान जन्म से मेल खाती है, उन्हें “सिस” कहते हैं (Cis- यानि जन्म और बाद मे एक सी पहचान) और जिनकी लेंगिक पहचान बाद मे महसूस की गई पहचान से मेल नहीं खाती, उन्हे ट्रांस कहते हैं, (यानि वे जन्म की पहचान से ऊपर उठ अपनी अलग यौनिक पहचान बनाते हैं)। अर्थात, यह उन व्यक्तियों के लिए इस्तेमाल होता है जिनकी लैंगिक पहचान या अभिव्यक्ति जन्म के समय निर्धारित जैविक लिंग के आधार पर स्थापित सामाजिक अपेक्षाओं से भिन्न होती है।

इसके परिणामस्वरूप कुछ लोग चिकित्सकीय हस्तक्षेप, सर्जरी या हार्मोनल उपचार के माध्यम से अपने शरीर को अपनी पहचान के अनुरूप बदल लेते हैं। ट्रांसजेंडरअधिनियम, 2019 के अनुसार– ट्रांसजेंडर ऐसा व्यक्ति है, “जिसकी लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाती और इसमें ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिला, इंटरसेक्स विविधताओं वाले व्यक्ति, जेंडरक्वियर, जेंडर-फ्लुइड(जिनकी लैंगिक पहचान समय के साथ बदलती रहती है) तथा सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति जैसे किन्नर, हिजड़ा, अरवानी और जोगता शामिल हैं।” “अरवानी” शब्दमुख्य रूप से तमिलनाडुमें हिजड़ा समुदाय का स्थानीय नाम है।”जोगता” शब्द मुख्य रूप सेकर्नाटक और महाराष्ट्रमें प्रचलित है, जो उन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को संदर्भित करता है जो देवी येल्लम्माकी सेवा में जीवन समर्पित करते हैं।

गौरतलब है कि अनेक लैंगिक पहचानें विभिन्न संस्कृतियों में सदियों से या यूँ कहें कि समाज के प्रारंभ से मौजूद रही हैं और ये लैंगिक पहचान इस बात से जुड़ी है कि कोई भी व्यक्ति स्वयं को किस रूप में पहचानता/पहचानती है।स्त्रीत्व या पुरुषत्व केवल जन्म से मिले मानव शरीर पर निर्धारित नहीं होता, बल्कि किसी भी शरीर में जन्मा व्यक्ति स्वयं को मानसिक रूप से कैसा अनुभव करता / करती है , इस पर निर्भर करता है।

एक पुरुष देह में एक स्त्री हो सकती है और एक स्त्री देह में एक पुरुष। भारतीय मिथक और परंपराएँ लैंगिक विविधता से जुड़े अनेक पात्रों और कथाओं से भरी हुई हैं। जैसे शिखंडी एक ट्रांस-पुरुष था। इसी तरहशिव के अर्धनारीश्वर रूप (स्त्री-पुरुष के मिलन का प्रतीक) का भी विवरण मिलता है। विष्णु का मोहिनी रूप भी ट्रांसजेंडर की ही अवधारणा है। अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने एक वर्ष तक नृत्य-गुरु “बृहन्नला” के रूप में जीवन बिताया। खजुराहो जैसे मंदिरों की मूर्तियों में भी विविध प्रकार के संबंधों को दर्शाया गया है।

देवदत्त पटनायक ने अपनी कृतियों—द प्रेग्नन्ट किंग (2008 में प्रकाशित उपन्यास जो भारतीय पुराणों और महाभारत की कथाओं से प्रेरित है) औरशिखंडी: एण्ड अदर ‘क्वीयर’ टेल्स दे डॉन्ट टैल यू(2014)— नामक पुस्तक में इन कथाओं का विश्लेषण करते हुए यह दर्शाया है कि क्वीयर पहचान भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। रुथ वनिता और सलीम किदवई की पुस्तकसेम सेक्स लव इन इंडिया (2000) यह प्रमाणित करती है कि भारतीय परंपरा में समान-लिंगी प्रेम की परंपरा प्राचीन काल से मौजूद रही है और यह कोई बाहरी अवधारणा नहीं है। इतिहास और प्राचीन कथाओं में ऐसे अनेक लोगों का उल्लेख मिलता है जिनकी पहचान या आकर्षण पारंपरिक “पुरुष-महिला” ढांचे से अलग था।

ट्रांसजेंडर और कानून

1860 के दशक में ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय दंड संहिता की धारा 377 “अप्राकृतिक अपराध” शीर्षक के अंतर्गत लागू की गई। इस धारा के तहत समान-लिंगी यौन संबंधों को, चाहे वे आपसी सहमति से ही क्यों न हों, अवैध माना गया। “अप्राकृतिक अपराध” वे माने गए जो तथाकथित पूर्वनिर्धारित सामाजिक मानदंडों के विरुद्ध हों। किंतु समाज अक्सर यह विचार नहीं करता कि “प्राकृतिक” क्या है और “अप्राकृतिक” क्या। वास्तव में अनेक सामाजिक मान्यताएँ, जिन्हें ईश्वर या प्रकृति की इच्छा कहा जाता है, मनुष्य-निर्मित हैं। आधुनिक भारत में लंबे समय तक यह संघर्ष चलता रहा कि समलैंगिकता अपराध है या नहीं।

संविधान में लिंग के आधार पर समानता की बात कही गई लेकिन यह बात स्त्री और पुरुष को ही ध्यान मे रखकर लिखी गई क्योंकि अब तक तीसरे जेंडर को कानूनी मान्यता नहीं मिली थी। संविधान बनने के वर्षों बाद भी ट्रांस जेंडर की नागरिकता को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं था। एक नागरिक के तौर पर उन्हें वोट देने के अधिकार से भी वंचित रखा गया। बाद के वर्षों में ट्रांसजेंडर समुदाय के लंबे संघर्षों के बाद 1994 में देश के ट्रांस-जेंडर समुदाय को वोट देने का अधिकार दिया गया लेकिन उनकी असली पहचान के साथ नहीं। उनकी पहचान को कभी पुरुषों की श्रेणी मे रखा गया और काभी स्त्री की श्रेणी में। 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय नेनाज़ फ़ाउंडेशन मामले में धारा 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय को पलटते हुए समलैंगिकता को पुनः अपराध की श्रेणी में रख दिया और कानून में बदलाव का दायित्व संसद पर छोड़ दिया।

2014 का NALSA निर्णय

इसे ट्रांसजेंडर अधिकारों पर ऐतिहासिक फैसला माना जाता है। 15 अप्रैल 2014 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने National Legal Services Authority बनाम Union of Indiaमामले (NALSA केस) में अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को “तीसरे लिंग” के रूप में कानूनी पहचानदेने का निर्देश दिया। यह पहली बार था जब भारतीय न्यायपालिका ने स्पष्ट रूप से ट्रांसजेंडर समुदाय की स्वतंत्र पहचान को मान्यता दी। कोर्ट ने कहा कि व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान (पुरुष, महिला या तीसरा लिंग) स्वयं तय करने का मौलिक अधिकार है। इसके लिए किसी सर्जरी या चिकित्सकीय प्रमाण की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए।

फैसले में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 और 16 (भेदभाव निषेध), 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर भी समान रूप से लागू होते हैं।सरकार को निर्देश दिया गया कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक सुविधाओं में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ भेदभाव रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ। लेकिन हकीकत में आज भी समान विवाह, सामाजिक स्वीकार्यता और भेदभाव खत्म करने की लड़ाई जारी है।

6 सितंबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को “पूर्णतः प्राकृतिक अवस्था” घोषित किया और धारा 377 को निरस्त कर दिया। यह LGBT समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक जीत थी। अपने ऐतिहासिक निर्णय (नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा—“इतिहास इस समुदाय और उनके परिवारों से माफी का ऋणी है, क्योंकि सदियों तक उन्हें अपमान और बहिष्कार झेलना पड़ा। वे प्रतिशोध और उत्पीड़न के भय में जीने को विवश रहे। यह बहुसंख्यक समाज की अज्ञानता का परिणाम था कि वह यह स्वीकार नहीं कर पाया कि समलैंगिकता मानव यौनिकता की एक प्राकृतिक अवस्था है।”

धारा 377 ने वर्षों तक LGBTQ+ समुदाय में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा किया। समाज में उनके प्रति कठोरता और भेदभाव बढ़ा, उन्हें “पापी” कहा गया। उन्हें शिक्षा संस्थानों से दूर रखा गया, और यदि प्रवेश मिला भी तो सहपाठियों द्वारा उपहास और भेदभाव का सामना करना पड़ा। उनकी बदलती यौन पहचान के कारण उन्हें भिखारी, अपराधी या “अशुद्ध” समझा गया।

हालांकि 2018 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय उनके गरिमापूर्ण अस्तित्व के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है,लेकिन सामाजिक -सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्तर पर समानता लाने के लिए समाज की मुख्यधारा में उनका समावेश आवश्यक है। साहित्य, विशेषकर क्वीयर साहित्य और कला ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इस समुदाय को अपनी आवाज उठाने में सशक्त किया है।

ट्रांसजेंडर अधिनियम, 2019:

ट्रांसजेंडर समुदाय के लंबे संघर्ष की बदौलत सुप्रीम कोर्ट के NALSA बनाम भारत सरकार (2014) के ऐतिहासिक फैसले के बाद यह अधिनियम इनके अधिकारों और कल्याण की रक्षा के लिए बनाया गया, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को“तीसरे लिंग”के रूप में मान्यता दी गई,लेकिन अनेक ट्रांस जेंडर कार्यकर्ताओं ने इसकी सीमाओं और प्रक्रियाओं पर आपत्तियाँ जताई हैं। इसके तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान के लिए आवेदन करने तथा प्रमाणपत्र जारी करने का प्रावधान है, साथ ही इनके बचाव, संरक्षण और पुनर्वास की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयुक्त सरकारी प्राधिकरणों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य देखभाल से संबंधित प्रावधानों के साथ-साथ ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद का गठन भी इस अधिनियम में किया गया है, जो परामर्श देने, निगरानी करने, मूल्यांकन करने, समीक्षा करने और ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए गतिविधियों और कल्याणकारी कार्यक्रमों का समन्वय करने का कार्य करेगी।लेकिन अनेक ट्रांसजेंडर कार्यकर्ताओं और संगठनों ने कहा है कि यह अधिनियम उनकी वास्तविक ज़रूरतों और माँगों को पूरी तरह से संबोधित नहीं करता और यह उनके साथ पर्याप्त परामर्श के बिना पारित किया गया। अधिनियम की मुख्य सीमास्व-घोषणा की बाधा से जुड़ी है।

अधिनियम में ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाणपत्र के लिए जिला मजिस्ट्रेट से आवेदन करने की शर्त है, जो इनकीस्व-घोषणा के अधिकारको सीमित करता है और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अनावश्यक नौकरशाही प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

चिकित्सीय जाँच की आवश्यकता भी इनके लिए मुश्किल पैदा करेगी। यदि कोई व्यक्ति पुरुष या महिला के रूप में पहचान चाहता है, तो अधिनियम चिकित्सीय प्रमाणपत्र की मांग करता है। इसे निजता और आत्मनिर्णय के अधिकार का उल्लंघन माना गया है। अधिनियम में शिक्षा और रोजगार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है, जबकि समुदाय लंबे समय से इसकी माँग करता रहा है। साथ हीअधिनियम में भेदभाव या अपराधों के लिए अपेक्षाकृत हल्की सज़ा का प्रावधान है, जिससे इसे प्रभावी रूप से लागू करना कठिन हो सकता है।

अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विवाह, गोद लेने और पारिवारिक अधिकारों पर स्पष्ट प्रावधान नहीं करता। अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद कुल मिलाकर, यह अधिनियम ट्रांसजेंडर समुदाय को कानूनी पहचान, सीमित अधिकार और सामाजिक सुरक्षा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026:

लेकिन भारत सरकार ने लोकसभा में 13 मार्च 2026 को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया जोट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019के अंतर्गत मान्य, सीमित लेकिन महत्वपूर्ण संरक्षणों को गंभीर रूप से पलट देता है और पहचान को राज्य के नियंत्रण में लाकर ट्रांसजेंडर और लैंगिक विविध व्यक्तियों को और अधिक हाशिये पर धकेलने का खतरा पैदा करता है। सबसे चिंताजनक पहलुओं में से एक हैस्व-परिभाषित लैंगिक पहचान के सिद्धांत को हटाना, जो वर्तमान 2019 अधिनियम का मूल तत्व है।

2019 का अधिनियम अपूर्ण था, फिर भी उसने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को यह अधिकार दिया कि वे बिना अनिवार्य चिकित्सीय प्रक्रियाओं या संस्थागत सत्यापन के अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित कर सकते हैं। यह अधिकार कठिन संघर्षों के बाद मिला था, क्योंकि प्रारंभिक विधेयक में यह प्रावधान नहीं था। तीव्र विरोध प्रदर्शनों के बाद ही सरकार ने लैंगिक पहचान तय करने के लिए मेडिकल बोर्ड की व्यवस्था को वापस लिया।

प्रस्तावित संशोधन इस ढाँचे को तोड़ता है और पुनः जिला मजिस्ट्रेट द्वारा केवल मेडिकल बोर्ड की सिफारिश पर प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था करता है। ऐसा करके यह संशोधन स्व-परिभाषित लैंगिक पहचानके अधिकार को व्यक्ति से छीनकर राज्य के हाथों में सौंप देता है और इस सिद्धांत को कमजोर करता है कि लैंगिक पहचान व्यक्तिगत स्वायत्तता और गरिमा का विषय है।

संशोधन “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा को भी अत्यधिक संकीर्ण कर देता है। 2019 का अधिनियम व्यापक पहचान स्पेक्ट्रम को मान्यता देता था—जैसे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, जेंडर-क्वियर, नॉन बाइनरी व्यक्ति और इंटरसेक्स विविधताओं वाले लोग, चाहे उन्होंने चिकित्सीय परिवर्तन किया हो या नहीं। इसके विपरीत, यह संशोधन मान्यता को मुख्यतः कुछ विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों तक सीमित करता है, जैसे हिजड़ा, किन्नर, अरवानी, जोगता या जन्मजात इंटरसेक्स विविधताओं वाले व्यक्ति। इस सीमित परिभाषा से कई लैंगिक विविध व्यक्ति कानूनी मान्यता से बाहर हो जाते हैं।

विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के वक्तव्य में दिया गया तर्क भी चिंताजनक है, जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कानून को सभी विविध या स्व-परिभाषित लैंगिक पहचानों को संरक्षण नहीं देना चाहिए। यह दृष्टिकोण लैंगिक विविधता की संकीर्ण और बहिष्कारी समझ को दर्शाता है, जो पहचान को केवल जैविक या सांस्कृतिक श्रेणियों तक सीमित कर देता है, बजाय इसके कि लैंगिक विविध व्यक्तियों की वास्तविक जीवन स्थितियों को मान्यता दे। यह सुप्रीम कोर्ट के NALSA बनाम भारत संघ (2014)के निर्णय का भी उल्लंघन है, जिसमें कहा गया था: “ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का अपने स्व-परिभाषित लैंगिक पहचान का अधिकार भी मान्य है और केंद्र तथा राज्य सरकारों को निर्देश दिया जाता है कि वे उनकी लैंगिक पहचान को पुरुष, महिला या तृतीय लिंग के रूप में कानूनी मान्यता दें।”

इस संशोधन द्वारा परिभाषा को संकीर्ण करने से ट्रांसजेंडर और नॉन बाइनरी व्यक्तियों अधिकारों, कल्याणकारी योजनाओं और कानूनी संरक्षण तक पहुँच पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। जिन व्यक्तियों की पहचान संशोधित परिभाषा से बाहर रह जाएगी, उन्हें मान्यता ही नहीं मिलेगी और वे भेदभाव तथा सामाजिक हाशियाकरण से निपटने के लिए बनाए गए तंत्रों तक पहुँच खो देंगे।

इस प्रकार यह विधेयक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के अंतर्गत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को नकारता है, जो सभी व्यक्तियों को गरिमा के साथ बिना भेदभाव के जीवन जीने का अधिकार देते हैं। इस संशोधन को व्यापक लोकतांत्रिक स्पेस के सिकुड़ने और देशभर में अल्पसंख्यकों व हाशिये पर खड़े समुदायों के अधिकारों के क्षरण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। मौजूदा संरक्षणों को कमजोर करने और मान्यता को सीमित करने वाले कानूनी उपाय असमानताओं को गहरा करते हैं और बहिष्कार को मजबूत करते हैं।

लैंगिक पहचान गरिमा और आत्मनिर्णय का विषय है। इसे चिकित्सीय प्रमाणपत्र या नौकरशाही की स्वीकृति तक सीमित नहीं किया जा सकता।अनेक महिला और सामाजिक संगठनों जैसे जनवादी महिला समिति नेट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026की तत्काल वापसी की माँग की है और लोकतांत्रिक शक्तियों से अपील की है कि वे ट्रांसजेंडर और लैंगिक विविध व्यक्तियों- जैसे बदलती लेंगिक पहचान के लोग और नॉन-बाइनरी (जो महिला -पुरुष की पारंपरिक श्रेणियों से बाहर है) के अधिकारों और कानूनी मान्यता को सीमित करने के किसी भी प्रयास का पुरजोर विरोध करें।

लेखिका रिटायर्ड सीनियर प्रोफेसर, एम डी यू रोहतक हैं।

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