दलित चेतना की मुखर आवाज़ है कविता संग्रह- ‘बंद दरवाजे’*

*दलित चेतना की मुखर आवाज़ है कविता संग्रह- ‘बंद दरवाजे’*

आज हमारा देश आजाद है।सवर्णों के जोर-जुल्म आज भी देखने को मिलते हैं।आज भी हिन्दू-धर्म में वर्ण व्यवस्था के कारण उपजी जाति व्यवस्था का कीचड़ समाज की समानता को विकृत कर रहा है।अभी हाल ही में प्रकाशित श्री जयपाल जी का काव्य संग्रह बंद दरवाजे दलित चिंतन की मुखर आवाज़ है। उन्होनें समाज का सामाजिक ऑपरेशन,आर्थिक परीक्षण,तथा नैतिक मूल्यांकन किया है।अवलोकन के दौरान दलित वर्ग के लिये दरवाजे बंद पाये गये,उनके जीवन को निम्न समझा गया,मनुस्मृति के अग्निकुंड में डाला गया। इस पुस्तक में श्री जयपाल जी अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को जागृत करते हैं तथा समाज में दलितों के प्रति घृणित स्थिति के सब दरवाजे तोड़ते हैं,वे तर्क-वितर्क के साथ जबरदस्त विचार प्रस्तुत करते हैं।वह सवर्णों के जुल्म और अत्याचारों को आज भी पहले की तरह देख रहे हैं।उनकी कवितायेँ जिन संघर्षों से निकलकर आई हैं समाज की सच्ची तस्वीर नजर आती है और वह अपनी बात तर्क-वितर्क के साथ ललकारता है।आज के दौर में भी दलितों के लिये उनके दिमाग के दरवाजे बंद हैं

 

मैं क्या कहूँ उस गाँव को

जो सबका है पर उसका नहीं

उन गाँव के कुत्तों को

जो मुझे देखकर ही भौंकते हैं।

 

जनकवि श्री जयपाल जी की कविताओं में दलित महिलाओं की आवाज़ भी मुखर होकर बोलती है और यह पुस्तक सदियों से चली आ रही महिलाओं के प्रति सडांध युक्त मानसिकता को मिटाना चाहती है।वह ठाकुर के कुएं से बिना झिझक पानी भरना चाहती है। यह पुस्तक ब्रह्म हत्या और दलित हत्या के अन्तर को पाटना चाहती है। सवर्ण-समाज को दलित लडके द्वारा सवर्ण जाति की लड़की से शादी करना अखरता है,दलित व्यक्ति के सरपंच बन जाने से सवर्णों को दस्त लग जाते हैं । लेकिन अपने लिये उन्हे वोट चाहिए फिर तो वे पाँव तक पकडते हैं ,उन्हे भूख बहुत लगती है,वे झूठे बेर भी खा जाते हैं,चुनाव के समय वे दलितों के घर की गाय का गोबर और मूत तक पी सकते हैं। जूठी पत्तल के माध्यम से दलित महिला के तन-मन पर क्या गुजरती है, जूठी-पत्तल कविता में बड़ी ही मार्मिक स्थिति का वर्णन है।

कुछ पँक्तियाँ देखिये-

 

गालियां खाकर,फटकार पाकर

बड़ी मुश्किल से जंग जीतकर

आती थी माँ बच-बचाकर

छिप-छिपाकर कुत्तों बिल्लों से

माँ आती थी घंटों इंतजार करवाकर।

 

वह मुखर होकर खड़ी हो जाती है और ‘मैं चाहती हूँ’, कविता के माध्यम से स्पस्ट कर देती है-

 

ये पँक्तियाँ हर महिला के लिये महत्वपूर्ण हैं।इस कविता संग्रह में जाति के दंश को झेलती हुई बस्तियां , सवर्णों की घिनौनी हरकतों और अत्याचारों को तो सहती हैं, मौसम की मार भी सहती है।हम उनके लिये कितना भी नाच लें या गा लें लेकिन फिर भी जाति उनके दिलों में उतर गई है– जाति है कि जाति नहीं।इन बस्तियों में रहने वाले लोगों को वे गंदी नाली के कीड़े और न जाने क्या-क्या कहते हैं।मुखिया के नाम शोक-पत्र कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए –

 

ना रस्सा टूटा,ना खूँटा ही

हम ही टूट गये बँधे-बँधाए

 

और सवर्णों की पगड़ी सदा कलफदार रही।’यह हमारा समय है’ कविता में कवि ने शूद्रों और सवर्णों दोनों के एक होने की कल्पना की है । वक्त की मार सब पर पड़ती है

 

वह तुम्हारा समय था

केवल तुम्हारा

उसमें हम कहीं नहीं थे

थे भी तो तुम्हारी जूती के नीचे

यह हमारा समय है तुम्हारा भी है

यहीं रहना है हमें भी और तुम्हें भी

अपने समय के सवालों का जवाब देते हुए।

 

सिरफिरे कविता में फिर से शंबूक का सिर,एकलव्य का अंगूठा नजर आने लगा है। हमारा मारा जाना उनका विकास-क्रम है। प्राकृतिक रूप से शरीर की एक समान संरचना जाति के कारण कुछ लोग पवित्र बने हुए हैं और कुछ अपवित्र। तथाकथित लोगों को घुड़चढ़ी का सवाल,घुड़चढ़ी से खतरा,घोड़ी और घुड़चढ़ी जैसी कविताएँ अप्रत्याशित जंग नजर आती हैं।उन्हें घोड़ी पर चढ़ना देश के शासन पर चढ़ने जैसा लगता है।एक बार फिर कठिनाइयों का वक्त आने लगा है,एक बार फिर कवि अपने काव्य-संग्रह के माध्यम से ये सब भेदभाव बिना लाग-लपेट के उठाता है।दलितों को संविधान से जीवन में संपूर्ण बदलाव की स्वतंत्रता भी मिली लेकिन कवि मानता है कि कुछ नहीं बदला।कवि जोर देकर कहता है-

 

मै एक हजार साल पहले की नहीं

आज के भारत की बात कर रहा हूँ।

 

हजारों साल से दलित बस्तियाँ देवी-देवता,धर्म-ग्रंथ,धर्म-स्थल आदि के उत्पीड़न का शिकार रहे हैं।इस उत्पीड़न के बाद भी कवि मानवीयता के गुण को नहीं छोड़ता।स्वर्ग-नरक की बिडंबना मनु के समर्थन के गीत गाती है लेकिन कवि समाज को सजग करने का काम करता है ,वह सतगुरु रविदास जी के बेगमपुरा और संविधान की प्रस्तावना पर काम करता हुआ नजर आता है।धर्म का आडम्बरपना और जाति का डायनासोर इक्कीसवीं सदी में भी निगलने को तैयार है। इस काव्य- संग्रह की प्रत्येक रचना दिमाग के बंद दरवाजों को धक्के मार-मारकर खोलती है।श्री जयपाल श्री ओम प्रकाश वाल्मीकि व श्री मोहन दास नैमिशराय आदि दलित चिंतन के कवियों के समान स्वतंत्रता,समानता,बन्धुत्व का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

 

श्री जयपाल जी की कविताओं में सरलता,स्पष्टता और आँदोलन-धर्मिता नजर आती है।उनकी मुहावरे में कविता है और कविता में मुहावरा है।भाषा की दृष्टि से कविताएँ भावपूर्ण एवं अर्थपूर्ण हैं।कहीं-कहीं अलंकार भी स्वतः समा गये हैं।उनकी कवितायेँ साहित्यिक दृष्टि से ऐतिहासिक हैं।कवि महोदय को बंद दरवाजे काव्य संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद !!

 

 

*समीक्षा-दयाल चंद जास्ट (-9466220146)*

*पुस्तक – बंद दरवाजे(कविता-संग्रह)*

*कवि : जयपाल (94666-10508)*

*कीमत 150/- पेपर-बैक पृष्ठ-85*

*प्रकाशकः यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र (90009-68400)*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *