स्मरणांजलि
अवतार भाई का चले जाना…
गुरमीत अंबाला
कुछ ऐसी हस्तियां इस दुनियां में आती हैं,जिनके सदा के लिए अलविदा कर जाने के बाद भी उनकी पदचाप लंबे समय तक महसूस होती रहती है, समाज में वैज्ञानिक चेतना की मशाल जगाने वाली ऐसी ही शख्सियत थे,अवतार भाई । यद्यपि उनका नाम अवतार सिंह गिल माता पिता ने रखा था ,परंतु जाति,गोत्र ,धर्म जैसी विभाजनकारी धारणाओं से ऊपर उठ कर उन्होंने अपने नाम के साथ ‘भाई ‘ लगाकर मानवता के लिए समर्पित हो गए , समाज की भलाई के लिए संघर्ष करना ही उनका उद्देश्य रहा ।

14 मार्च 2026 को फोर्टीज हस्पताल, लुधियाना में 79 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली,वे तो 22 फरवरी2026को अपने हमख्याल साथियों के लिए मिलने के लिए कनाडा ,जो उनकी कर्म भूमि था, से आए थे 20 मार्च2026 को उन्होंने अपने विचारों के साथियों से मिलने के लिए “जग जियूंदिया दे मेले” कार्यक्रम रखा था लेकिन इससे पहले ही वे चले गए। 16 मार्च 2026को उनकी पूर्व निर्धारित इच्छा का सम्मान करते हुए उनके परिवार,साथियों ने बिना कोई धार्मिक पाखंड करते हुए उनके मृतक शरीर को फूलों और उनकी तस्वीरों से सजी एम्बुलेंस में सजा कर और क्रांतिकारी नारों के साथ अंतिम विदायगी दी और चिकित्सीय उपयोग हेतु ई . एस.आई. हस्पताल लुधियाना को प्रदान कर दिया गया। इससे पूर्व उनके निवास स्थान पर पंजाब के प्रमुख जन संगठनों ने उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की और अपने अपने झंडे उन्हें सम्मान पूर्वक अर्पित किए उनके द्वारा पहले से ही निश्चित किए गए 20 मार्च के कार्यक्रम को उसी नाम “जग जियूंदियां दे मेले ” के नाम से उनके लिए शोक सभा और आदरांजलि के नाम पर रखा गया। जिसमें पंजाब के प्रमुख सामाजिक संगठनों, विभिन्न यूनियन ,तर्कशील सोसायटी आदि ने उन्हें आदरांजलि दी।
अवतार भाई जिला लुधियाना,पंजाब के गाँव कोठे जीवें के रहने वाले थे 1992में वे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ कनाडा के ब्रिट्स कोलंबिया परवेंसी में वेंकूवर चले गए थे।उनके परिवार में उनकी पत्नी ,दो बेटियां और चार बेटे थे। विदेश जाने से पहले वे पंजाब स्टेट पावर कार्पोरेशन में कार्यरत रहे,इस दौरान वे टेक्नीकल सर्विसिज यूनियन के अध्यक्ष भी रहे। टेक्नीकल वर्कर्स यूनियन में कार्य करते हुए उन्होंने अकेले कर्मचारी आंदोलन में ही नहीं बल्कि हर जुल्म, अन्याय के विरुद्ध निडरता के साथ आवाज उठाते रहे थे।उनसे कोई भी दिल खोल कर बातचीत कर सकता था
1980-90 के काले दिनों का दौर माना जाता है । उस समय बहुत से यूनियननिष्ट,तर्कशील, कम्युनिस्ट और प्रगतिशील लोग निशाने पर थे,अवतार भाई ने ऐसे समय में भी वे अपने आस पास चलते धरने प्रदर्शनों में सक्रिय रहते थे वे बे खौफ हो कर हर जुल्मों सितम के विरोध में उतरते रहे थे।
कनाडा में जाकर उन्होंने अलग अलग काम करते हुए बाद में ट्रांसपोर्ट व्यवसाय को जीवन यापन के लिए अपना लिया ।
पंजाब में भी यूनियन में कार्य करते हुए वे विभिन्न संघर्षशील संगठनों के संपर्क में रहते थे वे लोकतांत्रिक इंकलाबी लहर से भी जुड़े रहे ।1995 में उनकी जिंदगी में वह अवसर आया जहां से बढ़ कर उन्हें कनाडा और पंजाब के लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया।1995में मूर्तियों के दूध पीने की अफवाह देश दुनियां में फैली ,एक जागरूक नागरिक और वैज्ञानिक चिंतक होने के कारण उन्होंने वेंकूवर (कनाडा) में कम्युनिटी रेडियो से संपर्क किया और कहा कि यह सब अंधविश्वास है ,किसी वैज्ञानिक चिंतक को बुला कर उसके विचार भी प्रेषित करो ,रेडियो वालों ने उन्हें ही आकर अपनी बात रखने को कहा,उन्होंने तर्क देकर इसका खंडन किया,किसी रेडियो स्टेशन के माध्यम से प्रोग्राम का यह उनका पहला अनुभव था,धीरे धीरे विभिन्न विषयों पर उन्हें स्थानीय रेडियो आमंत्रित करने लगा और यहीं से उनके मन में तर्कशील सोसायटी,कनाडा बनाने का विचार आया ,रेडियो के माध्यम से उनकी जनतक पहचान बन चुकी थी फिर समान विचारों के लोगों को साथ लेकर उन्होंने वैंकूवर में काम शुरू कर दिया और1998 में तर्कशील कल्चरल सोसायटी,कनाडा की स्थापना की। इसके बाद कनाडा के प्रमुख शहरों के साथियों से मिल कर उन्होंने सरी, वैंकूवर,ब्रह्मपटन,कैलगरी, एब्सफोरेड आदि शहरों में तर्कशील इकाइयां स्थापित की और वे बिना बिना थके इस मुहिम में जुड़ गए।उम्र से संबंधित बीमारियों के चलते उनकी किडनियां खराब हो गई थीं और वे डायलाईसिस पर आ गए थे लेकिन तर्कशील और वैज्ञानिक चेतना के कार्यक्रमों में स्वास्थ्य खराब रहने पर भी वे लगातार सक्रिय रहे और फेफड़ों की तकलीफ ,दिल की बाईपास सर्जरी , एक आंख से खराब हो जाना आदि स्वास्थ्य समस्याएं भी उनके कदम नहीं रोक सकीं तर्कशील और इंकलाबी नाटकों,प्रदर्शनियों,भाषणों,साहित्य के माध्यम से वे जीवन पर्यंत समाज में वैज्ञानिक चेतना फैलाते रहे
वे जहां तर्कशील सोसायटी कनाडा में सक्रिय थे, वहीं पंजाब और कनाडा के तर्कशील आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच एक कड़ी भी थे। वे तर्कशील आंदोलन के साथ ही अन्य सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहते थे।जिनमें उनकी भूमिका के लिए उन्हें सदा याद रखा जाएगा।
