शिक्षक, जागरूक नागरिक और समाज सुधारक रामपत सिंह यादव

हरियाणा : जूझते जुझारू लोग -79

 

शिक्षक, जागरूक नागरिक और समाज सुधारक रामपत सिंह यादव

 सत्यपाल सिवाच

महेन्द्रगढ़ जिले के चामधेड़ा गांव में श्रीमती मोहरली और श्री उदयराम के 15 दिसम्बर 1949 को एक सुपुत्र ने जन्म लिया। उसे रामपत नाम दिया गया। एक किसान परिवार में पले-बढ़े रामपत यादव महेन्द्रगढ़ जिले में शिक्षकों और कर्मचारियों के नेता के रूप में याद किए जाते हैं। वे तीन भाई और दो बहन हैं। रामपत जी की जीवन साथी मुन्नी देवी ने कुशलता से घर को संभाला। जब वे संगठन के काम से बाहर जाते तो वे पारिवारिक दायित्व को संभालतीं। उनका एक बेटा सुनील कुमार है जो एक कोचिंग सेंटर में हिन्दी पढ़ाता है। बेटी सुनीता हैं जिसकी बेटी व बेटा दोनों डॉक्टर हैं। रामपत का पौत्र आदित्य एम.बी.ए. का विद्यार्थी है और पौत्री शैलजा ने एम.डी.यू. रोहतक से एल.एल.एम. किया है। वह विवाहित है।

रामपत जी ने प्रभाकर, ओ.टी. तक शिक्षा प्राप्त करके 20 फरवरी 1973 को हिन्दी अध्यापक के रूप में प्रवेश किया। डोहर कलां, डेरोली अहीर और नांगल सिरोही सेवा की। वे दिनांक 31 दिसंबर 2007 को वे राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय बेरी से सेवानिवृत्त हो गए। शिक्षक के रूप में वे बहुत समर्पित, लगनशील और परिश्रमी रहे। वे अध्यापन कार्य को छात्रों के जीवन के अनुभवों से जोड़कर चलाते थे। इसी के चलते वे छात्रों के बीच बहुत लोकप्रिय रहे।

रामपत जी नौकरी में आने के शुरुआती दौर में ही यूनियन के संपर्क में आ गए थे। सन् 1973 की हड़ताल में शामिल हो गए। उस दौर में राव भगवान सिंह शिक्षकों के लोकप्रिय नेता रहे। रामपत जी उनसे काफी प्रभावित रहे। वे स्थानीय स्तर पर संगठन के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे। सन् 1980 में वे खण्ड स्तर पर पहली बार पदाधिकारी बने। सन् 1985 में जब व्यक्तिवादी कार्यप्रणाली के खिलाफ बगावत हुई तो राव भगवान सिंह की प्रेरणा से बनवारीलाल यादव, अमींलाल, जयसिंह, बिमला यादव, हनुमान सिंह आदि के साथ रामपत जी भी प्रगतिशील मुहिम का हिस्सा बने। वे उस समय महेन्द्रगढ़ खण्ड के अध्यक्ष थे। इसके बाद वे लम्बे समय खण्ड और जिला के अध्यक्ष रहे और यूनियन के संदेश को बहुत मुस्तैदी से दूरदराज के क्षेत्रों तक लेकर जाते।

उनके और श्री हनुमान सिंह यादव के आदर्श नेतृत्व में महेन्द्रगढ़ जिले में अध्यापकों को आन्दोलन में आने के लिए प्रेरित करने में मदद मिलती। वे न केवल रहन सहन की दृष्टि से सीधे और सादगीपूर्ण थे, बल्कि वे व्यवहार में भी सरल, निश्छल और सहयोगी के प्रकृति थे। कोई भी उनसे बातचीत करके भरोसा कर सकता था।

संगठन और व्यवसाय के प्रति उनकी आस्था बहुत गहरी थी। जब एस.यू.सी.आई. की ओर से शिक्षक आन्दोलन को खंडित करने का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा गया तो ये दोनों साथी बिना लागलपेट और बेबाक ढंग से एकता के लिए प्रतिबद्ध रहे। इनके प्रयासों से ही तोड़क कोशिश विफल हो गई।

उन्हें सन् 1987 के सर्वकर्मचारी संघ के आन्दोलन में जेल जाना पड़ा। वे सन् 1991 में जेल गए। सन् 1993 की हड़ताल में उन्हें बर्खास्त किया गया जो आन्दोलन की सफलता के बाद निरस्त हो गया। सन् 1996-97 की पालिका कर्मचारियों की हड़ताल में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया। नर्सिंग आन्दोलन के समय हुए लाठीचार्ज में उन्हें चोटें लगीं। सेवाकाल के शुरू से दिसम्बर 2007 में सेवानिवृत्ति तक वे हर आन्दोलन, धरना, हड़ताल, गिरफ्तारी, प्रदर्शन आदि में शामिल होते रहे। वे संयमी और समझदार होने के साथ-साथ दृढ़प्रतिज्ञ और साहसी स्वभाव के रहे हैं।

वे शिक्षक के साथ-साथ समाज सुधारक और जागरूक नागरिक रहे हैं। इसीलिए लड़कियों की शिक्षा, दहेज प्रथा, कन्याभ्रूण हत्या, नशे आदि के खिलाफ जागरूकता अभियान भी चलाते रहे हैं। उनकी कथनी और करनी एक थी। अंधविश्वास, कर्मकांड और पाखंड को वे नागरिक समाज के लिए घातक मानते थे। समाज सुधार और सामूहिक कार्यों में रुचि लेने के कारण वे आम जनता के बीच भी स्वीकार्य व्यक्ति रहे।

उनके बारे में जानकारी साझा करते हुए श्री कृष्ण कुमार धोलेड़ा बताते हैं – “सन् 1999-2000 में श्री रामपत जी हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ महेन्द्रगढ के जिला प्रधान थे। अध्यापकों की समस्याओं के लिए हर माह जिला शिक्षा अधिकारियों के साथ मीटिंग करते थे। एक बार किसी अध्यापक की समस्या का निराकरण एक माह तक भी नहीं किया गया। रामपत जी ने उस समय के जिला शिक्षा अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा। इस पर अधिकारी जी गुस्सा हो गए सभी कर्मचारी नेताओं से कहा कि मेरे दफ्तर से बाहर निकल जाओ । इस पर रामपत जी ने भी तैस में आकर मेज पर मुक्का मारा और जिला शिक्षा अधिकारी से कहा कि यह हमारा दफ्तर है, आपके बाप का नहीं है। अगर अपने कर्मचारियों का काम नहीं कर सकते तो आप छोड़ो दफ्तर। इसके बाद सभी लोग धरने पर बैठ गए। आखिर अधिकारी को अपने रवैये के लिए माफी मांगनी पड़ी। सौजन्य -ओमसिंह अशफ़ाक

लेखक – सत्यपाल सिवाच