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मंजुल भारद्वाज की कविता – संविधान के हर सफ़े पर…

कविता संविधान के हर सफ़े पर… मंजुल भारद्वाज   वो एक घाव रोज़ दे जाता है लोकतंत्र में भेड़ों का…