लघुकथा
घास
सुरेश हंस
बारूद की गंध और विस्फोटों के शोर ने एक स्कूल जाते बच्चे के मन पर गहरा आघात किया । युद्ध के गहरे सदमे से निकल कर ज़िंदगी फिर से सहजता चल निकली है ।
युद्ध में पिता को खो देने के बाद वह बच्चा गुमसुम सा हो गया है । वह बच्चा स्कूल नहीं जाना चाहता । उसे सब तरह के प्रलोभन देने के बाद वह तैयार तो हो जाता है लेकिन रास्ते में पड़ने वाले बुगियाल में बिछी हरी हरी घास पर पाँव नहीं रखता ।
लाख कोशिशों के बाद भी वह हरी घास पर चलने से इंकार कर देता है । माँ जानती है उसके मासूम बच्चे के कोमल मन पर गहरा आघात हुआ है ।
वह अपने बच्चे को मनोचिकित्सक के पास ले कर जाती है ।
कई दिन तक डॉक्टर घास से दूरी बनाए रखने का कारण नहीं जान सका ।
फिर एक दिन डॉक्टर ने पूछा : अच्छा यह बताओ आपको अम्मी की कौन सी बात सबसे अधिक याद आती है
बच्चा बोला : अम्मी ने एक बार एक कहानी में बताया था आदमी मर के घास बन जाता है । घास कभी नहीं मरती इसलिए आदमी फिर कभी नहीं मरता ।
डॉक्टर : ओह तो तुम इसी लिए घास के ऊपर से नहीं जाना चाहते ।
अब बच्चा कुछ देर चुप खड़ा रहा फिर धीमे से बोला : मेरे अब्बू भी घास बन गए हैं ।
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