सुमन नागर की कविता – ज़िन्दगी छोटी-सी है

कविता

ज़िन्दगी छोटी-सी है

 ~ सुमन नागर

 

निकाल लीजिए झीलों के आइनों में

कभी ख़ुद को निहारने के कुछ पल

कुछ वक्त लापरवाह होकर उड़ा लीजिए

उमंगों की पतंगों को मौज़ की हवाओं के संग

 

क़भी कभी यूँ ही थोड़ा सा बुद्धू बन जाइये

और बेवज़ह ठहाके लगाते मासूम बचपन में शामिल हो जाइए

क्योंकि ज़िन्दगी छोटी सी है

 

अब भूल भी जाइए कुछ अपनों और गैरों की कसैली यादों को

भूलकर गिले-शिकवे कच्ची उम्र के

पुराने दोस्तों की महफ़िलें फिर सज़ा लीजिए

 

ये पैसा, ये रूतबा, ये शानोशौकत

पीछा करते हो हर लम्हा जिसका

सब ख़ाक हो जाएंगे इक दिन

ज़िंदा रहेंगी तो बस ज़िंदादिल यादें तुम्हारी,

चूंकि ज़िन्दगी छोटी सी है

 

तो घोल डालिए शहद सी मिठास

अपने और अपनों के जीवन में,

हाथ बढ़ा लीजिए किसी बेसहारे की ओर कभी,

बन पाए जो भी मदद,

कर दीजिए क्योंकि ज़िन्दगी छोटी सी है

 

फुर्सत का इंतज़ार हर वक़्त इस क़दर ठीक नहीं

मन को बहलाकर फ़िज़ूल बहानों से, ख़ुद को यूँ नज़रंदाज़ मत कीजिए।

 

अब जी भी लीजिए उन सपनों को

जो संजो कर रखें हैं आज तक सिर्फ पलकों पर

 

कह भी डालिए किसी ख़ास से वो सब कुछ,

जो बरसों से दिलों पर बोझ सा है

याद रखिए जिंदगी छोटी सी है।

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