जयपाल की कुछ अत्यंत छोटी कविताएं 

जयपाल की कुछ अत्यंत छोटी कविताएं

 

1

श्मशान

 

जय -जवान

जय -किसान

सुनते-सुनते

रोया श्मशान

 

2

परछाई

 

राजा की परछाई

सपने में देख

प्रजा घबराई

 

3

राजा के कबूतर

 

राजा के कबूतर नगर में देखकर

बच्चियां मां की गोद में दुबक गई

मांएं जागती रही रात-भर

 

4

शादी

 

सब लड़कियां गा रही थी

एक लड़की रो रही थी

जिसकी शादी थी

 

5

शिकार पर तानाशाह

 

बच्चे दिखते नहीं हैं गलियों में

स्कूलों पर लटके हैं ताले

किसान खेतों से गायब हैं

माएं चूल्हे की तरफ देख रही हैं

चूल्हे में आग नहीं

ईश्वर जा छिपा है कण-कण में

अंतर्ध्यान हो गए हैं देवता

समाधी में चले गए हैं संत

चरणों में गिर पड़े हैं राष्ट्राध्यक्ष

तानाशाह निकला है शिकार पर !

 

6

गर्व

 

 

अच्छी बात नहीं है

अपने पड़ोसी को मार देना

यह बात मैं अच्छी तरह जानता था

और मानता भी था

पर इन दिनों

मैं अपने धर्म और जाति पर

बहुत अधिक गर्व महसूस कर रहा था

गर्व की ऐसी गहरी अनुभूति

मुझे आज से पहले कभी महसूस नहीं हुई थी

बस गर्व करते-करते

एक दिन मेरा पड़ोसी मेरे ही हाथों मारा गया

मेरे एक दोस्त ने उसका घर भी जला दिया

शर्म नहीं आई !

-मां ने सवाल किया

शर्म किस बात की !

मैंने गर्व से कहा !

 

7

धर्म और भगवान

 

मैंने अपने धर्म के नारे लगाए

उसने अपने धर्म के

मैंने अपने भगवान का झंडा उठाया

उसने अपने भगवान का

बात बढ़ती ही चली गई

और वहीं पहुंच गई

जहां अक्सर पहुंचती है

वह भी मारा गया

मैं भी मारा गया

घर उसका भी गया

घर मेरा भी गया

बड़ी मुश्किल से बचाए हमने

अपने धर्म और भगवान

 

8

अमर हुए तानाशाह

 

हम धर्म-ग्रंथों को

सिर पर उठाकर घूमते रहे

धर्म-गुरुओं के चरणों में बैठे रहे

राजाओं के लिए युद्ध लड़ते रहे

शहीद होते रहे और महान बनते रहे

ईनाम पाते रहे और नृत्य करते रहे

देखिए किस तरह हम मरे

और अमर हुए तानाशाह

 

9

स्वर्ग का रास्ता

 

सिर बैठ गए धर्म-ग्रन्थ

छाती पर बैठ गया ईश्वर

आंखों पर बैठ गए धर्म गुरू

हाथ बंध गए प्रार्थना में

लहुलुहान पैरों के साथ

पेट को दबाए हुए

मरी हुई आत्मा लेकर

चलते रहे हम

उन रास्तों पर

जो हमें नर्क में ले गए

स्वर्ग का वास्ता देकर

 

10

राजतंत्र

 

राजतंत्र पहले कहानियों में आता है

फिर हमारी रोजमर्रा की बातों में

बातों से बातें करता हुआ

वह आ जाता है किताबों में

हमें मौन देखकर

वह हमारे घरों में घुस आता है

किसी चालाक चोर की तरह

जब हम सोने लगते हैं

वह अपनी कहानी सुनाता है

उसकी कहानी में अप्सराएं होती हैं

देवी,देवता और ईश्वर होते हैं

राजा,महाराजा और राजकुमार होते हैं

जब हम नींद से उठते हैं अलसुबह

उदय हो चुका होता है

राजतंत्र का सूरज

11

संगोष्ठी

 

संगोष्ठी जारी थी

गोष्ठी में तर्कों की भूमिका

पत्थर निभा रहे थे

तर्क उड़ रहे थे

पत्थर बच रहे थे

पत्थरों का एक ढेर बचा था अंत में

जिसे समाधान कहा गया।

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