हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 96
रामकिशन मानः सजग, सज्जन और समर्पित अध्यापक नेता
सत्यपाल सिंह सिवाच
शायद यह अक्टूबर/नवम्बर 1980 की बात है जब मेरी रामकिशन मान से पहली मुलाकात हुई। मेरी पहली सरकारी नौकरी राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कुरुक्षेत्र में लगी थी और मान साहब यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ एजूकेशन में छात्र थे और हमारे विद्यालय में टीचिंग प्रैक्टिस के लिए आए थे। इसी मुलाकात में पता चला कि वे हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के कार्यकर्ता हैं। उन्होंने मुझे मास्टर सोहनलाल के अलावा शेर सिंह और अमृतलाल चोपड़ा के बारे में बताया। मेरे मार्क्सवादी होने का पता चलने पर बताया कि वे बहुत पहले से जुड़े हुए हैं। उस समय से ही मेरा उनके पास आना-जाना बना रहा। जैसा मैंने उनके संपर्क जाना, समझा और सीखा – वे उच्च मूल्यों के व्यक्ति थे; बहुत संवेदनशील इंसान थे; शिक्षक के रूप में साधक थे और साहित्यिक अभिरुचि रखते थे। संगठन में उनकी रुचि व्यवस्था परिवर्तन के राजनीतिक मुकाम से जुड़ी हुई थी।
रामकिशन का जन्म 18 नवंबर 1948 को करनाल जिले के बलाह गांव में श्रीमती बखतौरी देवी और श्री ज्ञानीराम के घर हुआ। उनका पुश्तैनी काम खेती और पशुपालन था। वे तीन भाई हैं। वे प्रभाकर ओ.टी. करके 05 सितंबर 1970 को हिन्दी अध्यापक नियुक्त हुए। सेवाकाल के दौरान स्वाध्याय जारी रखते हुए एम.ए. हिन्दी और बी.एड. किया। बाद में वे हिन्दी प्राध्यापक और मुख्याध्यापक बने तथा 30 नवंबर 2006 को मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत हुए। 15 दिसंबर 2014 को बीमारी के चलते उनका निधन हो गया ।
सेवा आने के थोड़े समय बाद ही वे यूनियन से जुड़ गए थे। बंसीलाल द्वारा अपनाई जा तानाशाही नीति और दूरदराज स्थानांतरण नीति में अध्यापक वर्ग के आक्रोश को भड़का था। करनाल जिले की हरियाणा राजकीय संघ की इकाई काफी सक्रिय थी। उसका प्रभाव रामकिशन पर भी पड़ा। वे इस आन्दोलन में जेल गए। यूनियन के साथ साथ वामपंथी विचारधारा से प्रभावित होने के कारण वे गहराई से आन्दोलनों से जुड़ गए थे। जब 1982-83 में संगठन में व्यक्तिवाद का बोलबाला बढ़ा तो रामकिशन मान करनाल जिले के प्रबुद्ध साथियों के साथ जनवादी कार्यप्रणाली के समर्थन में डटकर खड़े हुए। करनाल जिले के शिक्षकों को एकजुट रखने में इन्होंने धर्मसिंह, ओमप्रकाश आदि के साथ मिलकर अच्छी भूमिका निभाई।
वैसे वे सामान्यतः पदों की दौड़ से दूर रहते थे लेकिन अपने कार्यक्षेत्र ब्लॉक या जिले की कोई न कोई जिम्मेदारी लेकर फील्ड में सक्रिय रहते थे। इन्द्री क्षेत्र में संगठन की जड़ें मजबूत करने में इनका अहम् रोल रहा है। क्योंकि वे जागरूक राजनीतिक कार्यकर्ता रहे, इसलिए जनवादी आन्दोलन के निर्माण में भी गतिशील रहते थे। सूबा सिंह, तख्त सिंह, मोहनलाल, वैद्य कृष्णलाल आदि नेताओं के साथ इन्होंने जन संगठन निर्माण में भी सहयोग किया।
सन् 1973 में जेल जाने से शुरू हुआ उत्पीड़न की कार्रवाइयों का सिलसिला 1987, 1993 और बाद तक जारी रहा। उन्हें 1993 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था जो समझौते के निरस्त हुआ। वे स्थानीय स्तर पर शिक्षकों के लंबित मामलों के निपटारे के बारे में दक्ष कार्यकर्ता थे। बाद के दौर में वे मार्गदर्शन का काम ही करते रहे। सीधे आन्दोलन में भाग अवश्य लेते थे।
रामकिशन मान पहले शादी करने के इच्छुक नहीं थे। बहुत देर से ही उन्होंने 1979 में सुश्री शकुंतला से विवाह किया। वे भी अध्यापिका रहीं और अब सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। शकुंतला जी ने आन्दोलनों में पूरा समर्थन और सहयोग दिया है। उनके दो बच्चे हैं और दोनों विवाहित हैं। बेटी निशा आस्ट्रेलिया में रहती हैं। बेटा विप्लव मान जो एमबीए है अपनी कैंटीन चलाता है। (सौजन्य ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच
