मुंबई में युद्ध के विरुद्ध कविता और चर्चा गोष्ठीः शांति और मानवता के पक्ष में बुलंद हुई आवाज

मुंबई में युद्ध के विरुद्ध कविता और चर्चा गोष्ठीः शांति और मानवता के पक्ष में बुलंद हुई आवाज

  • जनता के सुख दुख और ‌संघर्षों के साथ खड़ा रहने वाला कवि ही उनकी सच्ची आवाज बन सकता है  :

हृदयेश मयंक

 

जनवादी लेखक संघ मुंबई, और स्वरसंगम फाउंडेशन  के संयुक्त तत्वावधान में “युद्ध के विरुद्ध कविता और चर्चा गोष्ठी” का आयोजन 15 मार्च 2026 को मीरा रोड, मुंबई में किया गया। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कवियों, लेखकों और साहित्यप्रेमियों ने भाग लेकर युद्ध और हिंसा के विरुद्ध तथा शांति और मानवता के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद की।

कार्यक्रम में जलेस महाराष्ट्र के पूर्व अध्यक्ष एवं कवि हृदयेश मयंक ने लेखक संगठनों की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि अधिकतर बड़े कवि अपने समय के जन आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। ज़ुल्म और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने के कारण अनेक रचनाकारों को यातनाएँ झेलनी पड़ीं और कई बार उन्हें विस्थापन का सामना भी करना पड़ा। उन्होंने कहा कि वैचारिक संगठनों से जुड़े लेखक केवल आत्म-संतुष्टि के लिए नहीं लिखते, बल्कि उनकी रचनाएँ समाज को विचार देती हैं और संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं। उनके अनुसार रचनाकारों में वर्गीय चेतना का होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि “वर्गीय चेतना से सम्पन्न कवि ही समाज में हो रही लूट को सही अर्थों में समझ सकता है।”

कार्यक्रम की शुरुआत में जलेस मुंबई के अध्यक्ष संजय भिसे ने वरिष्ठ साहित्यकारों हृदयेश मयंक, रमन मिश्र और राकेश शर्मा का पुष्पगुच्छ देकर सम्मान किया तथा जलेस के लिए उनके महत्वपूर्ण योगदान को विस्तार से रेखांकित किया।

प्रो. हूबनाथ ने अपने वक्तव्य में कहा कि हमारी संस्कृति युद्धों की संस्कृति रही है तथा संपूर्ण मानव समाज का इतिहास युद्धों से भरा रहा है।‌ इस संदर्भ में उन्होंने जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के दो पुत्रों भरत और बाहुबली के अहिंसात्मक संघर्ष की कथा सुनाई, जिसमें बड़े पैमाने पर रक्तपात से बचने के लिए युद्ध को प्रतीकात्मक मुकाबलों तक सीमित रखा गया था। इतिहास में यह प्रसंग निस्वार्थ प्रेम, त्याग और क्षमा का प्रतीक माना जाता है।

रमन मिश्र ने अपने लिखित वक्तव्य में  कहा कि इतिहास में जब-जब लेखकों ने नफ़रत की भाषा का साथ दिया है, समाज ने उसकी भारी कीमत चुकाई है। उन्होंने जापानी कवि सांकेची तोगे की कविताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि परमाणु विभीषिका के बीच से निकली उनकी चीख आज भी मनुष्यता को चेतावनी देती है।

कार्यक्रम के दूसरे भाग में हिंदी, उर्दू और मराठी भाषाओं में युद्ध-विरोधी कविताओं का पाठ हुआ। लगभग तीस रचनाकारों ने युद्ध के खिलाफ और शांति के पक्ष में अपनी कविताएँ प्रस्तुत कीं। इस काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता प्रसिद्ध उर्दू शायर सैय्यद रियाज़ रहीम ने की तथा संचालन प्रशांत जैन ने किया।

कविता पाठ करने वाले प्रमुख रचनाकारों में राकेश शर्मा, दिनेश शाकुल, हरिमृदुल, फरीद खान, रीता दास राम, आर. एस. विकल, रमन मिश्र, ज़ाकिर सरदार, ताजोद्दीन ताज, कमर हाजी पूरी, प्रतिमा राज, कल्पना उबाले, प्रतिमा सिन्हा, मीना ठक्कर, मुस्तहसन अज़्म, हीरालाल यादव, कृष्णा गौतम, अर्चना वर्मा, भूपेंद्र मिश्र, रोहित आदि शामिल थे। गायक दीपक खेर ने दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल पेश की।

इस अवसर पर ‘जसम’ के कलाकार नितिन कुशवाहा और विनीता वर्मा द्वारा कविता पोस्टर प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। इन पोस्टरों में विश्व की चुनिंदा युद्ध-विरोधी कविताओं के साथ-साथ समकालीन प्रतिरोध की कविताओं को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, जिसे उपस्थित जनों ने खूब सराहा।

कार्यक्रम का संचालन मुख्तार खान और कवि प्रशांत जैन ने किया, जबकि अंत में जुल्मीरामसिंह यादव ने जनवादी लेखक संघ और स्वर संगम फाउंडेशन  की ओर से सभी प्रतिभागियों और उपस्थित साथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध कथाकार हरनोट जी और लेखक चित्रकार श्रीकांत आपटे , अजय रोहिल्ला, डा. गुलाबचंद यादव,  हंसराजसिंह ,एडवोकेट संजय पांडे , मोइन अंसार, दिनेश गुप्त , पुलक चक्रवर्ती, राहुल , गरिमा  और कलाकार समीर त्र्यंबक की उपस्थिति भी विशेष रूप से प्रेरणादायक रही।

रिपोर्टः मुख्तार खान

सचिव, जनवादी लेखक संघ, महाराष्ट्र

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