हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-94
पवन सांभली – जटिल हालात में भी डटे रहे
सत्यपाल सिवाच
पवन कुमार सांभली हरियाणा रोडवेज वर्कर्स यूनियन और सर्वकर्मचारी संघ के ऐसे कार्यकर्ताओं में रहे जिन्होंने निरन्तरता में काम करके अपनी पहचान बनाई। वे मजदूर परिवार की पृष्ठभूमि से निकलकर आन्दोलन के राज्य स्तर के कार्यकर्ता बने। उनका जन्म 25 नवंबर 1963 को करनाल जिले के साम्भली गांव में श्रीमती कमला देवी और श्री रामकिशन के घर हुआ।
उनके पिता जी शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे और 30 अप्रैल 1986 को राजकीय उच्च विद्यालय बरास (करनाल) से चपरासी-कम-चौकीदार पद से सेवानिवृत्त हुए थे। साधारण मजदूर परिवार में पले-बढ़े पवन को जीवन की व्यावहारिक कठिनाइयों को प्रारंभ से परिचय हो गया था। वे पाँच बहनों के इकलौते भाई हैं। पिता जी के थोड़े से वेतन में बड़े परिवार का निर्वाह करना मुश्किल काम था।
उन्होंने आठवीं कक्षा पिता के स्कूल बरास से ही पास की थी। बाद में अपने गांव के राजकीय उच्च विद्यालय सांभली से दसवीं परीक्षा पास करने के बाद डीएवी कॉलेज करनाल में उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश ले लिया। यहाँ से बी.ए. द्वितीय वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की। 03 जनवरी 1983 को हरियाणा रोडवेज में क्लर्क की नौकरी लगने के बाद वे आगे की शिक्षा जारी नहीं रख पाए। इनकी नौकरी लगने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार हुआ। 30 नवंबर 2021 को वे अधीक्षक पद से सेवानिवृत्त हुए।
पवन जिस समय सेवा में आए उस समय धर्म सिंह गांव माखू माजरा हरियाणा रोडवेज में कार्यरत थे जिनका पवन कुमार पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे बहुत संवेदनशील, सूझबूझ रखने वाले और संयमी नेता थे। उनके साथ वे डॉक्टर रामजीलाल और डॉक्टर वी. बी. अबरोल से मिलते रहते थे। इसी वजह से यूनियन के साथ भी लगाव हुआ और वामपंथी एवं प्रगतिशील विचारों से भी प्रभावित हुए।
जब सन् 1986 में सर्वकर्मचारी संघ का गठन हुआ और बड़ा आन्दोलन चल पड़ा तो ये भी उसका हिस्सा बनने वाले रोडवेज के थोड़े से जागरूक कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए। एक बार चल पड़े तो फिर पूरे सेवाकाल में आन्दोलन से जुड़े रहे। वे हरियाणा रोडवेज वर्करज यूनियन में डिपो और राज्य स्तर पर पदाधिकारी रहे। वे छह साल राज्य प्रेस सचिव, चार वर्ष सचिव और 4 वर्ष अन्य पदों पर निर्वाचित हुए। इस दौरान उन्होंने करनाल, कुरुक्षेत्र और अम्बाला की सर्वकर्मचारी संघ की जिला कमेटियों में भी पदाधिकारी के रूप में काम किया।
सन् 2012 विभागीय यूनियन के चुनाव मतभेद होने पर ये हरिनारायण शर्मा द्वारा गठित यूनियन में चले गए। वहाँ तीन साल राज्य कोषाध्यक्ष और तीन साल उपमहासचिव रहे। अलग यूनियन में चले जाने पर भी इन्होंने साझा संघर्ष के पक्ष में काम किया। जिसके चलते 2018 में साझा संघर्ष खड़ा हो पाया।
जिस दौर में वे कार्यकर्ता बने वह तूफानी संघर्षों का दौर कहा जा सकता है। वे तीन बार जेल में रहे। सन् 1989 में तीन दिन करनाल जेल में, 1991 में चण्डीगढ़ की बुड़ेल जेल में और 1993 में ग्यारह दिन सेंट्रल जेल अम्बाला में रहे। सन् 1989 के रोडवेज आन्दोलन और 1998 के नर्सिंग आन्दोलन में उन्हें सेक्शन 7 में चार्जशीट किया गया।
उन्हें 1989 में 15 महीने, 1991 में छह महीने और 1998 में सात महीने निलंबित रखा गया। सन् 1993 में उनकी सेवाएं बर्खास्त कर दी गई। सन् 1989, 1994, 1998 और 2004 में उन्हें उत्पीड़न स्वरूप स्थानांतरण किया गया। उन्हें 1989, 1991, 1993 और 1998 में पुलिस से भिड़ंत का सामना करना पड़ा।
दरअसल रोडवेज का बस स्टैंड हड़ताल वाले दिन पुलिस के साथ टकराव का स्थान बन ही जाता था। सन् 1996-97 के नगरपालिका आन्दोलन में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। उत्पीड़न समस्त कार्रवाइयां आन्दोलनों के समझौते के साथ निरस्त होती रही।
पवन कुमार का मानना है कि सर्व कर्मचारी संघ के संघर्षों से बहुत कुछ सीखने को मिला है। ट्रेड यूनियन और राजनीतिक सूझ-बूझ के लिए वे अपने संघर्षों को याद करते हैं। संगठन के मंच से निरन्तरता में जागरूकता के शिविर लगाए जाते थे।
विशेषकर जब हम रादौर में रहते थे तो कर्मचारियों ही नहीं, अन्य तबकों को संगठित करने व संघर्षों में उतारने की कोशिशें की जाती थी। उसी बढ़ी हुई चेतना के कारण रिटायर्ड कर्मचारियों और किसान आन्दोलनों में भी सक्रिय रह पाए हैं। पवन कुमार ने बताया कि वे किसी नेता या अधिकारी के संपर्क में नहीं रहे और न कभी किसी से निज हित के लिए संपर्क किया।
पवन कुमार का सन् 1983 में सुश्री लक्ष्मी देवी के साथ हुआ। उनकी एक बेटी और दो बेटे हैं। सभी विवाहित हैं। बेटी पूजा पिंजोर में रहती हैं। दामाद बद्दी – हिमाचल प्रदेश में निजी कंपनी में काम करते हैं। फिलहाल उनका परिवार डिफेंस इन्कलेव, बोहा रोड, अम्बाला कैंट में रहता है।
बड़ा बेटा हेमंत कुमार भारतीय नौ सेना में 15 वर्ष की सेवा के बाद हरियाणा पुलिस में अनुबंध पर काम करता है। उसके दो बेटे हैं। छोटा बेटा भूपेश अम्बाला में Western Overseas कंपनी में कार्यरत है। उसका एक बेटा और एक बेटी है। उन्होंने बताया कि परिवार ने आन्दोलनों में पूरा साथ दिया है। जब वे रादौर में थे हमारे दर्जनों परिवार स्वजनों की तरह ही रहते थे। सभी आन्दोलनों से जुड़े हुए थे। इसीलिए एक दूसरे की पारिवारिक तौर पर पूरी मदद करते।
जब शुरू में यूनियन में रुचि लेने लगे तो गांव के कुछ लोग पिता जी को कहते – यूनियन में जमीन-जायदाद वाले तगड़े परिवारों के लोग जाते हैं, अपने बेटे को रोको। धीरे-धीरे पिता जी सहमत होने लगे थे। जब पवन जेल में थे तो पिताजी मिलने आए और डटे रहने का हौसला दिया। उन्होंने कहा था – जहाँ सारा भाईचारा होता है वहाँ जीत होती है। पिताजी 1973 की हड़ताल में अध्यापकों के साथ दिल्ली रैली में भी गए थे। पवन कुमार पत्नी भी रादौर में जनवादी महिला समिति में सक्रिय रहीं। उनके चाचा-ताऊ के परिवारों और कुछ रिश्तेदारों में से कुछ लोग आर एस एस और भाजपा के समर्थक बने हुए हैं। पवन कुमार का उनसे वैचारिक मतभेद रहता है। (सौजन्य ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच
