उफ् ! वीरेंद्र यादव केवल लेखक नहीं, जिन्दा इंसान भी थे

स्मृति शेष

उफ् ! वीरेंद्र यादव केवल लेखक नहीं, जिन्दा इंसान भी

  • फलक तक पहुंचे थे। बड़ा कद पाया, थोड़ा दंभ भी 
  • साहित्य को ‘विचार का दस्तावेज’ बनाने का जोखिम उठाया था
  • आत्मकेंद्रित एवं अहं का आरोप वैचारिक कट्टरता का आभास
  • वैचारिक स्पष्टता व प्रतिबद्धता ने उन्हें ‘आवश्यक विवाद’ बुना

कुमार सौवीर

हिंदी साहित्य के जटिल और प्रभावशाली आलोचक वीरेंद्र यादव का आज लखनऊ में निधन हो गया। जौनपुर में जन्मे वीरेंद्र यादव 75 वर्ष के थे। उनके जाने से साहित्यिक जगत में एक ऐसी शून्यता पैदा हुई है, जिस पर सहमति और विवाद दोनों की छाया है।

लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी से वीरेंद्र यादव की पहचान प्रगतिशील लेखक संघ के एक प्रमुख स्तंभ तक की रही। उनका लेखन मुख्यतः दलित-बहुजन विमर्श, प्रगतिशील चिंतन और साहित्य के समाजशास्त्र पर केंद्रित रहा। ‘उपन्यास और देश’, ‘नई सहस्राब्दी का दलित आंदोलन’ और प्रेमचंद पर उनके कार्यों ने हिंदी आलोचना को एक ठोस वैचारिक आधार दिया। उनकी अंतर्दृष्टि साहित्य को केवल कलात्मक अभिव्यक्ति न मानकर सामाजिक संघर्ष का दस्तावेज मानने में थी।

वैचारिक स्पष्टता व प्रतिबद्धता: यादव कभी भी विचारधारात्मक रूप से डगमगाए नहीं। उनकी लेखनी में वर्ग, जाति और सामाजिक न्याय के प्रश्न हमेशा केंद्र में रहे। यह दृढ़ता उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी। उन्होंने प्रेमचंद को एक पवित्र स्मारक बनाकर नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारक के रूप में पढ़ा। उनका विश्लेषण प्रेमचंद की सीमाओं और संभावनाओं, दोनों को उजागर करता था।

प्रगतिशील लेखक संघ जैसे संगठनों के माध्यम से उन्होंने युवा लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित और प्रेरित किया।

आलोचना के घेरे में उनका वह पक्ष जो विवादों का कारण बना, वह था। आत्मकेंद्रित एवं अहं। आरोप लगता रहा कि साहित्यिक हलकों में उनकी छवि अक्सर एक ऐसे व्यक्ति की रही जो स्वयं को हिंदी आलोचना का ‘अपरिहार्य’ केंद्रबिंदु मानते थे। उनका यह भाव कि उनका मार्ग ही सही मार्ग है, अक्सर उनके और अन्य विचारधाराओं के लेखकों के बीच टकराव का कारण बनता था।

साहित्य को केवल ‘विचार का दस्तावेज’ बनाने का जोखिम: कई समालोचकों का मानना था कि यादव साहित्य के सौंदर्यशास्त्र, भाषाई प्रयोग और कलात्मक सूक्ष्मताओं को उपेक्षित करके, उसे महज एक राजनीतिक-सामाजिक पाठ में बदल देते थे। यह द्वंद्व उनकी आलोचना दृष्टि की एक सीमा के रूप में चिह्नित किया जाता रहा।

वैचारिक कट्टरता का आभास भी उनकी बहसों और लेखन में दिखा। कई बार लचीलेपन और संवाद की भावना के अभाव की समीक्षकों ने आलोचना की। विरोधी विचारधारा के प्रति उनका रुख कई बार असहिष्णु प्रतीत होता था।

इसके बावजूद वीरेंद्र यादव हिंदी साहित्य के लिए एक ‘आवश्यक विवाद’ थे। वे एक ऐसे योद्धा आलोचक थे जिन्होंने साहित्य को निष्क्रिय सौंदर्यबोध की दुनिया से निकालकर सामाजिक संघर्ष के रणक्षेत्र में ला खड़ा किया। उनकी ताकत उनकी अडिग प्रतिबद्धता में थी, और उनकी कमजोरी शायद उसी प्रतिबद्धता में अतिरेक और लचीलेपन के अभाव में। उनका व्यक्तित्व और लेखन साहित्यिक जगत में समान रूप से सम्मान और असहमति का पात्र रहा।

लेकिन इसके बावजूद जब भी मैंने उनसे बातचीत की, वे अपनी शैली में ही व्यवहार करते रहे, लेकिन विषय पर केवल शिक्षक की भूमिका केंद्र में रहे।

उनके जाने से हिंदी आलोचना ने एक ऐसी आवाज खो दी है जो चुपचाप सहमति देने से कहीं अधिक, विवाद और पुनर्विचार को जन्म देती थी। उनकी विरासत उनके विचारों और उन विवादों, दोनों में जीवित रहेगी, जिनसे वे जुड़े रहे।

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