नए जनवादी लेखक
जगदीश्वर चतुर्वेदी
नए जनवादी तो मोदी की किसी नीति के खिलाफ नहीं लिखते। वे करोड़ों लोगों को बेरोजगार कर देने वाली मोदी की आर्थिक नीतियों पर कभी एक अक्षर नहीं लिखते।
वे सिर्फ कहानी,उपन्यास,नाटक लिखते हैं और फेसबुक पर लघु कहानियां लिखते हैं। वे खुश हैं कि उन्होंने साहित्य की सेवा की है। जनता जाए भाड़ में।सिर्फ उनका नाम और हिंदी साहित्य ऊँचा रहे।क्या इससे साहित्य और लेखक का दर्जा ऊँचा उठेगा ?
नया जनवादी सिद्धांत है-
लेखक स्वतंत्र है और कलम उससे भी स्वतंत्र है ! इनसे लेखक के आचरण स्वतंत्र हैं !इनके विचारधारात्मक पक्षों को काशी की गंगा में बहा दो।शान से कहो हम जनवादी हैं !
नए जनवाद में विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है। सिर्फ लेखक का नाम बड़ा हो, वह जो मन आए करे ,जो मन में आए लिखे।
हम खुश हैं कि वह हमारा मित्र है। मित्रता ही जनवाद है।उसके लिए जनवादी मूल्यों का होना जरुरी नहीं है!
नए जनवाद के झंडाबरदार लेखकों के मुखिया और जलेसं के तत्कालीन अध्यक्ष असगर वजाहत ने पहले नए नागरिकता कानून के खिलाफ आंदोलनरत मुसलिम महिलाओं को आंदोलन न करके स्वेटर बुनने का सुझाव दिया था। बाद में एक कदम आगे जाकर गांधी-गोडसे को समान खड़ा किया। यह नए किस्म का जनवाद है जो खासतौर पर प्रचारित किया जा रहा है।
नए जनवाद का बड़ा लक्ष्य है मोदी के पीछे गोलबंद रहो।वैसे साहित्य में यह नयी चीज नहीं है,बांग्ला के जो महान लेखक बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ चाय पीते थे वे सब ममता के गुंडाराज के साथ चले गए और एक लुटेरे चिटफंड वाले के पैसों पर मौज करने अमेरिका में विश्व बांग्ला सम्मेलन में निकल पड़े थे।यह है नए जनवाद का जनविरोधी साहित्यिक चेहरा।
इसने हिन्दी -उर्दू में पैर पसारने शुरु कर दिए हैं।बड़ी संख्या में हिन्दी-उर्दू के तथाकथित प्रगतिशील-जनवादी लेखक इन दिनों आरएसएस के फ्रंट संगठनों की मलाई खाने और मोदी के अनुसार काम करने में लगे है।
लेखक संगठन भी इस बीमारी से मुक्त नहीं हैं, क्योकि बांग्ला में गणतांत्रिक लेखक-शिल्पी संघ के अनेक प्रतिष्ठित लेखक ममता के प्रेम में मगन हैं। इनमें बंगाल के कई बड़े हिन्दी लेखक भी शामिल हैं।
नए जनवाद का लक्ष्य है मलाई खाओ मजे में रहो।साहित्य इसी तरह चारण साहित्य में नए ढ़ंग से रुपान्तरित किया जा रहा है। जगदीश्वर चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार
