मुनेश त्यागी की कविता – किसका विकास कैसा विकास?

कविता

किसका विकास कैसा विकास?

 मुनेश त्यागी

 

जोर जोर से कहकर आए थे

करेंगे हम सबका विकास,

पूछो तो सही इनसे जरा

हुआ है यहां किसका विकास?

 

विकास तो दिख नहीं रहा

यहां तो पसर गया है विनाश,

झूठ बोलकर हड़प ली सत्ता

तोड़ दिया है सबका विश्वास।

 

धरती पूछे, सारी सड़कें पूछें

पूछ रही हैं सारी हवाएं,

भैया मेरे बताओ हमको

किसका हुआ कैसा विकास?

 

किसान पूछें मजदूर पूछते

पूछ रही है जनता सारी,

ठहरो तो जरा बताओ हमको

कहां गुम हो गया विकास?

 

संविधान और कानून रौंदा

जनतंत्र को बना दिया धनतंत्र,

सेठों की भर दी हैं तिजोरियां

हुआ है बस उनका ही विकास।

 

चिंतित दिख रही सारी धरती

चिंतित दिख रहा पूरा आकाश,

पूछ रहे सारे खेत और खलिहान

किसका विकास कैसा विकास?

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