मुनेश त्यागी की कविता – भाईचारा और हिंदुस्तान खतरे में

भाईचारा और हिंदुस्तान खतरे में

मुनेश त्यागी

जनतंत्र खतरे में
आज़ादियां खतरे में,
मैं देख सुन रहा हूं
पूरा का पूरा संविधान खतरे में।

खेती खतरे में
जमीन खतरे में,
मैं देख सुन रहा हूं
देश का अन्नदाता किसान खतरे में।

वादी खतरे में
अदालतें खतरे में,
मैं देख सुन रहा हूं
कानून और इंसाफ खतरे में।

चाल चलन खतरे में
लोक लाज खतरे में,
मैं देख सुन रहा हूं
जननी का मान सम्मान खतरे में

ना दीन की चिंता
ना ईमान की चिंता,
मैं देख सुन रहा हूं
पूरा का पूरा दीन ईमान खतरे में।

ना पक्की नौकरी की गारंटी
ना न्यूनतम वेतन की गारंटी,
मैं देख सुन रहा हूं
सारे मजदूर और नौजवान खतरे में।

कुछ हिंदू खतरे में
कुछ मुसलमान खतरे में,
मैं देख सुन रहा हूं
भाईचारा और हिंदुस्तान खतरे में

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