शहीदी दिवस पर
हम इंकलाब लाए हैं!
-मंजुल भारद्वाज
सियाह रात में
जुगनू जगमगाए हैं
नाउम्मीद जहाँ में
हम इंकलाब लाए हैं !
जब जब बढ़ता है
जुल्म हुकुमरान का
हम मेहनतकश
तब तब इंकलाब लाए हैं !
धर्मांधता की बलि चढ़ती
मनुष्यता को मुक्त कराएं हैं
हम बुद्ध बन मुस्कुराएं हैं
हम इंकलाब लाए हैं!
भेदभाव,उंच नीच
जातपात की खाई को मिटाएं हैं
राजा और रंक को
नानक वाली
एक संगत एक पंगत में बिठाएं हैं
हम इंकलाब लाए हैं !
बलिदान मांगती है
जब मादरे वतन
तब पीछे हटते नहीं
हंसते हंसते बनकर
भगत,सुखदेव,राजगुरु
फांसी का फंदा चूम आएं हैं
हम इंकलाब लाए हैं !
सदियों से साम्राज्यवाद के
दमन से दफ़न आज़ादी को
बंदूक,टैंक,अणुबम से नहीं
बापू वाली अहिंसा से
देश को आज़ाद कराएं हैं
हम इंकलाब लाए हैं!
जब जब नामोनिशान
मिटाना चाहा हुकुमरान ने
हम नया इतिहास रच आएं हैं
हम इंकलाब लाए हैं!
