कविताः पुण्य तिथि विशेष – 11 जनवरी
सादगी के प्रतीक : लाल बहादुर शास्त्री
मनजीत सिंह
“सादा जीवन अर ऊँचे विचार”
यो नारा तो बहुतां नै दिया सै,
पर अगर किसी आदमी के जीण में
इस बात नै साच्चा उतरता देखणा हो,
तो वो थे लाल बहादुर शास्त्री।
प्रधानमंत्री जैसे बड़े पद पै पहुंच कै भी
उनकी सादगी वैसी ही रही
जैसी बचपन में थी।
जो बोल्या, पहले खुद अपनाया—
यो ही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी।
अगर महात्मा गांधी कहैं थे
“म्हारा जीवन ही म्हारा संदेश सै”,
तो शास्त्री जी भी इस कसौटी पै
पूरे उतरै।
इत्तफाक देखो—
दोनों की जयंती एक ही दिन आवै सै।
कई मायनों में
शास्त्री जी भी गांधी जी से
कम ना थे।
प्रधानमंत्री बणण के बाद
देश-विदेश में लोग सोचण लागै
कि “यो नन्हा सा आदमी
इतणा बड़ा देश कैसे संभालेगा?”
पर जब पाकिस्तान नै हमला किया,
तो शास्त्री जी नै ऐसा करारा जवाब दिया
कि अयूब खान घबरा गया।
जिस आदमी नै वो सीधा,
सरल अर मृदुभाषी समझै था,
उसे यो पता ही ना था
कि उसके पीछे
लोहे जैसा मजबूत आदमी छुपा सै।
घुसपैठ करकै हार्या हुआ दुश्मन
अर कर भी क्या सकता था—
अपने ही लगाई आग में
उसके हाथ जल चुके थे।
ऐसी सादगी की प्रतिमूर्ति
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म
2 अक्टूबर 1904 नै
बनारस के पास रामनगर कस्बे में हुआ।
उनके पिता शारदा प्रसाद
इलाहाबाद की कायस्थ पाठशाला में
अध्यापक थे।
शारदा प्रसाद अर उनकी घरवाली
रामदुलारी—
दोनों ही बड़े धार्मिक अर संस्कारी थे।
बचपन में ही पिता गुजर गए,
तो मां के सारे संस्कार
उनके जीण में बस गए।
उनकी परवरिश
ननिहाल में नाना हजारीलाल के साए में हुई,
जो खुद स्कूल मास्टर
अर सुसंस्कृत आदमी थे।
शास्त्री जी का बचपन
घणी गरीबी में बीता।
खेलण का मन था—
हॉकी अर फुटबॉल खेलणा चाहते थे,
पर जब घर में खाने के पैसे ना हों,
तो खेल का सामान कहां से आवै?
पर उनकी तेज बुद्धि नै रास्ता ढूंढ लिया।
खजूर के फूल बटोर कै,
फटे-पुराणे कपड़े में लपेट कै
वो खुद गेंद बणा ले।
मजबूत पेड़ की टहनी तोड़ कै
हॉकी स्टिक बणा ले।
परिस्थितियां चाहे जैसी हों,
लाल बहादुर नै
उन्हें अपने अनुकूल बणाण की
पूरी कोशिश की।
वो जानै थे
कि कर्म का रास्ता
कभी फूलां की सेज ना होया।
उन्होंने कभी
अपने लक्ष्य के लिए
आसान राह ना पकड़ी।
कद छोटा था,
शरीर कमजोर था,
पर हिम्मत बला की थी।
इतिहास गवाह सै—
आसान काम करै वाला
कभी महान काम ना कर सके।
लाल बहादुर जी
संघर्ष की मिट्टी से बने थे।
प्रेम देना अर पाणा
उन्होंने ननिहाल से सीखा।
दुखी आदमी नै देख कै
पिघल जाणे का गुण
उन्हें मां से मिला।
शिक्षा का मान
उन्हें पिता के खून से मिला।
जैसी भी हालत आई,
उन्होंने खुद नै
उसी में ढाल लिया।
दुख सहे,
पर टूटे ना—
बल्कि और निखर गए।
वो कहा करै थे—
“संतोष के किले नै
कोई भेद ना सके।”
थोड़े में खुश रहणा
उनकी बड़ी ताकत थी।
परेशानियां साथ चलती रहीं,
फिर भी उन्होंने लिखा—
“कुल मिलाकै
म्हारा स्कूली जीवन
हंसी-खुशी बीता।”
उनकी बोली मीठी थी
अर व्यवहार दोस्ताना।
मित्रता के लिए बढ़ा हाथ
कभी ठुकराया ना।
अर जब जरूरत पड़ी,
तो दोस्ती का हाथ
आगे बढ़ाण में
कभी हिचकिचाए ना।
कर्म के मामले में
वो हमेशा गंभीर रहे।
उन्होंने अपने जीण में
छोटे-बड़े घणे काम किए,
पर किसी काम नै
नीचा समझ कै ना देख्या।
हर काम नै
कुशल कारीगर की तरह
पूरे मन से किया।
जो आदमी कर्म में
सावधान अर साहसी हो,
वही सबसे आगे निकले सै—
अर यो दोनों गुण
शास्त्री जी में भरपूर थे।
घर की हालत
कुछ खास ना थी,
पर देशसेवा
उन्हें सबसे ऊपर लागै थी।
कर्म नै पूजा मानण वाले
गांधी जी से
उनका गहरा लगाव था।
पहली बार
गांधी जी का भाषण सुना,
तो वो पूरी तरह
मंत्रमुग्ध हो गए।
लाल बहादुर
मां की इजाजत जरूरी समझै थे।
जब उन्होंने देशसेवा की बात कही,
तो मां बोल्ली—
“बेटा, मन्नै तुझ पै पूरा भरोसा सै।
तू कोई भी फैसला
सोच-समझ कै ही करेगा।”
मां की यो बात
उनके दिल का बोझ उतार गई।
इजाजत मिलते ही
वो छात्र आंदोलन में कूद पड़े।
1921 में
उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा,
पर रत्ती भर भी अफसोस ना हुआ।
कुछ घंट्यां बाद
चेतावनी देकै
उन्हें छोड़ दिया गया।
एक बार
उन्हें साइकिल खरीदणी थी,
पर पैसे ना थे।
पर लाल बहादुर
मुश्किलां नै
जिंदगी की परीक्षा मानै थे
अर मुस्कुरा कै सह ले।
उनकी सोच
इन पंक्त्यां में दिखै सै—
मुश्किलें आदमी का हौसला परखैं सै,
सपणां पै पड़्या पर्दा हटावैं सै।
गिर जावै, गिर कै संभल जा,
ठोकरां ही चाल सिखावैं सै।
जिंदगी की सच्चाई यो सै
कि गिरणा अर गिर कै संभलणा
ही चलणा सिखावै सै।
लाल बहादुर
भीड़ से अलग सोचै थे,
इसीलिए
अपणी अलग पहचान बना सके।
उनकी घरवाली
ललिता देवी
भी सादगी की मिसाल थीं।
जब शास्त्री जी
केंद्रीय मंत्री बने,
तो भी ललिता जी के कपड़े
दो-चार से ज्यादा ना बढ़े—
वो भी तब,
जब बेट्यां नै
साड़ी पहनाण की जिम्मेदारी ले ली।
आजादी के बाद
शास्त्री जी नै
पुलिस अर यातायात मंत्री बनाया गया।
उत्तर प्रदेश में
सड़क यातायात का राष्ट्रीयकरण
उनका बड़ा फैसला था।
बाद में
दूसरे राज्यां में भी
यो लागू हुआ।
नेहरू जी
शास्त्री जी की काबिलियत
अच्छी तरह जानै थे।
27 मई 1964 नै
नेहरू जी के गुजर जाण के बाद
देश में सवाल उठ्या—
अब देश नै
कौन संभालेगा?
भारत का भविष्य
कौन संवारेगा?
नेहरू जी पहले ही
लाल बहादुर शास्त्री नै
भावी प्रधानमंत्री
मान चुके थे।
पर किस्मत नै
ज्यादा मौका ना दिया।
10 जनवरी 1966 की रात
दिल का दौरा पड़ा
अर 11 जनवरी की सवेरे
वो परमात्मा में
लीन हो गए।
**देह चली गई,
पर सादगी, ईमानदारी
