कुलभूषण आर्य : अग्रिम मोर्चे के नायक 

हरियाणा : जूझते जुझारू लोग – 99

कुलभूषण आर्य : अग्रिम मोर्चे के नायक

सत्यपाल सिवाच

मैं उन्हें बचपन से जानता हूँ। वैसे हमारे इलाके में आर्यसमाज का प्रभाव बहुत पहले से रहा है। जब मैं पाँचवीं कक्षा में पहुंचा तो योग शिविरों में जाने लगा।  जगतसिंह आर्य सामान्यतः मुख्य आयोजक होते थे। उन शिविरों में कुलभूषण और उनके चचेरे भाई वेदप्रकाश मलखंभ और दूसरे जोखिम वाले व्यायाम करते थे। हम बच्चों के लिए वे आदर्श की तरह थे। बाद में कर्मचारी आन्दोलन और वामपंथी लहर में काम करते हुए ये रिश्ते और अधिक प्रगाढ़ हो गए।

सन् 1986 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरियाणा में नॉन-टीचिंग स्टाफ आंदोलन जोरों पर था। अभूतपूर्व सफल हड़ताल के बावजूद तत्कालीन हरियाणा सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन हठधर्मिता पर अड़ा रहा और कर्मचारियों का आंदोलन कुचलने की कोशिश कर रहा था। इसके समर्थन में हरियाणा के सभी विभागों के कर्मचारी एकजुट हुए और कर्मचारी हितों की रक्षा के लिए एक साझा संगठन बनाने की सहमति बनी, जिसका नाम सर्व कर्मचारी संघ रखा गया।
सर्व कर्मचारी संघ की जिला भिवानी इकाई बनाने के लिए कर्मचारियों की मीटिंग में सक्रिय लोग जुटे। सरकार के आचरण और तानाशाही के रवैये को देखते हुए किसी ऐसे आदमी को नेतृत्व देने पर सहमति बनी जो साहसी हो, निडर हो, ट्रेड यूनियन का जानकार हो और समझदार हो। विचार-विमर्श के बाद सभी की सहमति मिल्क प्लांट कर्मचारी यूनियन के नेता  कुलभूषण आर्य पर बनी।
उन्होंने कुछ समय पहले मिल्क प्लांट में लंबी हड़ताल का नेतृत्व किया था। इस तरह सभी विभागों के कर्मचारी आंदोलन के नेतृत्व की जिम्मेदारी  कुलभूषण आर्य को मिली। इसके बाद हरियाणा में ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत हुई और सरकार की तानाशाही का मुकाबला करते हुए कर्मचारी आंदोलन मजबूत हुआ।

दिनांक 13.08.1948 को स्वाधीनता प्राप्ति के लगभग एक साल बाद महम चौबीसी जिला रोहतक के गाँव भैणीसुरजन में श्रीमती छोटोदेवी और श्री जगत सिंह आर्य के घर पुत्र ने जन्म लिया। पालने में पुत के पांव पहचान लेने को सार्थक करते हुए उन्हें “कुलभूषण” नाम दिया गया। इनके पिता अपने क्षेत्र के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, समाज सुधारक और आर्य समाज के अगुवा रहे हैं। ये तीन भाई हैं। कुल भूषण ने राजकीय उच्च विद्यालय, महम से दसवीं कक्षा पास करने के बाद जाट कॉलेज रोहतक से ग्रेजुएशन उपाधि प्राप्त की। परिवार और परिवेश के संस्कारों के चलते उनमें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का विचार बहुत गहराई तक पैठा हुआ था।

शिक्षा प्राप्ति के बाद वे 1973 में वीटा मिल्क प्लांट भिवानी में दुग्ध सोसायटिज् के सुपरवाइजर नियुक्त हो गए। उन दिनों सहकारी क्षेत्र के इन प्लांटों में नौकरशाही हावी थी जिसके फंड्स का दुरुपयोग भी हो रहा था। कुलभूषण ने अम्बाला के भगवतस्वरूप शर्मा तथा कुछ अन्य सक्रिय साथियों के साथ मिलकर यूनियन का गठन किया। इसके बैनर तले 1980 में आन्दोलन छेड़ा गया। वे उस समय 18 दिन आमरण अनशन डटे रहे और अन्ततः कर्मचारियों की माँगें माने जाने पर आन्दोलन समाप्त हुआ।

सर्वकर्मचारी संघ के गठन के बाद भिवानी के पहले जिला अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में जिला राज्य अग्रणी मोर्चों में शामिल हो गया। वे आन्दोलन में कई गिरफ्तार हुए, हिरासत में लिए तथा पुलिस दमन के शिकार हुए। स्वभाव से ही वे बेबाक ढंग से अपने को झोंक देने वाले थे। उनके धैर्य, शौर्य, संयम और सूझबूझ के चलते भिवानी जिला हर आन्दोलन में चर्चित रहा। पूरे राज्य में वीटा मिल्क प्लांटस् की यूनियन काफी सुदृढ़ हो गई थी और उसने सरकारी कर्मचारियों के समान सुविधाएं हासिल की थी। मैनेजमेंट को यह गवारा नहीं था। इसलिए सन् 1990 भिवानी मिल्क प्लांट को बंद करने का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला लिया गया और सभी कर्मचारी देय लाभ देकर नौकरी से बाहर कर दिए गए।

केरल के एर्नाकुलम के बाद हरियाणा में भी पूर्ण साक्षरता की मुहिम चली तो भिवानी में इसका नेतृत्व कुलभूषण आर्य को सौंपा गया। उन्होंने पूर्ण समर्पण भाव से काम शुरू कर दिया।  आर.के.खुल्लर उन दिनों यहाँ एसडीएम थे। वे स्वयं भिवानी की टीम से गहराई से प्रभावित थे लेकिन जिला प्रशासन के साथ गंभीर मतभेद के चलते जिले के अभियान को बंद करवा दिया गया। आर्य साहब उच्च नैतिक मूल्यों को मानते थे। इसलिए गलत बात के आगे झुकने के बजाए बाहर होने का विकल्प चुना।

इसके बाद वे मजदूरों के संगठन सीटू में काम करने लगे। उन्हें 1996 में जिलाध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने जिले में ग्रामीण चौकीदारों को संगठित करने में महती भूमिका निभाई। वे मनरेगा मजदूरों को संगठित करने में भी जुटे।

सन् 2005 में अखिल भारतीय किसान सभा के जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभाई। उस समय मंढियाली में हुए पुलिस गोलीबारी में किसान मारे गए। किसान सभा ने इसके विरुद्ध आन्दोलन खड़ा किया तो सरकार ने उनको गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया।

वे एक योद्धा थे। जेल या दमन उन्हें चुप नहीं कराया जा सकता था। उन्होंने 2011 से 2013 तक जन संघर्ष समिति, भिवानी के संयोजक का कार्यभार भी संभाला। जब समस्या का हल नहीं होता था तो संघर्ष को तेज करने के लिए आंदोलन किए जाते थे। साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर भी बहुत सारे सेमिनार एवं चर्चाएं आयोजित करवाईं। इसी दौरान कई साथियों से मिलकर हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति, भिवानी को फिर से सक्रिय करने की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली।
उनके चरित्र में पारदर्शिता, सादगी और अपने हित से पहले समाज के हित को महत्व देने की विशेषता थी। वे बड़े-बड़े पदों पर रहते हुए भी हमेशा सरल बने रहे और साथ काम करने वालों के लिए प्रेरणा बने रहे। संघर्षों के बीच व्यस्त रहते हुए भी उनके भीतर का साहित्यकार जाग्रत और सक्रिय रहा। उन्होंने जन समस्याओं पर अनेक रागनियां लिखी।अच्छे स्वास्थ्य और मजबूत इरादों के धनी इस अग्रिम मोर्चे के सैनिक के कोविड से संक्रमित हो गए और यह महामारी ऐसे जीवट वाली शख्सियत पर भारी पड़ी। सभी कार्यकर्ताओं को भरोसा था कि वह इस महामारी को भी मात दे देंगे, लेकिन 25 मई 2021 को अत्यंत दुखद और अप्रत्याशित खबर आई कि वे हमारे बीच नहीं रहे।

कुलभूषण का विवाह सन् 1969 में सुश्री उर्मिला से हुआ। वे राजकीय सेवा शिक्षक रहीं और सेवानिवृत्त हो चुकी हैं।अपने जीवन साथी की स्मृति को संजोए भिवानी में रहती हैं। उनकी पाँच सन्तान हैं – चार बेटियां और एक बेटा। सभी बच्चे सुशिक्षित हैं। बेटा विजयेन्द्र सिंह आर्मी में कर्नल है और चण्डीगढ़ में तैनात है। बड़ी बेटी विजय भिवानी में संस्कृत शिक्षक हैं; दूसरी सुमन प्राध्यापिका हैं; तीसरी सरिता भी शिक्षक रहीं, लेकिन अब घर संभाल रही हैं और चौथी, सविता भिवानी में ही एस.एस. मिस्ट्रेस हैं। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक : सत्यपाल सिवाच)

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