पत्रकारिता अपराध नहीं, बंद किया जाए पत्रकारों का दमन

 

पत्रकारिता अपराध नहीं, बंद किया जाए पत्रकारों का दमन

मुंबई। देश के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर 140 से ज़्यादा पत्रकारों और सिविल सोसाइटी सदस्यों ने हस्ताक्षरयुक्त बयान जारी कर जम्मू कश्मीर में पत्रकारों के दमन की निंदा की।

अभिव्यक्ति की आज़ादी के मुद्दे पर कार्य करने वाले संगठन फ्री स्पीच कलेक्टिव ने यह बयान तैयार किया जिस पर देश भर से पत्रकारों और सिविल सोसाइटी ने हस्ताक्षर कर अनुमोदन किया। “पत्रकारिता अपराध नहीं है: जम्मू कश्मीर में रिपोर्टिंग पर अंकुश लगाने का प्रतिरोध करें, चुप्पी तोड़ें, खुल कर बोलें!” शीर्षक से जारी बयान में जम्मू कश्मीर के पत्रकारों से एकजुटता जताते हुए मांग की गई है कि उन्हें अपना पत्रकारीय कार्य बिना किसी तरह की रुकावट या बाधा के करने दिया जाए।

 

पूरा बयान इस प्रकार है:

पत्रकारिता अपराध नहीं है : जम्मू कश्मीर में रिपोर्टिंग पर अंकुश लगाने का प्रतिरोध करें, चुप्पी तोड़ें, खुल कर बोलें!

हम, इस बयान के हस्ताक्षरकर्ता और सिविल सोसाइटी सदस्य कश्मीर में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को लगातार निशाने पर रखने और उन्हें धमकाने, पत्रकारिता को अपराध बनाने वाली जम्मू कश्मीर की पुलिस और अन्य सरकारी एजेंसियों की निंदा करते हैं। हम स्पष्ट तौर पर हाल में पत्रकारों से “शांति बनाए रखने के “वचन” वाले बॉन्ड पर हस्ताक्षर करवाने के दबावपूर्ण प्रयासों को खारिज करते हैं।

पिछले कई सालों से कश्मीर पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार, घाटी से हों या बाहर से, असाधारण दबाव में काम कर रहे हैं। कार्य स्थितियां शोचनीय हैं, पारिश्रमिक कम, ऑनलाइन और ऑफलाइन निगरानी कड़ी। वह लगातार अपराधिक मामले दर्ज होने, कारण बताओ नोटिस पाने, मनमाने तरीके से पुलिस थानों में बुलाए जाने, कड़े कानूनों के प्रावधानों के तहत हिरासत में लिए जाने और गिरफ्तारी के साए में काम कर रहे हैं।

पत्रकारों को विमानों से उतारा गया है, उनके पासपोर्ट निलंबित/रद्द किए गए हैं और उनके अकादमिक/पत्रकारीय उद्देश्यों से स्वतंत्र रूप से कहीं आने जाने पर बंदिशें लगाई गई हैं। इसके अलावा, कई पत्रकारों के परिवारों को धमकाया गया है और डर का माहौल बनाया गया है।

ताज़ा मामले में, राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में मुख्यालय वाले अख़बारों के कम से कम छह पत्रकारों को श्रीनगर साइबर पुलिस थाने में बुलाया गया। उन्होंने 13 जनवरी 2026 को मस्जिदों की प्रोफाइलिंग पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उनमें से कुछ को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा के 126 (जिसके अनुसार एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट किसी भी व्यक्ति “जो शांति भंग करने या कोई भी ऐसा कार्य कर सकता है जिससे शांति भंग होने की आशंका हो” को एक साल के लिए बांड भरवा सकने में सक्षम है कि वह शांति भंग नहीं करेगा) के तहत एक बांड पर हस्ताक्षर करने को कहा गया।

यह मीडिया को सेंसर करने का भयावह प्रयास है। वास्तव में, यह प्रावधान औपनिवेशिक काल में पुलिस के प्रतिबंधात्मक उपायों में से एक था जिसके तहत अच्छे व्यवहार के बांड लिए जाते थे। पत्रकार जनहित में कार्य करते हैं और इस आधार पर कि उनकी रिपोर्ट “सार्वजनिक शांति भंग कर सकती है”, उन्हें ख़ामोश करने के लिए धमकाने या स्व सेंसरशिप के ऐसे किसी भी प्रयास को मज़बूती से ख़ारिज करते हैं। पत्रकारों पर बांड पर हस्ताक्षर करने या कोई महत्वपूर्ण खबर रिपोर्ट न करने के लिए दबाव डालना असंवैधानिक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार पर सीधा हमला है।

 

कश्मीर में पत्रकारों को ख़ामोश करना

कश्मीर में, स्वतंत्र मीडिया का गला घोंटने के, ख़ासकर 2019 में भारतीय संविधान की धारा 370 हटाने के बाद, तमाम प्रयास किए गए हैं। सत्ता से सच बोलने या उसकी जवाबदेही याद कराने के पत्रकारों के सभी प्रयासों का सामना दमनकारी उपायों से हुआ है। इनमें खुली धमकियाँ, कानूनी एजेंसियों का इस्तेमाल और अपराधीकरण शामिल है। अपनी खबरों के लिए पत्रकारों को गैरकानूनी गतिविधि (रोक) अधिनियम, 1967 जैसे क़ानून व अन्य क़ानूनों के तहत कार्रवाई, हिरासत का सामना करना पड़ा है।

प्रशासन के पक्ष में नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए सरकारी विज्ञापनों के वितरण का नियमन करने वाली दमनकारी मीडिया पालिसी से प्रिंट मीडिया राजस्व पर नियंत्रण किया जा रहा है। इसके साथ कश्मीर टाइम्स जैसे स्वतंत्र मीडिया संस्थानों पर छापेमारी, कश्मीरवाला और वन्दे पत्रिका का बंद होना और उनके संपादकों और लेखकों की गिरफ्तारी (फहद शाह, नवंबर 2023 में जमानत पर रिहा हुए और इरफान महराज अब भी जेल में हैं) लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण अलग और आलोचनात्मक आवाज़ों को ख़ामोश करने का प्रयास है।

सत्ता से सच कहना और तथ्यपरकता व निष्पक्ष तरीके से खोज करना और रिपोर्ट करना पत्रकारों की ज़िम्मेवारी है। ख़ासकर एक, संकटग्रस्त क्षेत्र में, सामान्य लोगों की पीढ़ा को सामने लाना और शक्तिशाली लोगों से जवाबदेही की माँग करना उनका कार्य है। उनपर लगातार निगरानी, डराये-धमकाये जाने और अपराधीकरण के प्रयास उनके कार्य में बाधा डालेंगे और समाज को स्वतंत्र आवाज़ों से वंचित करेंगे।

हम जम्मू एवं कश्मीर में और जम्मू कश्मीर पर रिपोर्टिंग करने वाले अपने मीडिया साथियों के साथ एकजुट खड़े हैं। हम माँग करते हैं कि उन्हें अपना पत्रकारीय कार्य बिना किसी तरह की रुकावट या बाधा के करने दिया जाए।

 

नोट : यह बयान फ्री स्पीच कलेक्टिव ने कश्मीर में पत्रकारों के साथ एकजुटता दर्शाने के लिए तैयार किया है। कृपया अपना समर्थन देने के लिए इस पर हस्ताक्षर करें।

 

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