जितेन्द्र धीर की ग़ज़ल
दोस्त है दुश्मन भी मेरा हमसफ़र हमराज़ भी।
आप अपने पर फिदा मगरूर सा अंदाज़ भी।
ये अदब की सरजमीं है इसकी एक तहज़ीब है।
बेअदब लोगों को मिलता है कहां ऐजाज़ भी।
मीर-ओ-ग़ालिब से सुख़नवर शायरी इक़बाल की।
फ़िक्रो – फ़न की हैं मिसालें वाइसे एजाज़ भी।
बालो – पर काफी नहीं होते उड़ानों के लिए।
हौसला भी चाहिए औ कूवते परवाज़ भी।
वक्त की आहट समझ अब भी बदल अपना मिज़ाज।
ये बदलने की फिज़ा है, हो चुका आग़ाज़ भी।
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