लघुकथा
घर
जयपाल
उस दिन रेत के ढेर के पास बैठकर मैंने रेत का एक घर बनाया था। स्कूल के दिनों की बात है जब मैं प्राईमरी में पढ़ता था l मुझे पता है वह घर कितनी मुश्किल से पूरा हुआ था। कहीं से एक उद्दंड बच्चा आया और मेरा बना-बनाया घर गिरा कर भाग गया। पचास साल पहले की यह घटना जब भी मुझे याद आती है, मन उदास हो जाता है ।
कल जब अपने शहर की झोपड़ पट्टी पर बुलडोजर चलता देखा तो फिर अपना बचपन याद आ गया।
आज फिर वही उदासी !!
