चलते-चलते चार लघु कविताएं
जयपाल
1
उसका नाम
स्कूल के दिनों की बात है
हड्डियां चमकती थी उसकी
कपड़े फटे-पुराने,रंग-बिरंगे
क्लास के बच्चे उसे ‘काला-कच्छा’
कहते थे
असल नाम तो याद नहीं
हां, जाति याद है
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2
पृथ्वी और स्त्री
पृथ्वी
जब तक स्त्री के हाथों में रहेगी
सुरक्षित रहेगी
पुरुष तो वैसे ही रखेगा
जैसे स्त्री को रखता है
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3
पृथ्वी
यह पृथ्वी
किसी शेषनाग के सिर पर नहीं
नंदी बैल के सींगों पर भी नहीं
स्त्री के हाथों पर टिकी हुई है
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4
बाल-दिवस
छुटकी गोबर पाथ रही थी
छुटका ईंट
आँख ही नहीं उठाई दोनों ने
इस क़दर व्यस्त थे वे अपने काम में
पास से गुजर गया ‘बाल-दिवस’
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