इब्बार रब्बी:अपनी तरह के अनोखे कवि 

इब्बार रब्बी के जन्म दिन पर विशेष

इब्बार रब्बी:अपनी तरह के अनोखे कवि

विष्णु नागर

आज 2 मार्च को मेरे वरिष्ठ, मुझसे करीब दस साल बड़े इब्बार रब्बी का छयासीइवां जन्मदिन है।बहुत- बहुत दिली मुबारक हमारे इस कवि और इस इनसान को!

रब्बी जी को मैं रब्बी कहने का अधिकार तो नहीं रखता मगर मुझे और शायद उन्हें भी मुझे अपना मित्र मानने में ऐतराज़ न होगा।है नहीं,यह मैं जानता हूँ। रब्बी जी के पास अनुभवों का बहुत बड़ा खजाना है,जो कभी खत्म नहीं होता! हमेशा उनसे नई बातें सुनने जानने को मिलती हैं। उन्हें बात करने में बहुत आनंद आता है।वह बहुत अलबेले-अनोखे आदमी और कवि हैं।साहस बल्कि दुस्साहस की हद तक जानेवाले वह इंसान हैं। नवभारत टाइम्स में काम करते हुए उनका साहस और दुस्साहस दोनों मैंने देखे हैं।वह दौर भी ऐसा था कि प्रबंधन किसी कर्मचारी का बाल बाँका नहीं कर सकता था। वह मजदूर यूनियन के साथ मजबूती से खड़े रहे।हर लड़ाई में उसका साथ दिया तो यूनियन ने भी उनका साथ दिया।(उन दिनों प्रमोद कुमार हमारे नेता हुआ करते थे-साहसी और कुशल।)।

रब्बी जी अपनी तरह के अनोखे कवि हैं। उन जैसा दूसरा कवि मुझे दूसरा नहीं दिखता। मुझे भी दिल्ली में रहते अब करीब पचपन साल हो गए। दिल्ली की बसों में मैंने भी खूब सफर किया है।अभी भी कभी- कभी बस से सफर कर लिया करता हूँ मगर मेरे पास ही क्या, हिंदी के किसी भी कवि के पास ‘सड़क पार करनेवालों का गीत ‘ और ‘ इच्छा ‘ जैसी कविताएँ नहीं हैं।यही नहीं ‘अरहर की दाल’,’ भागो’, ‘ पड़ताल ‘, ‘.दराज, ‘ ‘उस औरत की गोद में ‘ ,’.मेरी बेटी’ जैसी कविताएँ भी नहीं हैं मगर जो भी हो, उनकी उपेक्षा बहुत हुई है। जिन्हें लगता है कि मैं अपने इस वरिष्ठ और मित्र की आज बढ़चढ़कर तारीफ़ कर रहा हूँ, वह ज्यादा दूर नहीं,’ कविता कोश ‘ तक ही जाएँ, खुले मन से और आत्मावलोकन करें कि हम कितने बड़े गुनाह के भागीदार हैं!

बहरहाल रब्बी जी को ये कविताएँ सड़क पर पड़ी नहीं मिलीं। उन्होंने एक -एक अनुभव को कमाया है और तब तक उसके कविता में उतरने का इंतज़ार किया है,जब तक कि वह पूरी तरह पक नहीं गया। उनकी कविता में किसी तरह की हड़बड़ी नहीं दीखती ।रब्बी जी बहुत भटके हैं।कभी पुरातात्विक इमारतों को देखने-समझने, कभी आदिवासियों के जीवन को निकट से देखने, कभी बंधुआ मजदूरों के बीच तथा कहीं और ।एक अर्थ में उन जैसा आवारागर्द भी हमसे पहले और हमारी पीढ़ी में कोई नहीं रहा।उन जैसे पढ़ाकू होंगे मगर कम।बस उनकी कमी यह है कि किसी महान रचना की बात निकल जाए तो उसका सार मुग्धभाव से पूरा सुना देंगे।विश्लेषण में उनका अधिक विश्वास नहीं।

वह वक्ता भी बहुत दिलचस्प हैं।बड़े खिलंदड़ भाव से रस लेकर सुनाते चले जाएँगे।अपने अनोखे अंदाज से सबको मुग्ध करेंगे पर फिर अतिउत्साह में बोलते ही चले जाएँगे।भटकते ही चले जाएँगे।ऐसे किसी आयोजन में अगर मैं भी उपस्थित होता हूँ तो उन्हें सावधान करता हूँ कि रब्बी जी थोड़ा संयम रखना।रखा भी है उन्होंने।एक बार अफसोस के साथ कहा भी कि मुझसे कम बोलने को कहा गया है।

नवभारत टाइम्स में उन्होंने नौकरी शान से की।किसी से दबे नहीं, झुके नहीं।पदोन्नति का कभी कोई प्रयास नहीं किया, उसकी उपेक्षा ही की।उनसे कनिष्ठ हम जैसे कई आगे बढ़ते गए।एक लेखकनुमा व्यक्ति ऐसी ही वरिष्ठता के जोम में आ गए थे और उनसे बदतमीजी तक की।रब्बी जी में वह साहस था कि उनकी वहीं बारह बजा देते, इज्ज़त उतार देते मगर पता नहीं कैसे और क्यों वह सह गए!खैर संयोग से उस व्यक्ति को उन पर शासन करने का एक ही दिन मौका मिला।

हम सबने -जिसमें मंगलेश डबराल आदि भी शामिल हैं- खूब गप्पें ठोंकी हैं।खूब उनके जीवन और साहित्य के अनुभवों का लाभ उठाया है।

इब्बार रब्बी के इब्बार रब्बी होने की भी एक दिलचस्प कहानी है।रब्बी जी का मूल नाम रवीन्द्र सक्सेना है।घर में उन्हें रब्बी कहा जाता था।rabbi की स्पेलिंग उल्टें तो वह ibbar होगा।यूँ वह इब्बार रब्बी हो गए।रब्बी जी की शैतानियों की भी अनेक कहानियाँ हें।चालीस साल या उससे भी अधिक एक पुरानी कहानी है।तब वह गाजियाबाद में रहते थे।एक दिन उन्होंने खत लिख मारा कि रब्बी नहीं रहे।बहुत से लोग चिंतित हुए।एक जमाने के फायरब्रांड कवि समझे जानेवाले रमेश गौड़ मगर निश्चिंत थे।उनका कुछ इस तरह का कहना था कि रब्बी की नस्ल का आदमी मर ही नहीं सकता।वह जिंदा है और दो -तीन बाद वह प्रकट भए।

नवभारत टाइम्स में इनके एक हमउम्र सज्जन रात की ड्यूटी में नवभारत टाइम्स के विभिन्न संस्करणों तथा और दूसरे अखबारों की रद्दी समेटकर घर ले जाते।रद्दी बेचकर कुछ अतिरिक्त खर्च निकाल लेते।रब्बी जी को एक दिन शैतानी सूझी।उन्होंने अपने उस साथी द्वारा जमा की गई सारी रद्दी संपादक के कक्ष में घुसा दी।अब वे सज्जन रद्दी ढूँढें और रद्दी मिले नहीं।उस दिन बेचारे खाली हाथ घर गए।वैसे वह भी जानते थे कि यह चमत्कार रब्बी जी के अलावा कोई और कर नहीं सकता।

एक बार किसी संयोग से हम पीने- पिलाने के सिलसिले में साथ थे।वह रात को हमारे यहाँ रुक गए। उस दिन उनके विवाह की वर्षगांठ थी और श्रीमती रब्बी ने अपने रिश्तेदारों को रात के भोजन पर आमंत्रित कर रखा था।खैर अगले दिन तो उन्हें घर जाना ही था मगर अकेले जाते तो श्रीमती जी के क्रोध्र से उनका सामना होता, इसलिए वे जिद करके हम पति- पत्नी को साथ लेते गए।हम गए और पिछली रात का बचा स्वादिष्ट भोजन किया।हमारे जाने के बाद उनका जो भी हुआ हो, वह जानें। ऐसे कई किस्से हैं।कोई सुने तो आनंद लेते हुए आज भी वह सुना सकते हैं।

पहली बार मैं उनके पास एक फ्रीलांसर की तरह गया था।कोई मुझे उन तक ले गया था।उन दिनों जो संपादक होते थे, वह अक्षम भी थे और कायर भी।वहाँ रामराज्य जैसी स्थिति थी।वह इतने अक्षम थे कि संपादकीय लिखने का भार लेकर स्वयं किसी मंत्री या प्रधानमंत्री से अप्वाइंटमेंट का बहाना बनाकर भाग लेते थे और उनका क्लर्क रहा-सहा संपादकीय लिखता और वह संपादकीय कैसा होता होगा, आप समझ सकते हैं! जनता पार्टी की सरकार आने पर उन्होंने जयप्रकाश नारायण पर रब्बी जी से पुस्तक लिखवा ली। नाम उन संपादक का गया। वैसे रब्बी जी से लिखवा लेना-वह भी पूरी किताब- यह पौरुष डिमांड करता है। रब्बी जी को उस समय पैसों की सख्त जरूरत थी।उनके भाई को कैंसर था।उन्होंने संपादक से भी एडवांस में चेक लिया,तब किताब लिखी और उसे बहुत हैरान+ परेशान करके!उन संपादक के ऐसे और भी किस्से हैं।

संपादक की अक्षमता के कारण हर तरह के राजनीतिक उग्रवाद से लेकर सब प्रकार के व्यक्तिगत लाभ उठाने की सभी को छूट थी।शायद इस कारण भी उस अत्यंत बोदे अखबार का – जिसमें अनपढ़ों का साम्राज्य था – प्रसार भी उस समय के हिसाब से खूब था।ऐसे वातावरण में एक बार मैं उनके पास गया -शायद 1971 में।नया- नया था। रब्बी जी ने अपने अंदाज़ में कहा, कुछ भी लिखकर ला दो, छप जाएगा।8 दिसंबर बहुत नजदीक था- बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की जन्मतिथि थी।मैंने कहा, उन पर लिखूँ? उन्होंने कहा, लिखो।साहित्य अकादमी गया।उनकी कविताओं के उद्धरर्णों से भरपूर एक लेख थमा दिया।उन्होंने छाप दिया मगर बाद में कहा कि इतनी अगंभीरता भी ठीक नहीं।

खैर बहुत कुछ लिखा जा सकता है मगर यहीं इति करता हूँ।उनका होना मेरे लिए एक बड़ी आश्वस्ति है।वह कैंसर से जूझे हैं।अब काफी राहत है।हर महीने एक महंगा टीका लगता है।अभाव से जूझे हैं मगर उनके जैसी जिंदादिली अद्भुत है।वही उनके जीवन का सार है।उसीने उन्हें टूटने नहीं दिया है।ऐसे रब्बी जी शतजीवी हों।

विष्णु नागर के फेसबुक वॉल से साभार

 

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