जहर जो हमने पीया पुस्तक पर संगोष्ठी
हर बार मेरी जाति, मेरी ग़रीबी, मेरा स्त्री होना आड़े आ जाता है
रोहतक। स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘सप्तरंग’ द्वारा पुस्तक पर चर्चा कार्यक्रम के अन्तर्गत महिला सफ़ाईकर्मियों की आप बीती पर आधारित पुस्तक ‘ज़हर जो हम ने पीया’ पर गोष्ठी का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी में पहुंचे श्रोता।
स्थानीय स्वामी नितानंद स्कूल में आयोजित इस गोष्ठी में पुस्तक के संपादक एवं रिटायर्ड आईएएस अधिकारी अशोक गर्ग, प्रिंसिपल मनोज छाबड़ा, अध्यापक राजकुमार जांगड़ा तथा लेखिका अनीता, सेवा, बिमला और वैष्णवी ने हिस्सा लिया। मंच पर उपस्थित सम्पादक-मण्डल और इन महिला लेखिकाओं के साथ संस्कृतिकर्मी अविनाश सैनी ने बातचीत की जिस के बाद सवाल-जवाब का खुला सत्र चला।
चर्चा के दौरान सफाईकर्मी लेखिकाओं ने अपने जीवन के संघर्ष सांझा किए। उन्होंने बताया कि जातीय भेदभाव का शिकार होते हुए गरमी-सर्दी-बरसात, हर मौसम में उन्हें बिना कोई सुविधा मिले कार्य करना पड़ता है और तरह-तरह के ताने सहने पड़ते हैं, इसके बावजूद वे अपना काम पूरी मेहनत से करती हैं। उन्होंने बताया कि लेखन का काम करने के बाद उनके जीवन में बड़े बदलाव आए हैं और लोगों से भी बहुत सम्मान मिला है।
हिसार मण्डल के पूर्व आयुक्त अशोक गर्ग, मनोज छाबड़ा और राजकुमार जांगड़ा ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया से जुड़ी बातें बताईं। मुखर तौर पर निकल कर आया कि ग़रीबी, जाति के दंश और लैंगिक भेदभाव के बीच रहते हुए महिला सफ़ाईकर्मियों का जीवन-संघर्ष कितना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
नगर निगम आयुक्त के तौर पर काम करते हुए अशोक गर्ग ने महिला सफ़ाइकर्मियों की व्यथा और उन के जीवन की परेशानियों को देखा-जाना-समझा। उन की संवेदनाओं को केंद्र में रखते हुए उन्हें अभिव्यक्ति के मौक़े दिए। महिला दिवस और स्वतन्त्रता दिवस के अवसरों पर इन सफ़ाईकर्मियों को जब मंच पर आने का अवसर मिला तो उन्हें महसूस हुआ कि उन का भी महत्व है। उन्हें अपने जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि उन्हें भी समझने वाला कोई है वरना तो जैसा वैष्णवी ने कहा, जीवन में “कोई इन्सान ऐसा नहीं मिला था जो हमें समझ पाए।”
मनोज छाबड़ा और राजकुमार जांगड़ा के सक्रिय योगदान और सहयोग से इन महिला सफ़ाइकर्मियों की आपबीती पुस्तक के रूप में आई। करीब 4 महीने की मेहनत के दौरान 41 सफ़ाईकर्मियों ने ओम प्रकाश वाल्मीकि की पुस्तक ‘जूठन’ तथा मनुष्यता की कहानियों को पढ़ा। इस से उन में आपसी विश्वास पनपा और वे लेखक के रूप में तैयार हुईं।
इन में से अधिकतर ने स्वयं अपने जीवन-वृत्तांत सुनाए और फिर खुद से लिखे। कुछ ने अपने बच्चों से लिखवाया और कुछेक ने अपनी जीवनगाथा सुनाई जिन्हें लगभग ज्यों का त्यों लिख दिया गया। कोशिश की गई कि उन का स्वयं का स्वर पुस्तक में झलके और सम्पादन केवल इस हद तक किया गया कि कोई भाषिक त्रुटियाँ न रहें। 2020-21 में शुरू हुई इस प्रक्रिया ने 2026 में आ कर पुस्तक का रूप लिया।
सवाल-जवाब के सत्र में यह बात उभर कर आई कि सफ़ाइकर्मियों का काम बेहद महत्वपूर्ण है – जिस शहर-गाँव में सफ़ाई नहीं होगी, वह गन्दगी और बीमारियों का घर हो रहेगा। इन का काम ठेका प्रथा के अंतर्गत होने की बजाए पक्की नौकरी के तौर पर हो। यह बात भी निकल कर आई कि आधुनिक टेक्नॉलजी के युग में सफ़ाईकर्मियों को सीवर की सफ़ाई के लिए मल्ल और गंदगी भरे सीवरों में क्यों उतरना पड़ता है?
पुस्तक पढ़ने के बाद यह एहसास होता है कि आधुनिक ‘विकास’ की अन्धाधुंध दौड़ के बीच हमारे समाज का एक बहुत बड़ा तबक़ा ग़रीबी के कारण शिक्षा से वंचित रहते हुए, विकट परिस्थितियों में जीवनयापन करने पर मजबूर हैं और हमारी संवेदनशीलता का हक़दार है।
प्रतिभागियों द्वारा आशा व्यक्त की गई कि पुस्तक को पढ़ कर समाज में महिला सफ़ाइकर्मियों के प्रति व्यवहार में बदलाव आएगा। कार्यक्रम में 60 के लगभग लोगों ने शिरकत की जिन में शहर के गणमान्य व्यक्ति तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल रहे।
