क्या बाहरी बम लोकतंत्र पैदा करते हैं?
धर्मेन्द्र आज़ाद
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनके कई सहयोगियों की हत्या से हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी तो ख़ुश हो ही रहे हैं, आख़िर एक मुस्लिम बहुल देश पर हमला जो हुआ है। लेकिन कुछ लिबरल-मध्यमार्गी लोग भी मान रहे हैं कि ईरान में अली ख़ामनेई का मारा जाना तानाशाही का अंत है और यह एक उचित क़दम है।
निश्चित ही अली ख़ामनेई का शासन दमनकारी रहा है। ईरान में महिलाओं के पहनावे पर कठोर नियम, कथित नैतिक पुलिस की दमनकारी भूमिका, छात्र आंदोलनों पर कार्रवाई, विरोध प्रदर्शनों का दमन — ये सब गंभीर आलोचना के विषय हैं। विशेषकर महसा अमीनी की मृत्यु के बाद जिस प्रकार देशभर में आंदोलन हुए, उसने यह दिखाया कि ईरान के भीतर असंतोष वास्तविक है।
लेकिन यह ईरान की जनता का आंतरिक मामला है।
मूल सवाल यह है —
यदि किसी देश का शासक निरंकुश है, तानाशाह है, तो क्या बाहरी ताकत को उसे मारने या उस देश पर हमला करने का अधिकार मिल जाता है?
यदि यही सिद्धांत मान लिया जाए, तो दुनिया की अधिकतर सरकारों पर हमलों को भी “नैतिक” ठहराया जा सकता है, क्योंकि अपने-अपने देशों में आज के ज्यादातर शासक दमनकारी ही हैं।
भारत का उदाहरण लें। यहाँ लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता लगभग समाप्त की जा चुकी है और देश फासीवाद की जकड़ में फँसता जा रहा है। विपक्षी नेताओं पर जाँच एजेंसियों की भेदभावपूर्ण कार्रवाई, आंदोलनों और असहमति की आवाज़ों को दबाना, अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यापक हिंसा की घटनाएँ, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी, और फ़र्जी मुठभेड़ों में मार गिराने के आरोप — इन सबके आधार पर निश्चित नरेंद्र मोदी, अमित शाह एंड गैंग की सरकार दमनकारी है, तानाशाही चरम पर है।
लेकिन यदि कोई बाहरी शक्ति भारत पर हमला करे या प्रधानमंत्री कार्यालय पर बम बरसाए, तो क्या हम उसे स्वीकार करेंगे?
कभी नहीं।
क्योंकि वह किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता पर हमला होगा।
इसी प्रकार ईरान पर हमला भी उसकी संप्रभुता पर हमला है।
अब ज़रा इतिहास देखें।
इराक में “तानाशाह हटाने” के नाम पर 2003 में अमेरिका ने युद्ध किया। इराक़ी जनता को क्या मिला? अराजकता, सांप्रदायिक हिंसा, लाखों मौतें और आज तक अस्थिरता।
लीबिया में 2011 में हस्तक्षेप हुआ। नतीजा ——।
तो क्या बाहरी बम लोकतंत्र पैदा करते हैं? इतिहास कहता है — नहीं।
अब नैतिकता की बात। क्या अमेरिका और इज़राइल स्वयं मानवाधिकारों के सेंटा क्लॉज हैं?
डोनाल्ड ट्रम्प अपने ही देश में चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करने, संस्थाओं पर दबाव बनाने, जनता की आवाज़ को दमनकारी तरीकों से दबाने और न्यायिक फैसलों का विरोध करने के लिए कुख्यात रहे हैं।
बेंजामिन नेतन्याहू पर न्यायपालिका को कमजोर करने और भ्रष्टाचार के मामलों से घिरे रहे हैं। गाज़ा में हालिया युद्ध के दौरान हजारों नागरिक, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे शामिल थे, नेतन्याहू के नेतृत्व में हुई सैन्य कार्रवाई में मारे गए।
ईरान पर हो रहे हमलों में भी महिला हॉस्टल पर बम गिराए जाने की खबर है, जिसमें सौ से अधिक स्कूली बच्चियों के मारे जानकी सूचना है। यदि कोई शक्ति वास्तव में “महिलाओं की आज़ादी” और मानवाधिकारों के लिए प्रतिबद्ध होती, तो वह स्कूलों, अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों पर बमबारी से बचती। महिलाओं की स्वतंत्रता का दावा और बच्चियों की मौत — दोनों साथ नहीं चल सकते।
सच्चाई यह है कि वैश्विक राजनीति में “मानवाधिकार” और “लोकतंत्र” जैसे नारे अक्सर रणनीतिक और आर्थिक हितों को छुपाने का आवरण बन जाते हैं। पश्चिम एशिया तेल, व्यापार मार्गों और सामरिक प्रभुत्व की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहाँ मूल रूप से तेल के भण्डारों पर क़ब्ज़े का लालच, इसराइल को उस क्षेत्र में दमन करने की बेरोकटोक छूट और साम्राज्यवादी भू-राजनीति काम कर रही है। यही मूल वजह है अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमले की।
इसलिए खामनेई की दमनकारी नीतियों की आलोचना करना एक बात है — और वह होनी भी चाहिए। लेकिन अमेरिका और इज़राइल के सैन्य हमलों को “महिलाओं की मुक्ति” या “लोकतंत्र की बहाली” के नाम पर उचित ठहराना बिल्कुल बचकाना सोच है।
प्रभावकारी सत्ता परिवर्तन जनता के आंतरिक संघर्ष से होता है, मिसाइलों और ड्रोन से नहीं।
तानाशाही का विरोध ज़रूरी है — लेकिन साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का समर्थन समाधान नहीं है; बल्कि यह लोकतंत्र, मानवाधिकारों के साथ-साथ देश की संप्रभुता और आर्थिक हितों पर भी हमला है।
किसी भी स्वतंत्र देश की संप्रभुता पर हमला — चाहे वह ईरान हो, भारत हो या कोई और राष्ट्र — सिद्धांततः निंदनीय होना चाहिए।
लोकतंत्र बाहर से आयात नहीं होता।
वह भीतर से अर्जित किया जाता है।

लेखक- धर्मेन्द्र आज़ाद
