बदहाल राजघाट, उपेक्षित शांतिवन

बदहाल राजघाट, उपेक्षित शांतिवन

संजय श्रीवास्तव

राजघाट में गांधीजी के संदेश वाली दीवार पर पत्थर की पट्टिकाओं की हालत खराब है. वो टूट रही हैं, काली स्याही लगे शब्द मिट रहे हैं. कहीं कहीं हल्के पड़ गए हैं. दीवारें कुछ धूसर. रखरखाव कमतर. राजघाट इस बार जाने पर निराशा हुई. सामने गांधी दर्शन पुस्तक केंद्र तो कई साल पहले ही बंद हो चुका है. कैंटीन भी पिछले एक हफ्ते से बंद है. पता चला कि जब उसका नया ठेका छूटेगा तो खुलेगी.

अब राजघाट आने वाले लोगों की संख्या कुछ साल पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी है. स्टाफ घटाया जा चुका है. मेंटीनेस प्राइवेट पार्टियों को सौंपी जा चुकी है. अंदर पब्लिक टायलेट के नल की टोटियां टूटी पड़ी हैं. सफाई माशाअल्लाह. बाहर संकेत बोर्ड कह रहा है यहां ड्रिकिंग वाटर भी मिलता है, जो वहां है नहीं.

राजघाट कैंपस में ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और नेहरू के स्मारक हैं. साथ में चौधरी चरण सिंह और चौधरी देवीलाल के भी. हालांकि अभी गरमी शुरू तो नहीं हुई लेकिन इदिरा गांधी के शक्ति स्थल और राजीव गांधी के वीर भूमि के आसपास की हरियाली भूरी पड़ने लगी है. सफाई भी कमतर. सबसे बेहाल है पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू जी का शांतिवन. जिसके रास्ते में पड़ने वाली नाम पट्टिकाओं से शब्द उखड़कर ना जाने कब गायब हो चुके हैं, दोबारा फिर कभी लगे ही नहीं. तस्वीर देखकर अंदाज हो जाएगा.

पहले जब गया था तब नेहरू स्मारक के ऊपर गोलाई लिए भूमि पर लकदक हरी घास थी. अब वो भूरी ज्यादा. कम भी. इस हिस्से में घास की कटाई, छंटाई और मेंटीनेस के लिए 25 लोगों की टीम है. एक प्राइवेट वेंडर इसे देखता है. स्टाफ डेलीवेज. स्मारक के पास तीन लोहे की बेंचें पड़ी हैं. तीनों की हालत खस्ता. दो पर स्टाफ लंबलेट था. तीसरी बेंच खाली तो थी लेकिन तीन टांग की और जगह – जगह से जंग खाई जर्जर और टूटी-फूटी. आसपास बढ़ी घास. बेतरतीब बढ़ चुकीं झाड़ियां. सामने नेहरू के प्रिय गुलाब की क्यारी उजड़ी और बेतरतीब .

शायद राष्ट्रीय गरिमा वाली ये जगह प्राथमिकता नहीं रह गई. पिछले कुछ सालों में यहां का फंड बढ़ा जरूर है लेकिन मामूली. शांतिवन के करीब की झील बदहाल. आधिकारिक दस्तावेज़ों में यह पूरा परिसर “राष्ट्र‑स्मारक” की श्रेणी में आता है. देख‑रेख का जिम्मा राजघाट समाधि समिति के पास है, जो राजघाट समाधि अधिनियम, 1951 के तहत केंद्र सरकार द्वारा गठित एक वैधानिक निकाय है. ये समिति केंद्र सरकार के नगरीय विकास विभाग यानि शहरी विकास मंत्रालय के अधीन है, उससे वार्षिक ग्रांट लेती है.

यहां रोजमर्रा रख‑रखाव का जिम्मा CPWD का है यानि लॉन, फर्नीचर, बिजली, अग्निशमन, सुरक्षा, विशेष अनुष्ठानों के लिए तैयारी आदि. इन खर्चों को समिति की ग्रांट से री‑इम्बर्स किया जाता है.

ये भी देख लीजिए कि इसे पिछले कुछ सालों में कितनी ग्रांट मिली है

2014–15 में लगभग 4.7 करोड़ रुपये,
2015–16 में लगभग 5.5 करोड़ रुपये,
2021–22 में लगभग 6.6 करोड़ रुपये के आसपास रही है।

कई सालों से राजघाट को लेकर आ रही रिपोर्ट बताती हैं कि फंड अक्सर बड़े‑निर्माण या ड्रेनेज जैसे प्रोजेक्ट पर केंद्रित होता है, छोटे छोटे काम उपेक्षित. ना पत्थर पट्टिकाओं के रंग का नवीनीकरण. ना बेंचों और लोहे के सिटिंग‑स्टैंडों की हालत अच्छी. पट्टिकाएं धुंधली, उखड़ती हुई. ये वो जगह है जहां भारत आने वाले हर विदेशी राष्ट्रप्रमुख को लाया जाता है. दुख यही है कि ये जगह राष्ट्रीय गरिमा की है. धीरे धीरे बदरंग स्थिति में जा रही है.

राजघाट से लौटकर संजय श्रीवास्तव की रिपोर्ट।
संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से कंटेंट और फोटो साभार

लेखक- संजय श्रीवास्तव

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