धर्मपाल चहल -निडर, साहसी, अनुशासित, कुशल योजनाकार और दूरदर्शी कार्यकर्ता

हरियाणा : जूझते जुझारू लोग-80

धर्मपाल चहल -निडर, साहसी, अनुशासित, कुशल योजनाकार और दूरदर्शी कार्यकर्ता

सत्यपाल सिवाच

 

जीन्द जिले के बड़ौदा गांव निवासी धर्मपाल चहल का जन्म 6 दिसम्बर 1956 को एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता लालसिंह जी स्वतंत्रता सेनानी रहे थे। उनकी माँ भरपाई के सरल और मिलनसार स्वभाव का भी उनके व्यक्तित्व पर खास प्रभाव पड़ा। वे चार बहनें और दो भाई हैं। 17 जुलाई 2006 में एक सड़क दुर्घटना में उनका असमय निधन हो गया।

उन्होंने राजकीय उच्च विद्यालय खटकड़ से दसवीं परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद राजकीय महाविद्यालय जीन्द से बी.ए. करके सी.आर. कॉलेज ऑफ एजूकेशन हिसार से बी.एड. की।
वे 2 अगस्त 1979 को छह माह के आधार पर गणित अध्यापक पद पर सरकारी सेवा में आए थे। बाद में उन्होंने राजनीति शास्त्र में एमए की। सन् 1983 में सीधी भर्ती में  नियमित रूप में उनका चयन हो गया। सन् 1993 में राजनीति शास्त्र विषय में प्राध्यापक पदोन्नत हो गए।

एक अध्यापक के रूप में उनकी अलग ही पहचान थी। ये अपने विषय में तो निष्णात थे ही साथ ही अथक परिश्रमी भी थे। स्वभाव से मृदुभाषी होने के अतिरिक्त छात्रों को शैक्षिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं से उनकी जगह से समझने का प्रयास किया करते थे। इसलिए छात्रों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहते। विलय के मुखिया और स्टाफ के समक्ष उनकी विशेष जगह बनी रही। हर समय किसी न किसी रचनात्मक कार्य में लगे रहने के कारण प्राचार्य एवं अध्यापक उनकी बहुत तारीफ करते।

व्यक्तिगत संबंधों में ये दूसरों की भावनाओं का बहुत ध्यान रखते थे। अभिभावकों में भी उनकी खूब लोकप्रियता रही। व्यक्ति एवं सामुदायिक प्रत्यनों व अंशदान के जरिए वे विद्यालय के भवन व संपति को बढ़ाने में विशेष रुचि लेते थे। वे छातर, सच्चाखेड़ा, कालवन, खटकड़, नंदगढ़, करसिंधु व धमतान साहब के स्कूलों में रहे और वर्तमान में सर्व शिक्षा अभियान में ए.बी.आर.सी. के रूप में कार्यरत थे। सभी जगह उन्होंने समय के पाबंद, अच्छे परिणाम देने अनुशासित, समर्पित और अच्छे वाले अध्यापक की छाप छोड़ी।

धर्मपाल चहल सेवा में आते ही अस्थायी और बेरोजगार अध्यापक संघ से जुड़ गए थे। वे 1985 में अध्यापक संघ में विभाजन के समय से ही खण्ड स्तर पर सक्रिय हो गए थे। सन् 1986-87 में सर्वकर्मचारी संघ के गठन से ही फूलसिंह श्योकन्द के संपर्क में आ गए थे। उसके चलते न केवल आन्दोलन में सक्रिय हुए, बल्कि वामपंथी और प्रगतिशील आन्दोलन के साथ भी जुड़ गए।

वे सन् 1988 से 1992 तक सर्वकर्मचारी संघ के जिला सचिव रहे। कर्मचारियों एवं अध्यापकों के आंदोलन में उनकी विशेष भागीदारी रही। हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के मंच के माध्यम से वह 1986 में सर्वकर्मचारी संघ से जुड़े। आंदोलन में अस्थाई एवं बेरोजगार अध्यापक संघ के संस्थापकों में वे एक निडर, साहसी, कुशल योजनाकार, अनुशासित एवं दूरदर्शी कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते थे। वे सन् 1991 और 1993 में आंदोलनों के दौरान जेल में भी रहे।

उनकी जीवन साथी सरोज बताती हैं कि वे 1993 में सिरसा में एम.पी.एच.डब्ल्यू. ट्रेनिंग में थीं। प्रिंसिपल सभी लड़कियों के पत्र पढ़कर ही देती थीं। धर्मपाल जी आन्दोलन में जेल में थे। उन्होंने जेल से सरोज को पत्र लिखा, जिसे प्रिंसिपल ने पढ़ा। उन्हें पता चला कि सरोज के पति कर्मचारी आन्दोलन में जेल में हैं तो उनका रवैया बदल गया। सरोज का बहुत सम्मान करने लगीं और उनके पत्र पढ़ना बंद कर दिया।

बहुत पहले ही उन्हें सांगठनिक नेतृत्व के रूप में पहचान लिया गया था। वे सन् 1988 से 1992 तक सर्वकर्मचारी संघ जिला जींद के सचिव रहे और पांच बार हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के जिला सचिव भी चुने गए। बहुत पुराने नेता होने के बावजूद अभिमान उन्हें छू तक नहीं गया था। उनके प्रभाव से नए-नए कार्यकर्ता यूनियन से जुड़ते गए। तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी धैर्य एवं सहज ढंग से तत्काल निर्णय लेने की उनमें अद्भुत क्षमता थी।

साथी धर्मपाल में जीवन एवं समाज के प्रति स्पष्ट दृष्टि थी। सामंती मूल्यों और उपभोक्तावाद के स्थान पर वे सकारात्मक प्रगतिशील विचारों को बहुत महत्व देते थे। जाति-पांति, ऊंच-नीच के संस्कारों से वे कोसों दूर थे। वे पक्षधरता से वंचित तबकों की लड़ाइयों में शामिल रहते थे। व्यक्तिगत जीवन में जिंदादिली उनकी विशिष्ट पहचान थी। अच्छा खाना-पीना, मनोरंजन, हंसी-मजाक उनके स्वभाव की खूबी थी।

त्योहार आदि अवसरों पर खुशियों से झूम उठते। बच्चों से दोस्ती बना लेना उनके लिए सहज था। वे कभी-कभी गुस्सा भी करते थे, स्वाभिमान के खिलाफ कोई टिप्पणी करने पर अथवा विशेषकर किसी साथी के अनुशासन भंग करने पर। मेहमानबाजी में उनका कोई सानी नहीं था।

परिजनों और रिश्तेदारों के बीच धुरी की तरह कार्य करते थे। सरोज के लिए वे सच्चे जीवन साथी ही नहीं, परममित्र भी थे। उनके जीवन का हर पन्ना खुला था। बेटा जसवीर सिंह पंजाब ए.जी.ऑफिस में एस.ओ. है। और बेटी पारुल बी.टेक. हैं। दोनों बच्चे विवाहित हैं। फिलहाल परिवार जीन्द छोड़कर पंचकुला में रहता है। धर्मपाल जी माता-पिता पहले ही स्वर्ग सिधार चुके हैं। सौजन्य -ओमसिंह अशफ़ाक

लेखक – सत्यपाल सिवाच