आलोक धन्वा के कविता संग्रह का आलोचनात्मक विश्लेषण

95 वर्षीय विमल वर्मा हिन्दी आलोचना के एक सशक्त हस्ताक्षर थे। अभी हाल ही में(18 जून, 2025 )  उनका निधन हो गया। प्रतिबिंब मीडिया के गंभीर-साहित्यिक पाठकों के लिये आज हम  विख्यात कवि आलोक धन्वा की कविताओं पर उनका एक चर्चित आलोचनात्मक गंभीर लेख दे रहे हैं।

आलोक धन्वा के कविता संग्रह का आलोचनात्मक विश्लेषण

विमल वर्मा

 

आलोक धन्वा के काव्य संकलन ‘दुनिया रोज बनती है’ में अपनी बात नामक कविता में-

“कितने दिनों से रात आ रही है

जा रही है पृथ्वी पर

फिर भी इसे देखना

इसमें होना एक अनोखा काम लगता है

अपनी बात कर रहा हूं।”

यहां कविता में विमर्श को नाटकीय संवेदन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।  रचनाकार का प्रस्तुत अनुभूति जगत हमारी पाठीय मनोरचना को निर्मित करते हुए संकेतित करता है कि यहां बात का संदर्भ ‘वाक्’ से है। साथ ही साथ पाठक के आत्म को वृहदारण्यक उपनिषद की इस उक्ति को स्मरण करा देता है – जहां कहा गया है- ‘यहां जो कुछ भी जाना जाता है सब वाक् रूप में है और वाक् ही जानने वाला है।’ आधुनिक अवधारणा में इसे विमर्श कह सकते हैं। ‘वहां सब कुछ पाठ है।’ ‘अपनी बात’ कविता की विशेषता यह है कि हम दैनन्दिन जिन चीजों को देखने के अभ्यस्त हो जाते हैं वह हमें बासी – सी लगती हैं। उनका प्रभाव धूमिल हो जाता है, ‘परन्तु यहां इसे देखना’, ‘इसमें होना’, ‘अनोखा काम लगना’, ‘अनुभव की नवीनता का प्रगटन’ इसमें होने की संश्लिष्ट अनुभूति यथार्थ की ही पुनर्रचना है। सजग संवेदनशील पाठक के लिए साक्षात्कार की यह प्रतीति और विमर्श – प्रक्रिया बहुआयामी वास्तविकता की नवीनता की टोह लेने की ओर उन्मुख करती है।

यहां विमर्श से आशय – विचार, प्रवृत्तियों, दृष्टिकोण, धारणाओं आदि से है। इसी के आधार और पृष्ठभूमि में साहित्य और समाज- व्यवस्था में मुठभेड़ जारी रहती है। इस जानने और रचने की प्रक्रिया में यह उजागर होता जाता है कि रचना के साहित्य तंत्र किस प्रकार इतिहास को धुरी पर आविर्भूत होते हैं। इस क्रम में पाठक रचना में साहित्यिक और ऐतिहासिक व्यापारों में संगति, असंगति, द्वंद्व, तनाव, टकराव खोजते हुए संभावना की टोह लेते हैं।

इस दृष्टि में इसी संग्रह की ‘कपड़े के जूते’ नामक कविता की पंक्तियों पर गौर किया जाय-

“लेकिन जब तारे छिटकने लगते हैं

और शाम की टहनियां उन पुराने जूतों में भर जाती हैं

तो उन्हीं धुंधले और खतरनाक रास्तों पर स्वप्न के

सुदूर चक्के तेज घूमते हुए आते हैं और

आदमी की नींद में रोशनी और जड़ें फेंकते हुए

कहां-कहां फेंक दी गयीं और छोड़ दी गयीं और

बेकार पड़ी चीजों को एक

हरियाली की तरह बटोर लाती हैं”

“उनके भीतर बारिश का पानी ठहर गया है

हवा तेज चलने से बारिश का पानी पैर की तरह हिलता है।”

उक्त पंक्तियों में अनुभूति की वेगवती उष्मा कैसे संवेदना से पिघलती है। वह स्वतः प्रवाहित होकर कैसे अपनी गति का विन्यास करती है, इस गति की पकड़ तो भाषा में ही है। इसीलिए उपनिषद से लेकर आज तक वाक् को इतना महिमामंडित किया गया है।

परन्तु दिक्कत यह है कि हम रोज ब रोज विमर्श की नयी-नयी अवधारणाओं के मिथक लोक में ढकेले जा रहे हैं। इस प्रपंच में दिग्भ्रांति की महामाया-जाल में चक्कर खाते –खाते रचनाशीलता का यह आलम है कि नित नवीनतम रूपान्तरित होती हुई नयी वास्तविकता द्वारा प्रदत्त चुनौतियों को ठीक-ठाक समझना भी असंभव नहीं, तो कठिन तो अवश्य हो गया है। परिणामस्वरूप उनका सामना करना तो और दुष्कर हो गया है। मसलन हमारे विमर्श में इतिहास का सन्दर्भ गायब किया जा रहा है। ‘पूंजी’ ही हमारी अस्मिता को परिभाषित कर रही है। ‘कला की स्वायत्तता’ और मीडिया निर्मित इतिहास से चेतना दिग्भ्रमित हो रही है। बौद्रिलार्द के कथनानुसार ‘मास कल्चर’ सभी विचारधाराओं और दृष्टियों को हजम कर जा रहा है। महावृत्तान्त की अस्वीकृति, ‘अन्यत्व’, ‘भिन्नता’,  ‘अस्मिता’ और ‘पार्थक्य’ के आरोपण में हम यह नजरअंदाज कर रहे हैं कि ‘रीजन’ जिसे तानाशाह बताया जा रहा है उसकी ओट में संवादधर्मी को ही तहस-नहस किया जा रहा है।

कहना न होगा कि भिन्नता के बावजूद विश्व की विभिन्न फलश्रुतियों में साझापन भी एक तथ्य और कन्सट्रक्ट है। उससे संबद्धता विकसित और फलीभूत हो सकती है। क्या अस्मिता बोध का सम्बद्धताओं के समुच्चय से कोई संबंध नहीं बनता? इस महावृतान्त के प्रतिवाद के साथ-साथ आईडेंटिटी, जेंडर, एथेंटिसिटी की असंबद्धता, स्वायत्तता का उद्घोष करते हुए यह भूल जाते हैं कि इन प्रश्नों तथा इनसे अर्जित उत्तरों के बीच सम्मानपूर्वक संवाद की अत्यंत अनिवार्य आवश्यकता है। हमने इसे इसलिए रेखांकित किया है कि इस अन्धड़ में इन्हें ही आत्मविमर्श से प्रेरित रचनाओं का मान बताया जा रहा है।

सवाल उठते हैं कि आखिर साहित्यिकता का निर्धारण कैसे किया जाए? जाहिर है कि साहित्यिकता के निर्धारण का तात्पर्य केवल लेखक ही नहीं, रचना का भी अभिप्राय व्यंजित करता है। ‘पाठ’ सौन्दर्यशास्त्र का साक्ष्य तभी बन सकता है अगर उसकी भाषा  की सर्जनात्मक संभावनाएं रचनाकार-पाठक के आत्मबोध का विस्तार करे। पाठक की संवेदना को उसके विवेक और संवेदन के लिए अवकाश दें।

विषयों के संज्ञान की कोटियां होती हैं। इन्हीं के द्वारा हम नये के आगमन की आवश्यकता और उसके औचित्य को समझते हैं। कहना न होगा कि कृतियां अपने ऐतिहासिक दौर के राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक विमर्श से जुड़ी रहती हैं। जिस काल में रचना की तहें खुलती हैं, उस काल की परिस्थिति में उत्पादित रचनाशीलता के उस प्रसंग विशेष के पाठ और पठन-प्रक्रिया में और उससे संबंधित सिद्धांतों, नये पदबंधों, नयी संकल्पनाओं की ज्ञान- प्रक्रिया, इतिहास- प्रक्रिया के उन्मूलन के विरुद्ध तनकर खड़ी होती है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पश्चिम में उत्तर एवं उत्तर आधुनिक टेक्स्ट समाजवाद के भय तथा साम्राज्यवाद, बर्बर पूंजीवाद से भयभीत ‘स्व’ , – ‘व्यक्ति’ के संकटापन्न अहम् की रक्षा के लिए निर्मित किया गया है। क्या वह वर्तमान को यथावत् बनाए रखने या उसे विस्तार देने का कवच नहीं है?

आलोक धन्वा सन 60 के ‘नक्सलवाड़ी आंदोलन’ की उपज हैं। इसलिए उस अवधि का संक्षिप्त जायजा लेना जरूरी है। उस कालावधि में छोटे-छोटे तनाव उग्रतर होने लगे। यह इसलिए कि व्यवस्था के अन्तर्विरोध तेजी से उभरने लगे। इसके साथ ही साथ छोटे-छोटे सेफ्टी वाल्व भी खुलने लगे। एक ओर संघर्ष का अत्यधिक ताप, दूसरी ओर उसका उतार। इस उन्मुखता और विमुखता की क्रिया-प्रतिक्रिया की परिणति, इस संक्रांति काल की अनुभूतियां केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्वव्यापी थीं।

इस विश्वव्यापी आलोड़न के दौर में वियतनाम का मुक्ति संघर्ष, तीसरी दुनिया के देशों में साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वतंत्रता के बहुआयामी संघर्ष, समाजवादी देशों, विश्व कम्युनिस्ट पार्टियों विशेषकर सोवियत और चीन में गहरे तनाव, चीन में सांस्कृतिक क्रांति, शीतयुद्ध का तीव्र अभियान, फ्रांस में छात्र  आंदोलन, यूरो कम्युनिज्म, नव वाम का प्रादुर्भाव, इंग्लैंड में एंग्री यंग मैन आन्दोलन, अमरीका में बीटनिक आंदोलन, दो महायुद्धों के नरसंहार, ‘अस्मिता’, ‘अन्यत्व’, ‘भिन्नता’, ‘पार्थक्य’, सेक्स की अबाध छूट का आंदोलन तथा भारत में शासन-शोषण, दमन, उत्पीड़न के विरुद्ध आमजनता में व्यापक रोष, हड़तालों का लंबा सिलसिला, आमचुनाव में केंद्र में कांग्रेस शासन की इजारेदारी का टूटना, कई प्रांतों में संविद सरकारों का गठन और उनमें टूटन, नक्सलवाड़ी अंचल में कृषक आन्दोलन को केंद्र बनाकर के संपूर्ण भारत में सशस्त्र क्रांति द्वारा राजसत्ता पर अधिकार करन का सक्रिय उद्घोष, कम्युनिस्ट पार्टियों का यह गलत आंकलन कि यह साम्राज्यवाद के अंत का य़ुग है, पूंजीवाद निर्बल हो रहा है आदि घटनाओं के अनुभव के सरगम ने रचनाकारों की मानसिकता को विस्तार दिया। तद्नुरूप मनस्तत्वों के आकार, स्पर्श, गंध, विविध वर्णी रंगारंग वाली कलात्मकता, नयी-नयी अनुभूतियों, जटिल स्थितियों, रागात्मक जटिलताओं, संघर्षों ने विविध आकार ग्रहण किए। इन्हीं की छाया साहित्य में मूल्यों के संकट का प्रामाणित अन्त साक्ष्य गढ़ती हैं।

ये संशलिष्ट जटिलताएं सन् साठ के बाद के साहित्य लोक में अनुभूति और विवेक की लड़ाई में कितनी उत्पादक और कितनी गैर उत्पादक थीं, इनका मूल्यांकन नहीं के बराबर हुआ है। संक्रमण, परिवर्तन के रूपों, उनके अन्तर्विरोधों, नयी आवेगात्मक रुझानों, यथार्थ के सही और संदिग्ध अवधान, अनवधान वाली रचनाशीलता जिस प्रगटन में चरितार्थ हुई है, आत्मबोध की ये प्रक्रियाएं अकहानी, अकविता, भूखी पीढ़ी की कविता, दिगम्बर पीढ़ी, नक्सलवादी सशस्त्र क्रांति, जनवादी तथा किसिम-किसिम की कविताओं में अवतरित हुई हैं। अज्ञेय की यह उक्ति इस संदर्भ में सार्थक लगती है कि “संसार की अनुभूतियां और घटनाएं साहित्यकार के लिए मिट्टी है, जिनसे वह प्रतिमा बनाता है। वह निरी सामग्री है, उपकरण है… कलाकार उसका मनमाना प्रयोग कर सकता है। इन स्पन्दनों की तड़प भारत ही नहीं समूचे विश्व को उद्वेलित करने लगी है।” इस विश्वव्यापी परिदृश्य ने सन् साठ के बाद की कला प्रवृत्तियों को मर्यादित किया।

हमने ऊपर लिखा है कि आलोक धन्वा नक्सलवादी आन्दोलन के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। इनके काव्य संकलन में 1972 से 1997 तक की रची गयी कवितायें संकलित हैं। इनकी बहुआयामी कविताओं पर गंभीरता से केवल एक लेख में विचार करना बड़ा सतहीपन होगा, इसलिए यहां ‘कपड़े के जूते’ कविता की संश्लिष्टता पर विचार करूंगा। इस कविता में रचनाकार और पाठक के अपने होने के अर्थ का आधार, गन्तव्य की जिज्ञासा, ऐन्द्रिक संवेदनों से फूटती हुई सूक्ष्म बौद्धिक स्तरों तक सक्रिय दीखता है। इसमें भूत, वर्तमान तथा भविष्य के अविच्छिन्न अनुभवों की ज्ञानमीमांसीय पकड़ है। अगर इस कविता के अन्तर्गत मानव अस्तित्व की व्याख्या समझी जाय तो इसमें मानव सभ्यता के ऐतिहासिक अस्तित्व के विभिन्न स्तरों, दृष्टांतों, आधार प्रक्रिया के रूप में, अधिरचना के अन्तःऔर वाह्य प्रक्रियाएं फ्लैशेज के रूप में चमक उठती हैं।

‘कपड़े के जूते’ की रचना-प्रक्रिया पर विचार करने के पहले, मैं इसी संग्रह में संकलित 1972 में लिखी गई दो अत्यंत लोकप्रिय कविताओं की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा।‘गोली दागो पोस्टर’ के कुछ अंश-

“आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर

एक दरोगा को गोली दागने का अधिकार है

तो मुझे क्यों नहीं?

यह कविता नहीं है

यह गोली दागने की समझ है।”

इसी वर्ष दूसरी मशहूर कविता लिखी गयी-

“क्योंकि अब तक सिर्फ जेल जाने की कविताएं लिखी गयीं

किसी सही आदमी के लिए

जेल उड़ा देने की कविताएं पैदा नहीं हुईं।”

यहां कवि की भावना की कल्पना से उदगृहीत रचना खड़ी की है। हम यह कह सकते हैं कि रचनाकार स्वयं विषयी बनकर, विषय में रूपांतरित होकर उपस्थित होता है। यह भी सही है कि यहां प्रत्ययों का रचनात्मक रूपांतरण करके उसे सार्वलौकिक प्रतिमान बनाया गया है। यदि रचनाकार के संकल्पों पर ध्यान दिया तो उसमें अदम्य मनुष्यता के कालजयी अस्तित्व की उत्तरजीविता है।

परंतु कला के भावों या आवेगों का आकार निरूपित होता है। पाठक रचना के भीतर से उद्भूत सौन्दर्यपरक मूल्य रचनात्मक सत्ता के रूप में खोजता है। मूर्त, वास्तविक, ऐतिहासिक मनुष्य को उसकी व्यावहारिक भौतिक क्रिया से जोड़कर देखने और समझने के लिए वस्तु रूपान्तरित अभिव्यक्ति के अनुभव या संवेदना को, उसके मूल उद्देश्य और उत्ताप को मूर्त ऐन्द्रिय वस्तु में, यथार्थ की प्रतीति में, और प्रतीति के यथार्थ में, यथार्थ को जीवन की धड़कन में, जैविक संबंध में देखता है। जाहिर है कला एक उत्पाद, एक ऐन्द्रिक गतिविधि, एक व्यवहार है। उक्त रचनाओं में रचनाशीलता की आभ्यंतरिक संगति पर गौर करने पर पाठक यह नहीं भूलता कि यहां ‘जटिलता’ का सवाल उठ खड़ा होता है। कहना न होगा कि रचना का मूल्य उसकी संवेदनात्मक एवं बौद्धिक जटिलता के संस्तर पर ही निर्भर करता है। कल्पनात्मक प्रक्रिया के तहत कविता में भी समय के ज्ञान तथ्यों के ऐतिहासिक चरित्र की अभिव्यक्ति जटिल रूपों में भाषा के भीतर से पैदा होती है। डाईरेक्ट कथन से नहीं।कृति में वस्तुवरक तत्वों की क्रम व्यवस्था में, कृति की सहजात संघटन शक्ति, स्वयं अपने विन्यास को निर्धारित करती है। इस क्रम में वह अपनी समस्याओं को हल करती हुई अभिप्रेत चेतना के रूप में ढालकर खुद को प्रदर्शित करती है। तभी वह अपने संरचनात्मक तत्वों के सहारे पाठक को आश्वस्त करती है कि रचना एक प्रामाणिक सच्ची भाषा बोल रही है। कृति का रूप अपने भीतर की गति को दिखाई देता है जिस पर आधारित ने रूप आकार ग्रहण करते हैं। रचना का रूप महज वस्तुपरक पक्षों के ब्यौरों के दर्ज करने से ही बनता, वह केवल ऐतिहासिक विकास से नहीं निर्मित होता, वह बहुत संशलिष्ट होता है।

आत्म और वस्तु के द्वंद्वात्मक संबंध, कलात्मक रचाव में सामाजिक, ऐतिहासिक परस्पर निर्भरताओं, विषयों और विषय के बीच के अन्तर्संबंध के सृजनात्मक रूप इसी संग्रह की कविता ‘कपड़े के जूते’ में देखा जा सकता है। यह कविता 1979 में लिखी गई। इस समय तक नक्सलवादी आंदोलन में भाटा आ गया था। इस कविता के पूरे पाठ के साथ, रचना में प्रवेश करके भाषाई वस्तुनिष्ठता की दृष्टि से पाठक दृश्यों, वस्तुस्थितियों,समय के साथ बदलते अर्थों की जैसी प्रतीति करता है तो उसे आरतुरी बी- फालकों का कथन स्मरण हो जाता है और इस संदर्भ में युक्ति-युक्त लगता है। आरतुरी ने लिखा है- “जिस क्षण से कला जगत में बाह्य क्षण अवतीर्ण होते हैं उसी क्षण से उनके बीच में एक विशेष प्रकार का अन्तरावलंबित इंटर इंडिपेंडेंट आत्मालोचन तथा अन्तः संबंध भी अवतीर्ण हो जाता है।”(आर्ट एंड इग्जश्टेंशिएलिज्म, पेज 47) इसी तरह यह भी कहा जाता है कि एक रचना दूसरे की आलोचना होती है।

इस कविता के इस तरह के रचाव से साफ-साफ जाहिर होता है कि आलोक धन्वा की चेतना का यह स्तर है जिसमें वह आत्मलोचना द्वारा अनुभूत कर लेते हैं कि कविता की समकालीन परिस्थितियां जिस सामूहिक कायाकल्प की संगठित और अनुशासित कर्म की चुनौती प्रस्तुत कर रही थीं, उसके लिए सामूहिक मन तैयार नहीं हो पाया है। लेखक के साथ पाठक भी कथन की सामूहिकता खोजता है क्योंकि उसी समय के साथ अर्थ भी परिवर्तित होता है। बदलते बदलाव के क्रम में आत्मा और वस्तु के नए संबंध बनने लगते हैं। सचेत पाठक रचना में प्रवेश करके भाषा में अन्तर्निहित ध्वनियों को गहरे में जाकर पकड़ता है। रचनाकार और पाठक के लिए यह पकड़न की भाषा को सिद्ध करना है।

आधुनिकतावादी और उत्तर आधुनिकों ने सौन्दर्य प्रतिमानों का जो आतंक गढ़ रखा है उनके अनुसार वे सौन्दर्य प्रतिमानों पर तो जोर देते हैं परंतु व्यंजक और व्यंजित के बीच, बिम्ब और वस्तु के बीच अस्मिता संबंधी दरार रचते हैं, उसे पीटते नहीं। वे सौन्दर्य संबंधी इस महत्व को दरकिनार कर देते हैं कि रचनाशीलता को असली पहचान स्थितियों के परस्पर संबंध और गहरे संपर्क के सहारे निर्मित अर्थ संश्लेष का है। वही रचना को सर्जनात्मक बनाती है, इसके बिना अनुभव को समग्रता में व्यक्त किया ही नहीं जा सकता। आज की परिस्थिति में तो यह प्रामाणिक सिद्ध सत्य है कि शासक- शोषक और उनके पैरोकार व्यवस्था के अन्तर्विरोधों को रिजाल्व करने में  नहीं बल्कि उन्हें डिप्यूज करने में लगे हैं। ऐसी हालत में प्रतिबद्ध लेखक के सामने आज केवल यही विकल्प शेष रह गया है कि वह जनतांत्रिक पद्धति रेखांकित और उसे विकसित करे। वाल्टर बेंजामिन ने तो कला को उत्पाद के रूप में विवेचित किया है। इसी क्रम में इसने दादावाद की क्रांतिकारी ताकत को, कला को, प्रामाणिकता की कसौटी पर कसकर परखा है। कहना न होगा कि दादावादियों में टिकटों, धाके की धारियों, सिगरेट के टुकड़ों से लेकर जो अचल चित्र बनाए थे उसके बारे में बेंजामिन ने लिखा है कि “लघुतम प्रामाणिक कतरा ही पेंटिंग के बनिस्बत ज्यादा कुछ कहता है। ठीक वैसे ही जैसे कागज पर किसी खूनी का फिंगर प्रिंट उस पर छपे शब्दों से ज्यादा कुछ कहती है। इस क्रांतिकारी रवैये का बहुत कुछ भाग चित्र- संग्रथन फोटो मोंताज में चला आया।” बेंजामिन ने नई वस्तुपरकता (न्यू आब्जेक्टिविटी) के बारे में अपनी टीकाओं की भूमिका में लिखा है कि ‘हम इस तथ्य के सामने खड़े हैं कि उत्पादन व प्रकाशन का बुर्जुवाई उपकरण क्रांतिकारी विषय वस्तुओं की विपुल मात्रा को पचा जाने की, बल्कि उनका प्रसारण करने की शक्ति रखता है। इसलिए उत्पादक का रुख अख्तियार किए लेखक के लिए टेक्निकल प्रगति, उसकी राजनीतिक प्रगति का आधार देता है।’ उसने ब्रेख्त का उदाहरण देते हुए लिखा है कि “ब्रेख्त ने प्रगतिशील बुद्धिजीवियों-यानी उत्पादन के माध्यम को मुक्त करने में दिलचस्पी रखने के तहत वर्ग-संघर्ष में सक्रिय बुद्धिजीवियों के द्वारा उत्पादन के रूपों और उपकरणों के रूपान्तरण को दर्शाने के लिए एक युक्ति गढ़ी थी, उपयोगी रूपान्तरण (फंक्शनल ट्रांस्फार्मेशन)… उत्पादन के उपकरणों को संभाव्य की सीमा में लाकर समाजवाद की दिशा में घुमाए बिना ‘सप्लाई’ नहीं करना चाहिए।”

मैंने इसीलिए इन्हीं उक्तियों को ध्यान में रखते हुए ‘गोली दागो पोस्टर’ और ‘जनता का आदमी’ पर टिप्पणी की है। परन्तु ‘कपड़े के जूते’ के माध्यम से पाठक आलोक धन्वा की आत्मपरकता यथार्थ के साथ उसके सौन्दर्यपरक संबंधों के प्रगटन में अवतरित होता अनुभव करता है।

‘कपड़े के जूते’ की संरचना में अन्तर्वस्तु के साथ उसकी संरचना में प्रगट रूपों के जीवन पर ध्यान जाता है। इन रूपों के माध्यम से कई कालखण्डों के बीच प्रगट ऐतिहासिक विकास की झलक दिखायी पड़ती है। इसके लिए हमें कविता –संरचना के संकेत तंत्र के क्षेत्र में उतरना पड़ेगा। क्योंकि इन्हीं संकेत तंत्र में अर्थोत्पत्ति हुई है। और समूची कविता पर ध्यान देने से रिश्तों के संकेत निर्माण की प्रक्रिया का ज्ञान होता है। जाहिर है कि शब्द मात्र संकेत है। भाषा हमारे लिए संस्कृति की व्यंजक है। भाषा संकेत तंत्र के आलोक में काम करती है। ‘कपड़े के जूते’ में शब्दों के प्रयोग की विशिष्टता यह है कि यह हमारे इर्द-गिर्द की दुनिया का अवलोकन कराते हैं। विषयी के लिए हासिये पर पड़े ये उपेक्षित शब्द उसके लिए विषय (आब्जेक्ट) बन जाते हैं। मानों उनसे पहली बार उनका साबका पड़ा है। लगता है जैसे प्रस्तुत कविता की संकेत प्रणाली हमें इतिहास के विकास की गतिशीलता से संबद्ध कर देती है। इतनी जानकारी तो सभी पाठकों को रहती है कि इस दायरे में शब्द स्वतंत्र अर्थ नहीं रखते, रचनाकार उन्हें अर्थ देता है। संकेत वस्तु और व्यंजक की भूमिका ग्रहण कर लेता है। पाठक वस्तुओं को संबंधों के तंत्र में यानी संरचना के आलोक में देखता है। कवि ने कपड़े के जूते, रेल की चमकती पटरियां, जमीन इत्यादि शब्द संकेतों के नेटवर्क में प्रकृति, मानव सभ्यता के वस्तुओं और संदर्भों के वृहत्तर जाल के, आवर्तीकाल के विन्यासों को अभिव्यक्त किया है।

इस कविता में ‘कपड़े के जूते’ का संकेत श्रम या श्रमिक से है। यही शब्द संरचना के सात्विक और रूपगत यथार्थ का नाभिकेंद्र है। रचना इसी केंद्र से अर्थ का आलोक प्रकाशित करती है जो फैलकर रचनालोक के परिधि को घेरते हुए उसे अतिक्रमित करता है। यानी भाषा वस्तुओं को अपने रंग में रंग देत है क्यों शब्दों में, इनमें प्रयुक्त संकेतों में अर्थों, उद्देश्यों, व्यवहारों के बिम्ब रचे गए हैं। इनकी आंतरिक नाटकीयता भावनात्मक सघनता पर बनी रहती है। उदाहरण के लिए-

“उस दौर से गुजर रहे राहगीर का

एक कदम पीछा करते हुए

वे कपड़े के पुराने जूते हैं

उनके भीतर बारिश का पानी ठहर गया है

हवा तेज चलने से बारिश का पानी पैर की तरह हिलता है”

यहां शब्द और उसके संकेत एक साथ बाह्य उपस्थिति है और आन्तरिक भी। इनके माध्यम से रचनाकार प्रत्यक्ष को संवेदना में बदलता है, उसे अपना निजी स्वरूप और विधान देता है।

“जूतों की दुनिया जहां से शुरू हुई होगी

गड़रिये वहां तक जरूर आए होंगे”

‘’ क्यों कि भेड़ों के भीतर एक निविड़ता है, आज भी

जहां से समुद्र सुनाई पड़ता है‘’

“जूते जो प्राचीन हैं

जिस तरह नावें प्राचीन हैं”

“लेकिन हमारे कपड़े-

जो पालों से अधिक प्राचीन हैं”

“और जमीन-

जो फल से अधिक प्राचीन है”

“जूतों को आदमियों ने बनाया-

जिस तरह बगीचों को आदमियों ने बनाया”

यहां ‘जूते’, ‘गड़रिये’, ‘भेड़ों’,  ‘ समुद्र’, ‘नावें’, ‘पाल’,  ‘फल’,  ‘बागीचे’ इत्यादि शब्द संकेतों द्वारा प्रकिति और सभ्यता के विकास के संबंधों, आधार जिसे प्रक्रिया कहा जा सकता है और अधिरचना से संबद्ध अनेक विशिष्ट क्रियाओं की ओर निर्देशित किया गया है।

वे हमें सभ्यता के उद्गम से विकास तक की यात्रा कराते हैं। कविता में रूपों का यह जीवन सभ्यता के आदिकाल से लेकर एक कालखंड से दूसरे कालखंड के बीच प्रगट ऐतिहासिक विकास की मात्र  झलक ‘ट्रेस’ देता है । यद्यपि इस विकास क्रम के साथ रचनालोक संबंध समयगत अन्तराल, जटिलताओं तथा कतिपय प्रत्यक्ष और परोक्ष सुदूर संबंधों की पाठकीय समझ निर्भर करता है। इस तरह भाषा का अर्थ से, अर्थ का अनुभव से, अनुभव का यथार्थ से, यथार्थ का जीवन स्थितियों से, जीवन स्थितियों का इतिहास से परोक्ष, काल्पनिक, ज्ञानमीमांसीय सत्ता संबंध होता है।

ऊपर हमने कविता में शब्दों की शर्तों की बात की है। आलोक धन्वा ने शब्द और अर्थ का जो विन्यास निर्मित किया है उनमें प्रत्यक्ष या प्रतीयमान समानता नहीं दीखती लेकिन विन्यास में ऐतिहासिक और तात्विक समानधर्मिता है जिसे पाठक विश्लेषण से पहचान पाता है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि यहां प्रतिबिम्बन या पुनरुत्पादन, आधार और ऊपरी ढांचा के बीच सीधा संबंध नहीं है। इसलिए इस जटिलता को भेदना पाठक का काम है। उदाहरण के लिए-

“ये जूते दुनिया में हत्या और बलात्कार जैसी

ठोस चीजों के विरुद्ध

बहुत तरल हैं”

यहां ‘जूते’ शब्द संकेतक से संकेतित बन गया है। यानी  ‘जूते’ शब्द संकेतन के अर्थ की संकल्पना बना दिया गया है। कविता भाषा में ‘जूते’ शब्द को गतिशील, सामाजिक संकेत बनाकर इस संरचना में जगह-जगह विभिन्न सामाजिक, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विभिन्न अर्थ और अभिप्राय निर्मित किए गए हैं।

“और चूहों के लिए तो

कपड़े के ये जूते वर्णमाला की तरह हैं

जहां से वे कुतरने की शुरुआत करते हैं”

जैसे भाषा ज्ञान का प्रारंभ वर्णमाला से शुरू किया जाता है उसी तरह शोषण, दमन, उत्पीड़न का प्रारंभ भी श्रम के शोषण से शुरू होता है। ‘चूहे’ यहां शोषक है। बोलोशिनोव न लिखा है-“बोध तब जाग्रत और प्रभावकर होता है, जब उसको संकेतों का भौतिक कलेवर प्राप्त होता है। भाषा का सामाजिक रूप से विन्यस्त संकेतों का तंत्र है, अपने आप में एक भौतिक यथार्थ है।”

“ इन जूतों के भीतर धूल और पहाड़ों से भरे

रास्ते बिखरे हुए हैं-

आवाजों और मैदानों के भटक गए छोर इन्हें टिकने दे रहे हैं

आवाजों और मैदानों के भटक गये छोर

जो आदमी की जरूरतों के बाहर रह गये।”

“रेल की पटरियों के किनारे

वे कपड़े के पुराने जूते हैं

एक आदमी उन्हें छोड़कर चला गया

और एक ही कदम बाद अदृश्य हो गया

क्योंकि जूतों की दुनिया है सिर्फ एक कदम की”

किसी ने लिखा है कि जिस हद तक चेतना सच्चाई का अभिज्ञान करती है उस हद तक सच्चाई एक वस्तु है। यह वस्तु –सत्ता स्पेस में अपनी शक्ल बनाती है। इसे ही वस्तु सच्चाई ‘थिंग रियलिटी’ कहा गया है। लेखक-पाठक इस क्रम भंगता में सच को एक वस्तु के रूप में संकल्पित करता है और इसी ‘खोज’ में सत्य प्रकाशित होता है।

कहना न होगा कि सोस्यूर ने भाषा-मीमांसा में वाक् की बोली जाने वाली घटना, ‘पैरोल’ को हिमशैल तथा ‘लॉग’ को ‘अमूर्त अवधारणा’ कहा है। उसने बताया है कि  शब्द जैसे हिमशैल का ऊपरी सिरा है, जो समुद्र की सतह पर तैरता रहता है जिसे हम देखते हैं। लॉग समग्रता में हिम का वह विशाल खण्ड है, जो ऊपरी सिरे को तो संभाले रहता है, लेकिन स्वयं अदृश्य रहता है। यहां ‘जूते’, ‘अदृश्य होना’, जूते फफूंद से ढक गये हैं खेल के निर्णायक क्षणों में तथा ‘जूते’ सूर्य की तरह गर्म हुए होंगे इत्यादि शब्द और पदबंध पैरोल हैं। यह दैनन्दिन भाषा व्यवहार में प्रयोग किये जाते हैं। इसके माध्यम से ‘लॉग’ इत्यादि कविता की अवधारणा को समझा जा सकता है। इस तरह आलोक धन्वा की भाषा भावनाएं, कल्पना, साहित्यिक युक्तियों के क्रियान्वयन का परिप्रेक्ष्य पाठक के लिए एक उपलब्धि ही कही जाएगी।

“रेल की चमकती पटरियों के किनारे

वे अब सिर्फ कपड़े के पुराने जूते ही नहीं  हैं

बल्कि वे अब

ऐसे धुंधले और खतरनाक रास्ते हो चुके हैं

जिन पर जासूस भी चलने में असमर्थ हैं”

यहां कवि का वर्तमान इतिहास बोध है। यानी हम जो देख रहे हैं वहीं न रुककर भविष्य की संभावना की टोह ले रहे हैं। यही काव्य-भाषा की नवोन्मेषशालिनी प्रक्रिया है। जहां भाषा द्वारा अर्जित विचार और भाषा को सिरजती विचार प्रक्रिया का विमर्श है। इस विमर्श में विचार, अभिवृत्ति, दृष्टिकोण, धारणा सभी कुछ  है। इस प्रकार समूची कविता अपने विन्यास में मूर्त, वास्तविक, ऐतिहासिक तथा व्यवहारिक जरूरतों को भौतिक क्रिया से जोड़कर देखती है। ‘कपड़े के जूते’ के माध्यम से श्रम के विकास को, श्रम के इतिहास को, श्रमिक की यातना के विभिन्न किस्म के बनते-बिगड़ते संबंध दिखाये गए हैं। इस विन्यास में कवि का आत्मवस्तु बन जाता है और वस्तु आत्म में रूपान्तरित हो जाती है। यानी श्रम व्यवहार और सौन्दर्य की रचनात्मकता सत्ता के रूप में पढ़ा जा सकता है। यहां अनुभूति और विवेक की लड़ाई उत्पादक है।

“एक आदमी उन्हें छोड़कर चला गया

और एक ही कदम बाद अदृश्य हो गया”

यहां ‘छोड़ना’ और  ‘अदृश्य होना’ कविता में सारी अभिव्यक्तियां विविध ऐतिहासिक स्थितियों एवं मनोदशाओं और विविध प्रकार के लहजों में उच्चारित हुई है। इसी कविता में ‘चरवाहे’ से लेकर ‘रेल की पटरी’ तक शब्द प्रगैतिहासिक काल से लेकर पूंजीवादी युग तक को घेरते हैं। अतः कविता में इन उद्गारों के प्रत्येक तत्व अर्थ-गर्भ के साथ मूल्य के रूप में भी विराजमान हैं।

“ बल्कि वे अब

ऐसे धुंधले और खतरनाक रास्ते हो चुके हैं-

जिन पर जासूस भी चलने में असमर्थ हैं

लेकिन जब तारे छिटकने लगते हैं

और शाम की टहनियां उन पुराने जूतों में भर जाती हैं

तो उन्हीं धुंधले और खतरनाक रास्तों पर स्वप्न के

सुदूर चक्के तेज घूमते ह ए आते हैं और

बेकार पड़ी चीजों को एक हरियाली की तरह बटोर लाते हैं।”

इतिहास के इस कालावधि में रास्तों का ‘धुंधले और खतरनाक होना’ ‘जिन पर जासूस चलने में असमर्थ हैं’ क्रांतिकारी परिस्थिति और गतिविधि के ‘स्वप्न क्रांति’ के रूप में इतिहास का अर्थ वहन करने वाले बुनियादी तत्वों की समझ और विस्तार में क्रांति के प्रणाली के भीतर ही किया जा सकता है। जाहिर है कि इतिहास के भीतर से उभरने वाली धारणाएं मूल्य बन जाती हैं। ‘जूते’ की तरह इतिहास –प्रक्रिया में मूल्य जन्मते है और वे इतिहास में विलीन भी होते रहते हैं।

ऊपर मैंने कविता के एक अंश को उद्धृत किया है। वे इतिहास प्रक्रिया की समझ पैदा करते हैं। आलोक धन्वा समय की वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए समाज व्यवस्था के परिवर्तन के लिए जो उपक्रम चल रहे हैं, उनमें समकालीन जीवन में जो संघर्ष है, उन संघर्षों भीतर गतिवान, परिपक्व होते हुए रचे जाते हुए मूल्यों को पहचानने और अभिव्यक्त करने की क्षमता रखते हैं। ध्यान में रखने की बात है कि आलोक धन्वा कलावादियों और उत्तर आधुनिकों की तरह काल चेतना और इतिहास चेतना में अंतर नहीं मानते। उनकी कविता का काल इतिहासबद्ध काल है। कविता की विचारधारा के अनुसार रचनाकार हमेशा मूल्यों के मूर्तरूप की खोज करता है। इसीलिए कहा गया है कि शब्द की शब्दता मानवीय जीवन को रचनात्मकता से जोड़ देती है। रचनात्मकता  में ही संबंधों की प्रतिध्वनि गूंजती है। मार्क्स ने स्वयं लिखा है- “ लोग यह समझने में असमर्थ रहते हैं कि ये सुनिश्चित सामाजिक संबंध ठीक कपड़ा, फ्लैक्स आदि की ही तरह मनुष्यों की पैदावार होते हैं। पूंजी और वह स्वरूप जिसमें राष्ट्रीय व्यवस्था खुद को साकार करे, कोई वस्तु नहीं वस्तु के माध्यम व्यक्तियों के बीच स्थापित एक सामाजिक संबंध हैं।” (पावर्टी ऑफ फिलासफी, पृ. 1 वर्ग चेतना की श्रेणी में-) सभी संभावित श्रेणियों के ऐतिहासिक और व्यवस्थिति वर्गीकरण का आयत्त करना पड़ता  है।  इस कविता के संदर्भ में कवि ऐतिहासिक सत्य से समीकृत आत्मगत अवग्रहण करता है और क्रमशः यह कृति भावनात्मक उत्कर्ष पा लेती है।