समकालीन चुनौतियां और आगे का रास्ता
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कारपोरेट-कम्युनल चरित्र है शासन का
सत्यपाल सिवाच
वर्तमान समय पर कारपोरेट-कम्युनल गठजोड़ सत्ता पर कायम है। इसके चलते मेहनतकश जनता के अन्य हिस्सों के साथ-साथ कर्मचारियों को भी चौतरफा हमलों का सामना करना पड़ रहा है। पहला – नव उदारीकरण की नीतियों के कारण रोजी-रोटी पर हमला; दूसरा – साम्प्रदायिक, जातिवादी अथवा क्षेत्र आदि अन्य संकीर्ण मुद्दों पर नफरत और विभाजन यानी एकता पर हमला; तीसरा – जनतांत्रिक अधिकारों पर हमला तथा चौथा – संवैधानिक संस्थाओं को नकारा बनाते हुए संविधान पर हमला। जब सन् 2014 में देश और प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी उस समय ही एक बात उभर कर सामने आई थी कि वह एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी के आने जैसा सामान्य मामला नहीं था। इसके दो मुख्य कारण हैं – भाजपा पर आर.एस.एस. का नियंत्रण व निर्देशन और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का खुला समर्थन। आर.एस.एस. एक ऐसा संगठन है जो संविधान के प्रति जवाबदेह नहीं है लेकिन भाजपा के जरिए अवैध व अनैतिक ढंग से सत्ता का सुख भोग रहा है। वह घोषित रूप से “हिन्दू राष्ट्र” की स्थापना के लक्ष्य के लिए काम करता है और विचारधारा, संरचना व कार्यप्रणाली की दृष्टि से फासीवादी है। देश और विदेश के बड़े पूंजीपति और विशेषकर चहेते पूंजीपति सरकार की पीठ पर हैं।
शुरू में कुछ लोग मानते थे कि कारोबार की सुगमता के लिए पूंजीपति साम्प्रदायिक दंगों की इजाज़त नहीं देंगे। व्यवहार में देखा गया है कि उन्हें ऐसा बर्बर शासन सर्वाधिक पसंद है जो वोटों के लिए लोगों की सेवा और सुशासन पर निर्भर नहीं करता, बल्कि साम्प्रदायिक विभाजन से सत्ता हासिल करता है और निरंकुश होकर पूंजीपतियों को आर्थिक लूट की छूट देता है। वर्तमान दौर को आर्थिक क्षेत्र में नव उदारवाद कहा जाता है।
नव उदारवाद क्या है?
“नव उदारवाद” साम्राज्यवाद के नये रूप का ही नाम है। जिसके तहत चीजों को बेचकर मुनाफा कमाने के सामान्य तरीके से ही काम नहीं चलता, बल्कि प्राकृतिक और सार्वजनिक दौलत को सीधे डकैतों की तरह हड़प लिया जाता है। आज के साम्राज्यवाद की पहचान “विश्व वित्तीय पूंजी” के रूप में की जाती है। एक बहुत बड़ी कंपनी (मल्टीनेशनल) में कई देशों के पूंजीपति पैसा लगाते हैं और वह कंपनी एक साथ कई देशों में (ट्रांसनेशनल) कारोबार करती है। इस तरह दुनिया भर के पूंजीपति मिलकर सभी देशों में आम जनता को लूटते हैं।
*इस प्रक्रिया को समझने की दूसरी बात है :–*
पूंजीवादी व्यवस्था में एक बुनियादी विरोधाभास होता है – उत्पादन सामूहिक रूप से किया जाता है लेकिन तैयार वस्तु की मल्कियत एक व्यक्ति या कंपनी की हो जाती है। इसके कारण पूंजीवाद में दो स्थायी व लाइलाज रोग बने रहते हैं –
1. वह कभी शोषण करना नहीं छोड़ सकता, क्योंकि किसानों व प्राथमिक उत्पादकों से कच्चा माल कम कीमत पर लेने और मजदूरों को कम दिहाड़ी देकर काम करवाने पर ही उसे बेहिसाब मुनाफा मिलता है।
2. वह कभी संकट से बाहर नहीं निकल पाता, क्योंकि कच्चे माल की कीमत व मजदूरी के रूप में कम पैसा जनता को मिला होता है। इस वजह से कारखाने द्वारा बनाया गया सारा माल बिक नहीं पाता। माल न बिके तो मुनाफा कहाँ से मिले? इसी को ‘आर्थिक मंदी’ कह सकते हैं।
मंदी से बाहर निकलने का रास्ता
कच्चे माल की पूरी कीमत दे दें, मजदूरों की दिहाड़ी बढ़ा दें और ज्यादा लोगों को काम पर लगा लें तभी मंदी खत्म हो सकती है। लोगों के पास पैसा जाएगा तो सामान बिकेगा, लेकिन यही बात पूंजीपतियों के गले नहीं उतरती। वे उधार देंगे, किस्तों पर बेचेंगे लेकिन लोगों को उनके माल या मजदूरी की सही कीमत नहीं देंगे। वे अपनी संपत्ति बढ़ाने के लिए सीधे सरकारी/ सामूहिक प्रापर्टी को हथिया लेंगे और वह भी लोगों की बचतों से चल रहे बैंकों से कर्ज उठाकर। अब दुनिया में यही सब चल रहा है।
नव उदारीकरण के दौर के चलते बड़े पूंजीपति वर्ग को बेशुमार लाभ पहुंचाने के लिए कच्चे माल के उत्पादकों, किसानों, पशुपालकों व मजदूरों के हितों पर हमले किये जा रहे हैं। सेवाएं उपलब्ध करवाने वाले कर्मचारियों के वेतन-भत्तों, कार्य की प्रकृति, ट्रेडयूनियन व लोकतांत्रिक अधिकारों में कटौती की जा रही है। इसका मकसद लागत खर्च घटाकर अधिकतम लाभ बटोरना और असंतोष को दबाना है। इस मामले में केन्द्र व हरियाणा सरकारें बहुत तेजी और आक्रामकता के साथ आगे बढ़ रही हैं।
अग्निवीर, कौशल रोजगार निगम, विभागों का सीधे या परोक्ष निजीकरण, उनकी जमीन व अन्य सम्पत्तियों को बेचना, असंवैधानिक बताकर सेवाएं नियमित करने से इन्कार करना, किन्तु कम वेतन पर – अल्पकालिक – अनुबंध पर नियुक्ति जारी रखना आदि अनेक कर्मचारी विरोधी कदम उठाए जा रहे हैं। इनके विरुद्ध लोगों में आक्रोश होगा, यह जानकर फूट डालने वाले व दमनकारी हथकंडे अपनाना पहले से ही जारी है। जात-धर्म पर नफरत, एक ही मांग के नाम पर फूट, बीएमएस में आ जाओ – के नारे पर भटकाव के अलावा तरह-तरह की दमनात्मक कार्रवाइयों के जरिये आतंकित करना चाहते हैं। सम्पत्ति क्षतिपूर्ति कानून या शव सम्मान कानून का मकसद भी संघर्षरत तबकों को दबाने की सरकार की खुशफहमी ही है। *खुशफहमी* इसलिए कि उन्हें मालूम नहीं है कि जब मेहनतकश लोग सड़कों पर आते हैं तो वे कोई भी जोखिम उठाने की परवाह नहीं करते और मंजिल पर पहुँचकर ही दम लेते हैं।
*अपनी समस्याओं के समाधान के दो ही रास्ते हैं – सम्बन्धित क्षेत्र में काम करने वाले अधिकतर लोगों को संगठित करके संघर्ष में उतारना तथा जन असंतोष को राजनीतिक शक्ति में बदलते हुए चुनाव में चोट मारना। उसके लिए वर्गचेतना और राजनीतिक जागरूकता आवश्यक है।
