बेगम पुरा शहर कौ नांउ

कविता

बेगम पुरा शहर कौ नांउ

रैदास

 

*बेगम पुरा शहर कौ नांउ, दुखू अंदोह नहीं तिहिं ठांउ*।

*नां तसवीस खिराजु न मालु, खउफु न खता न तरसु जवालु॥*

*अब मोहि खूद वतन गह पाई, ऊंहा खैरि सदा मेरे भाई।*

*काइमु दाइमु सदा पातसाही, दोम न सेम एक सो आही॥*

*आबादानु सदा मसहूर, ऊँहा गनी बसहि मामूर।*

*तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै, महरम महल न कौ अटकावै।*

*कहि रैदास खलास चमारा, जो हम सहरी सु मीत हमारा॥*

अर्थात

*मैं बेग़मपुरा शहर को नमन करता हूँ जहाँ कोई दुःख या चिंता नहीं है। वहाँ अपने माल पर कोई अतिरिक्त कर देने की परेशानी नहीं है। वहाँ पाप−कर्म नहीं है और पाप−कर्म न होने के कारण किसी का चरित्र नहीं गिरता है। सब बेकसूर हैं। रहने के लिए मुझे इस शहर में सुंदर स्थान मिल गया है। वहाँ सदा अमन−चैन है। वहाँ आत्मिक अवस्था की बादशाहत सदैव रहती है; किसी में दूसरे−तीसरे का भेद नहीं है, सब एक समान हैं। वहाँ का आबदाना (अन्न-पानी) सदा मशहूर है। वहाँ राम रूपी धन से संपन्न और आबदाना से तृप्त व्यक्ति रहते हैं। सभी अपनी इच्छानुसार आनंदपूर्वक विचरण करते हैं क्योंकि वे सभी उस महल से परिचित होते हैं, अतः कोई भी उनके विचरण में व्यवधान पैदा नहीं करता। चर्मकार रैदास कहते हैं, इस शहर में रहनेवाला ही मेरा सच्चा मित्र है।*

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