चर्चित कहानीकार, कवि और पत्रकार उदय प्रकाश ने बहुत दिनों बाद एक टिप्पणी लिखी है। वह जब भी कुछ लिखते हैं चर्चा में रहते हैं। विवाद भी होता ही है। अपनी कहानियों और कविताओं के पात्रों की तरह उन्होंने यहां भी कवि और कविता के कालजयी अमरत्व की बात कही है। टिप्पणी रोचक है। कौन निशाने प र है, यह तो बाद में विद्वतजन बताएंगे। प्रतिबिम्ब के पाठकों के लिए उनके फेसबुक वॉल से साभार लेकर हम प्रकाशित कर रहे हैं।
कवि और कविता के कालजयी अमरत्व पर एक आशु टिप्पणी
उदय प्रकाश
किसी इमारत की गर्त में पड़ा हुआ कवि आख़िर अपने यश और अंधेरे से ऊबकर बाहर निकला
और ओरछा की ओर महोबा के पहाड़ की चोटी पर
बने देवी माता के मंदिर तक चढ़ा जहाँ अक्सर डाकू देवी सिंह भी मृत्योपरांत आता रहता था।
उसी मंदिर में मार्कण्डेय की तरह ऊदल का भाई आल्हा भी अमर होकर हर रात एक कमल का फूल चढ़ाने आता था, जो चौबीस घंटे तक मुरझाता नहीं था
और उसी जगह आल्हा अमर होकर लोककवि जगनिक का लिखा आल्हखंड कभी करुण, कभी रौद्र रस में गाता था।
देवी माँ के उस मंदिर में, ठीक उसी जगह अंधा और कोढ़ी अश्वत्थामा भी अक्सर आता रहता था। उसके माथे की मणि निकाल ली गई थी, वहाँ गहरा गड्ढा बचा था, जिसमें से रक्त, मवाद और कभी नगाड़े कभी मृदंग की ध्वनि निकलती थी।
ग़ज़ब अमर संगीत समारोह उस पहाड़ की छोटी पर आयोजित होता था जिसमें पेड़ तालियाँ बजाते थे, चट्टानें झूमतीं थीं, गिट्टियाँ, रोड़ियाँ, आकाश के तारे सब के सब नाचने-थिरकने लगते थे।
तो… पिथौरागढ़, इंद्रप्रस्थ या हस्तिनापुर की किसी काई लगी या जगमग बिल्डिंग की नींव की गर्त से निकले यशस्वी कवि को अपने काव्य-पाठ के लिए यह स्थान बहुत उचित और उपयुक्त लगा, जहाँ अजर-अमरों के द्वारा, अजर अमरों के लिए, अजर अमर संगीत का आयोजन हुआ करता था।
इस स्थान को अपने काव्य-पाठ हेतु चुनने की पृष्ठभूमि में उस यशस्वी कवि की एक पोलिटिकल-आइडियोलॉजिकल मोहभंग की भूमिका भी थी, जिसकी कुंजी उस भाषा की सिर्फ़ एक मात्रा में कूटबद्ध थी।
किसी बिल्डिंग या भवन की नींव की गर्त्त से अपने यश और अंधकार से ऊबकर निकले कवि को औचक अपनी आत्मा का पता चला और उससे साक्षात्कार करने पर यह बोध प्राप्त हुआ कि बड़ी ई की मात्रा पर आस्था या विश्वास एक ऐतिहासिक ब्लंडर था।
कविता में कवि के रूप में अमर होने के लिए अमीर से दीर्घ ई की मात्र हटानी पड़ेगी।
और उस रात उसने काव्येतिहास का युगांतरकारी निर्णय लिया। यह कविता और कवि की अमरता के निमित्त एक स्पष्ट शहीदाना चेष्टा थी।
कवि ने देवी माँ को प्रणाम कर, अपने झोले से अपने नये कविता संग्रह की पांडुलिपि निकाली, जिसे छापने के लिए कोई भी प्रकाशक इन दिनों तैयार नहीं हो रहा था
कारण यह था कि कवि रिटायर हो चुका था और दूसरे कवि ही नहीं कवयित्रियाँ भी उससे दूर भागती थीं
एकाध यूट्यूबरों और चैनलों ने ट्राई भी किया पर कार्यक्रम फ्लॉप ही गया। साढ़े तीन सौ समीक्षाओं और सोशल मीडिया पर डेढ़ हज़ार पिक्चरों, ऑडियो-वीडियो पोस्ट के बावजूद अमरता पर ख़तरे के सारे काले बादल मंडरा रहे थे।
उसने एक गहरी साँस खींची।
जगनिक, अश्वत्थामा, आल्हा, डाकू देवी सिंह, मार्कण्डेय… सबने दम साध लिया।
और कवि ने अपनी आज तक अप्रकाशित प्रकाश्य पांडुलिपि में से सबसे अव्वल और उम्दा कविता का पाठ प्रारंभ किया
पेड़ तालियाँ बजाने, चट्टानें सिहरने-काँपने, रोड़ियाँ-गिट्टियाँ नाचने-थिरकने की मुद्रा में आ ही रहीं थीं कि मंदिर के प्राचीन अमर पीपल के पत्तों पर विराजमान देवताओं ने उस पीपल की खोह में छुपे एक काव्य-प्रेमी कवि-अनुरागी काने काले कौए को अचानक भगा दिया
कौआ अपने विस्थापन में उड़ता हुआ हल्दी घाटी की ओर गया जहाँ श्यामनारायण पांडे नामक कवि कविता पाठ कर रहा था कौआ वहाँ से भी भगा और उड़ता उड़ता काबुल-कंधार की दिशा में घोर या ग़ज़नी के ऊपर मंडराने लगा।
परंतु काव्यप्रेमी कौआ वहाँ से भी डर कर भारतभूमि की ओर लौटा क्योंकि वहाँ चंदबरदाई वीर रस में आपाद-मस्तक डूबा हुआ उच्चतम शौर्य सुर में रासो गा रहा था।
तो अब करता क्या वह कौआ ?
वह दिल्ली राजधानी की ओर उड़ा और मोहल्ला क्लिनिक को ऊपर से परखता हुआ किसी सरकारी स्कूल की एक खिड़की पर उतर कर अपने थके हुए पंख खुजाने लगा।
काव्यप्रेमी कौआ क्योंकि काला था और दिल्ली की हवा भी इतनी काली थी कि खिड़की के पार अपनी डेस्क में झुकी हुई लड़की उसे देख न सकी। अब क्योंकि कौआ काना भी था, उसकी अच्छी वाली आँख कनपटी की दूसरी तरफ़ थी, सो कौआ भी उस छात्रा को देख न सका।
छात्रा स्कूल की दीवार पर टंगे बोर्ड को देख रही थी जहाँ जीव-विज्ञान या बायोलॉजी का एक नवोन्मेषी टीचर ह्यूमन एनोटॉमी का रेखाचित्र बना कर किसी हार्मोनकी जानकारी दे रहा था।
लड़की इंसानी एनाटॉमी से ऊब कर अपने नोटबुक में एक कविता पढ़ने लगी ठीक इसी पल कौए ने अपनी गर्दन घुमाई थी। उसने देखा कि छात्रा वही कविता पढ़ रही थी, जिसकी पहली पंक्ति सुनते ही ओरछा के पर्वत की चोटी के प्राचीन पीपल के पत्तों के देवताओं ने उसे खोह से बाहर निकाल कर भगा दिया था।
तो, कौआ फिर डरा और जब वह इस बार उड़ा तो लड़की चौंक गई, उसका नोटबुक डेस्क से नीचे गिरा।
जब लड़की नोटबुक उठाने के लिए नीचे झुकी तो सबसे पिछली बेंच पर बैठा एक लड़का उसे नीचे से झांक रहा था। उसने एक काग़ज़ का छोटा-सा हवाई जहाज़ लड़की की ओर सरकाया लेकिन वह हवा में उड़ गया और बायोलॉजी के टीचर की आँख पर जाकर लगा।
टीचर ने टिश्यू पेपर से आँख पोंछी और काग़ज़ के जहाज़ को खोलकर पढ़ने लगा।
लड़की और लड़का दोनों मुस्कुराने को बिना दिखाए मुस्कुराये क्योंकि यह वही कविता थी, जिसकी पहली पंक्ति का पाठ सुनने पर पीपल के पत्तों के देवों ने काने काले काव्य प्रेमी कौए को भगा दिया था।
अब कौआ कहाँ जाता ?
पानीपत कुरुक्षेत्र से लगा कर इंस्टाग्राम और गुरुग्राम तक अपने दिशाहारा विस्थापन में भटकता उड़ता वह कहाँ गया ? कौन जाने ?
हाँ अमर अश्वत्थामा अभी भी, लोगबाग बताते हैं, आधी रात, सुन्न समय में, अपने मस्तक के गह्वर से लहू और नगाड़े की धमक के साथ चीखता है –
“नाश हो महाकाव्यों के कवियों का, वज्र गिरे उन पर, जिन्होंने मुझे ऐसा अमरत्व का कोढ़ी जीवन दिया। अमरता का नाश हो !
जय हे जीवन ! जय भंगुरता ! जय जय क्षणत्व ! ‘
जहाँ तक किसी बिल्डिंग की नींव में गर्त्त में गिरे, अपने यश और अंधेरे से ऊब कर, बाहर निकल कर, अमरता की खोज में ओरछा-महोबा के पर्वत की चोटी पर, देवी माँ के मंदिर में काव्य-पाठ के निमित्त गये कवि का सवाल है, तो ताजा सूचना यह है कि वे पुन: उसी गर्त्त में अपने यश और अँधेरे में घिरे सम्मान और पुरस्कार बटोर रहे हैं।
अश्वत्थामा इक्ष्वाकु वंश के राजा और दशरथ जी के पूर्वज त्रिशंकु से मदद की गुहार लगाते हैं, लेकिन ऋषि विश्वामित्र के शिष्य त्रिशंकु, जो न स्वर्ग में हैं, न धरती पर, दोनों के बीचमबीच अधर में लटके हैं,, वे कहते हैं –
‘सॉरी जेंटलमैन, आईएम हेल्पलेस इन हेल्पिंग यू.
