विजय शंकर पांडेय की कविता – सपने छुट्टी पर हैं

युद्ध के विरुद्ध युद्ध-14

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। आज प्रस्तुत है विजय शंकर पांडेय की कविता सपने छुट्टी पर हैं। संपादक

 

सपने छुट्टी पर हैं

विजय शंकर पांडेय

 

युद्ध शुरू होता है।

पहले बयान आता है।

फिर चेतावनी।

फिर आखिरी चेतावनी।

और फिर… वही पुरानी कहानी।

 

नेता कहते हैं—रणनीति जरूरी है।

जनता पूछती है—रोटी भी?

जवाब आता है—वो अगली मीटिंग में।

 

टीवी पर नक्शे चमकते हैं।

लाल तीर दौड़ते हैं।

स्टूडियो में जीत तय हो जाती है।

मैदान में इंसान हार जाता है।

 

बच्चा लाइन में खड़ा है।

हाथ में कटोरा है।

आंखों में सवाल है।

पर जवाब… कहीं और व्यस्त है।

 

स्कूल खामोश है।

ब्लैकबोर्ड खाली है।

चॉक घिस चुकी है।

सपने छुट्टी पर हैं।

 

अस्पताल भरा है।

दवा आधी है।

दर्द पूरा है।

और बजट… भाषण में है।

 

हर मौत एक आंकड़ा बनती है।

फाइल में फिट हो जाती है।

पर घर में जो सन्नाटा है—

उसका कोई कॉलम नहीं होता।

 

फिर घोषणा होती है—पुनर्निर्माण!

ताली बजती है।

ठेके निकलते हैं।

और मलबा “मौका” बन जाता है।

आपदा में अवसर।

 

युद्ध खत्म नहीं होता।

बस नाम बदलता है।

कभी ऑपरेशन।

कभी मिशन।

कभी “शांति प्रक्रिया”।

 

और इंसान?

वो हर बार वही रहता है—

टूटता हुआ।

छूटता हुआ।

और… भूलता हुआ।

 

क्योंकि अगला युद्ध

बस अगली हेडलाइन दूर है।

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