कविता
कितना आसान है
राजेश भारती
कितना आसान है
हाई-स्पीड ट्रेनों का उपलब्ध हो जाना गगनचुंबी इमारतों
विशालकाय मूर्तियों का खड़ा हो जाना।
और कितना आसान है
जनता का रक्त चूसकर
एक दिन थूक देना उसे
लाल किले की प्राचीर से
और दिखाना सब्ज़बाग़ ख़ुशहाली के
कितना आसान है।
कितना आसान है
यह कहना कि
तुम राम भजो
हम राज करेंगे
हम रखेंगे तुम्हारे कर्मों का लेखा-जोखा
और बनेंगे तुम्हारे भाग्य-विधाता।
जब सब कुछ इतना संभव है
तो क्यों दिखाई दे रहे हैं
धरती पर भूख के निशान ?
क्यों नहीं पढ़ा जा रहा
भूख से सूख कर मरी
अंतड़ियों का सुसाइड नोट?
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