फिल्म समीक्षा
दर्शकों को बेचैन करती फिल्मः द वॉयस ऑफ हिन्द रजब
महेश राजपूत
काउथेर बेन हानिया निर्देशित फिल्म “द वॉयस ऑफ हिन्द रजब” सिर्फ एक फिल्म नहीं है, यह एक दस्तावेज़ है, जो फिलिस्तीन में इजरायल के पिछले तीन सालों से किए जा रहे नरसंहार की भले एक ही घटना दर्शाता है लेकिन दर्शकों को बेचैन कर देता है। फिल्म समाप्त होने के बाद भी हिन्द रजब की मदद के लिए गुहार आपके ज़ेहन में गूंजती रहती है।
हिन्द रजब छह साल की भी नहीं थी, जब वह इजराइल डिफेंस फोर्सेज के हमले का शिकार हुई। परिवार के साथ वह कार में थी, जिस पर गोलियों की वर्षा की गई। कार पर लगभग 300 गोलियां चलाई गई थीं।
हिन्द रजब के रेड क्रिसेंट वॉलंटियरों के साथ फोन वार्ता, जिसमें वह परिजनों की लाशों के साथ कार की सीट के नीचे छिपी हुई, जान बचाने की गुहार लगा रही थी, पर बनी डॉक्यूड्रामा फिल्म वेनिस और बर्लिन फिल्मोत्सवों में पुरस्कृत हो चुकी है (बर्लिन फिल्मोत्सव का पुरस्कार हालांकि हानिया ने जूरी के “फिल्मोत्सव के मंच को अराजनीतिक बनाए रखने” के बयान को लेकर ठुकरा दिया था)।
फिल्म अकादमी पुरस्कारों की श्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म श्रेणी में भी नामांकित हुई थी हालांकि पुरस्कार नॉर्वे की सेंटीमेंटल वैल्यू को मिला।
खैर, ऑस्कर न मिलने के बावजूद इस फिल्म का महत्व कहीं से कम नहीं होता और इसे नाज़ी जर्मनी के समय यहूदियों के नरसंहार और द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि को लेकर बनी कई महान सिनेमाई कृतियों की पंक्ति में रखा जा सकता है।
फिल्म में हिन्द रजब की रिकॉर्डेड आवाज़ का ही इस्तेमाल किया गया है और रेड क्रिसेंट के वॉलंटियर के बताए विवरण पर आधारित स्क्रिप्ट बुनी गई है।
89 मिनट की फिल्म के दौरान आपकी सांस जैसे अटकी रहती है। भले आपको हिन्द रजब का फेट पता हो पर द्वन्द्व और तनाव इतना ज्यादा है कि आप स्क्रीन से नजर नहीं हटा पाते।
रेड क्रिसेंट के वॉलंटियरों की तरह अंत तक आप उम्मीद के खिलाफ उम्मीद करते हैं कि हिन्द रजब को बचा लिया जाएगा।
ओमर जो हिन्द रजब की कॉल रिसीव करता है और किसी भी तरह हिन्द रजब को बचाना चाहता है और उसका बॉस माहदी, जिसकी चिंता का केंद्र हिन्द रजब को बचाने के साथ साथ यह भी सुनिश्चित करना है कि बचाव टीम के सदस्य न मारे जाएं, के बीच टकराव में यह तय करना मुश्किल है कि कौन सही है।
यूं तो हिन्द रजब तक बचाव टीम केवल आठ मिनट में पहुंच सकती है लेकिन बचाव टीम इजराइली सेना का शिकार न हो जाए, इसके लिए मंजूरी हासिल करने का काम घंटों खिंच जाता है।
दो महिला वॉलंटियर भी फोन पर हिन्द रजब और दूसरे फोन पर उसकी मां को जिस तरह संभालने की कोशिश करती हैं, दर्शाता है कि खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करने के बावजूद किसी को आस बंधाने का कार्य कितना कठिन है।
फिल्म फिलिस्तीन में तीन वर्षों से जारी नरसंहार की एक झलक मात्र देती है। 7 अक्टूबर 2023 से अब तक फिलिस्तीन में 72, 000 लोग मारे जा चुके हैं जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे शामिल हैं। इस दौरान बमबारी में रिहायशी इमारतों, स्कूलों और अस्पतालों को भी नहीं छोड़ा गया और सैकड़ों डॉक्टरों, पैरामेडिक, नरसंहार का दस्तावेजीकरण करने वाले पत्रकारों को मारा गया।
कुछ महीने पहले सीजफायर की घोषणा के बाद भी 500 से अधिक लोगों को इजरायल डिफेंस फोर्सेज ने मारा है। गज़ा में नरसंहार के साथ एक पूरे इतिहास, संस्कृति का नामोनिशान मिटा दिया गया और अब इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर दिया है।
अब सवाल कि फिल्म कैसे देख सकते हैं। इजरायल से पीएम मोदी का याराना देखते हुए फिलहाल तो भारत में सिनेमाघरों में इसका आना मुश्किल ही लग रहा है। केंद्र द्वारा जब केरल, बैंगलुरु फिल्मोत्सवों में फिलिस्तीन की फिल्मों का प्रदर्शन रोका जा रहा है या रोकने की कोशिश की जा रही है तो ऐसे में इस फिल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शित कैसे होने दिया जाएगा? वैसे भी केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड मोदी सरकार के मिजाज को अच्छे से समझता है और जो फिल्में जरा भी सरकार की नजर में “संवेदनशील” होती हैं, उन्हें सेन्सर सर्टिफिकेट ही नहीं देता।
फ्री स्पीच कलेक्टिव की एक रिपोर्ट के अनुसार मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा पर बनी फिल्म पंजाब 95 को 120 से ज्यादा कट सेन्सर बोर्ड ने सुझाए, नतीजतन फिल्म अभी तक अटकी हुई है। इसी तरह ब्रिटिश फिल्मकार संध्या सूरी की फिल्म संतोष की सेन्सर सर्टिफिकेट न मिलने के कारण भारत में रिलीज नहीं हो पाई है। फिल्म एक दलित लड़की की बलात्कार के बाद हत्या की घटना और उसकी पुलिसिया जांच में लीपापोती पर आधारित है।
वापस, वॉयस ऑफ हिन्द रजब पर लौटते हैं। यह फिल्म सिनेमाघरों में जब आएगी, तब आएगी, अभी ऑनलाइन तो देखी जा सकती है और ग्रुप स्क्रीनिंग भी की जा सकती है, फिल्म की वेबसाइट के जरिए। इसके पहले कि फिल्म पर आधिकारिक बैन घोषित किया जाए, जिसकी कि कम ही सही लेकिन आशंका तो है ही, फिल्म देखी जानी चाहिए। जनचौक से साभार
