बहुत संयत, सुलझे हुए और टिके हुए हैं भीम सिंह सैनी

हरियाणा : जूझते जुझारू लोग- 80

बहुत संयत, सुलझे हुए और टिके हुए हैं भीम सिंह सैनी

सत्यपाल सिवाच

हरियाणा के उस दौर में जब कर्मचारी आन्दोलन निराशा और मायूसी से जूझ रहा था तब कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से ऐसा नेतृत्व उभरा जिसने शुरुआती दिनों में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्हीं में से एक नाम है भीम सिंह सैनी।

भले ही कुंटिया के अध्यक्ष श्री बाबूराम गुप्ता को एक लोकप्रिय कर्मचारी नेता की तरह पहचाना जाता रहा है, लेकिन उनकी टीम के विश्वस्त सहयोगी, धैर्यवान और सांगठनिक कौशल से ओतप्रोत भीमसिंह सैनी तत्कालीन महासचिव की भूमिका खास महत्व रखती थी।

वे रामस्वरूप सीरा जैसे जागरूक मित्र के साथ बिना शोरशराबे या दिखावे के योजनाओं को सिरे चढ़ाने का विशेष हुनर रखते थे। मैं उन दिनों राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कुरुक्षेत्र में हिन्दी शिक्षक नियुक्त हुआ था। इसलिए कुंटिया के छह-सात साल के धुआंधार संघर्ष का साक्षी रहा हूँ।

भीमसिंह सैनी का जन्म कैथल के पुंडरी कस्बे में श्रीमती कृष्णा देवी और सरदार तूही सिंह सैनी के घर 01.01.1944 को हुआ। उनके पिता जी उर्दू विषय के अध्यापक रहे और माँ घरेलू कार्यों के साथ कृषि व पशुपालन में सहयोग करती थी। उन्होंने गांव के विद्यालय से दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने ग्रेजुएशन उपाधि और लोकल सेल्फ गवर्नमेंट में एक वर्षीय डिप्लोमा किया।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में नौकरी से पहले कुछ अन्य स्थानों पर नौकरी की। सन् 1962 में तीन महीने के मिनिस्ट्री ऑफ फूड एंड रिहैबिलिटेशन में काम किया। 1962-69 दिल्ली नगर निगम में रहे तथा 1969-76 तक डी.ए.वी. कॉलेज पुंडरी में सेवाएं दी। वे 1976 में विश्वविद्यालय के कर्मचारी हो गए और 31.12.2003 को साठ साल की आयु होने पर अधीक्षक पद से सेवानिवृत्त हुए।

भीमसिंह सैनी में अन्याय के खिलाफ लड़ने और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए काम करने का जज्बा पहले से ही था। गांव में रहते हुए 1972-73 में उन्होंने नौजवान सभा का गठन किया था। उसके सदस्यों की संख्या 1400 थी।

जब वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आए तो अन्य साथियों के साथ कुंटिया (Kurukshetra University non-teaching Employees Association) में सक्रिय हो गए। सन् 1979 से 1982 तक कुंटिया के महासचिव रहे तथा सन् 1986 तक एसोसिएशन की वार्ता कमेटी के सदस्य रहे। यद्यपि वे बाद में पदाधिकारी नहीं रहे लेकिन विश्वविद्यालय और सर्वकर्मचारी संघ दोनों में पूरी गतिशीलता के लगे रहे।

विश्वविद्यालय कर्मचारियों का वह दौर प्रदेश के जुझारू संघर्षों के रूप में याद किया जाता है। सन् 1979 से 1986 तक नान-टीचिंग कर्मचारियों को बार बार हड़ताल पर जाना पड़ा। उसका कारण केवल विश्वविद्यालय प्रशासन की मनमानी या नौकरशाही अकड़ नहीं था, बल्कि राज्य सरकार की ओर से भी प्रशासन को आन्दोलन को दबाने का इशारा था।

इसके अतिरिक्त कैम्पस में वी सी और राज्य सरकार के चहेते तत्व गुण्डागर्दी व अराजकता की स्थिति बना रहे थे। महीनों-महीनों लम्बी और सात साल की अवधि में चली हड़तालों ने जिले के ही नहीं, पूरे राज्य के लोकतंत्र प्रेमी और कर्मचारी हितैषी नेतृत्व को उद्वेलित कर दिया था।

विश्वविद्यालय परिसर में ऐसे लोगों को संगठित करने में अन्य साथियों के साथ भीमसिंह सैनी एक मुख्य किरदार रहे। छात्रों, शिक्षकों और नान-टीचिंग स्टाफ – विश्वविद्यालय परिवार में नयी जागरूकता पैदा हो रही थी। यही वह दौर है जब प्रशासन व गुण्डा तत्वों से लड़ते हुए एस.एफ.आई. के राज्य अध्यक्ष जसबीर सिंह की शहादत हुई। उस दौर में व्यक्तियों की चर्चा होगी तो बाबूराम गुप्ता के साथ भीम सिंह सैनी का नाम जरूर लिया जाएगा।

विश्वविद्यालय कर्मचारियों की लड़ाई सामान्य गेट मीटिंग के बाद हड़ताल तक पहुंची। सन् 1979 में 11 दिन, 1980 में 72 दिन, 1981 में 40 दिन, और 1986 में 86 दिन की हड़ताल हुई। प्रशासन ने निलंबन, गिरफ्तारी, बर्खास्तगी आदि के जरिए डराने की कोशिश की। यहाँ तक कि स्वयं मुख्यमंत्री बंसीलाल ने वार्ता के लिए बुलाकर अरेस्ट करवा दिया। अन्य साथियों के साथ ये डरे नहीं, डटे रहे।

सरकार के जुल्मोसितम को देखकर बाहर के कर्मचारी मदद में आ गए तो अन्ततः शासन को कर्मचारियों की मांगें माननी पड़ी और उत्पीड़न की कार्रवाइयां निरस्त की गई। मुझे याद है कि उस दौर में विश्वविद्यालय के लोग आस-पास के गांवों और शहर की बस्तियों में जाकर जनवादी आन्दोलन को खड़ा करने में मदद कर रहे थे। भीमसिंह उस योजना में अगुवा भूमिका में थे।

इस पृष्ठभूमि में सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा का गठन हुआ जिसने राज्य की फिज़ा ही बदल दी। उससे पहले ही 1983 में राज्य के कर्मचारियों को एकजुट करने का विमर्श चल रहा था। ट्रेड यूनियन के स्तर पर जागरूक नेताओं ने एक सब-कमेटी बनाई जिसमें बिजली बोर्ड के भूपसिंह बेनीवाल व यादराम, कुंटिया के भीमसिंह सैनी और अध्यापक संघ से सत्यपाल सिवाच को शामिल किया गया था। उसी विमर्श, कुरुक्षेत्र, करनाल व सिरसा के ट्रेड यूनियन काऊंसिल/कर्मचारी संगठनों के अनुभव से साझा आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

संघ के गठन के बाद भीम सिंह सैनी कुरुक्षेत्र में सक्रिय रहे और आन्दोलन में सांगठनिक स्तर पर भूमिका निभाते रहे। वे कई तक चण्डीगढ़ के मोर्चे पर भी हमारे साथ रहे। वे पद की दौड़ से दूर रहते थे लेकिन जिम्मेदारी दिए जाने पर दिलोजान से निभाते हैं।

राजनेताओं से संपर्क को याद करते हुए वे बताते हैं कि माकपा के तत्कालीन राज्य सचिव कामरेड रघबीर सिंह हुड्डा और स्थानीय विधायक अशोक अरोड़ा से उनके सम्बन्ध रहे हैं। वरिष्ठ अधिकारियों में बलबीर सिंह मलिक आईएएस, प्रदीप कासनी आईएएस, नकई आईपीएस आदि से उनके संपर्क रहे हैं। कभी किसी नेता या अधिकारी से निजी काम लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

वे आन्दोलन के अनुभवों के आधार पर बताते हैं कि ईमानदारी, पारदर्शिता और जनवादी कार्यप्रणाली जरूरी है। निरन्तर सांगठनिक शिक्षा के बिना भटकाव की संभावना रहती है। केवल आर्थिक माँगों तक सीमित न रहकर कर्मचारियों को समाज के प्रति लगाव और राजनीतिक समझ प्राप्त करनी चाहिए। मन, वचन, कर्म से किसी को आघात न पहुंचाएं, जुल्म के खिलाफ लड़ें, अपनी आय के अनुसार किफायती ढंग से रहना सीखें और दूसरों के साथ सहयोग को प्रमुखता दें। यह सब बातें उन्होंने अपने ऊपर लागू की हैं।

वे कर्मचारी नेता ही नहीं, बल्कि कर्मचारी के रूप में अपनी ड्यूटी के प्रति भी ईमानदार और लग्नशील रहे। अपनी सीट के काम साफ-सुथरे और समयबद्ध ढंग से निपटाना उनकी पहचान थी। एसिस्टेंट और सुपरिटेंडेंट के रूप में उन्हें रिजल्ट ब्रांच या अकाउंटस् ब्रांच जहाँ भी लगा दिया उसी के रिकॉर्ड को चमका दिया। इसी तरह निजी जीवन, परिवार और मित्रों के बीच भी उनकी पहचान अनुशासन, आत्मीयता और भरोसे की है। मैंने उन्हें बहुत करीब से देखा है। विचारधारा से वे प्रगतिशील, समतावादी और मार्क्सवादी हैं। वे लफ्फाजी में नहीं, अमल करने में विश्वास करते हैं।

वे महसूस करते हैं कि अब लगातार स्कूलिंग और प्रशिक्षण का कार्य होता नहीं दिख रहा है। कार्यकर्ताओं के चयन में ठोस मूल्यांकन की बजाए सलैक्टिव अप्रोच देखी जा रही है। हिसाब किताब रखने में पारदर्शिता को और अधिक तवज्जो देने की जरूरत है। वह जनवादी कार्यप्रणाली का जरूरी काम है। “सादा जीवन – उच्च विचार” हमारा आदर्श हो सकता है।

भीम सिंह सैनी का मानना है कि कार्यकर्ताओं की पदोन्नति या अवनति गुणदोष की विवेचना के अनुरूप होगी तो उचित रहेगा। उनका सुझाव है कि राज्य नेतृत्व को कमजोर जिलों में जाकर विशेष कोशिश करनी चाहिए। इसके साथ-साथ खेलों के महत्व को अंगीकार करें जो हमें अनुशासन, टीम वर्क और जनतांत्रिक कार्यशैली सिखाते हैं।

भीम सिंह सैनी की एक विशेषता यह रही कि उन्होंने हर कदम पर परिवार से विचार विमर्श किया। जिसके कारण उन्हें परिवार की ओर से पूरा सहयोग मिला। उन्होंने सन् 1964 में श्रीमती कमलेश से विवाह किया। वे भी कुरुक्षेत्र में जनवादी महिला समिति की अध्यक्ष रही हैं। उनकी पाँच संतान हैं – तीन बेटियां और दो बेटे। बड़ी बेटी सुनीता इतिहास में एम.ए. एम.फिल. और बी.एड. हैं तथा स्कूल प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुई हैं। दूसरी सुदेश भी एम.ए. , जेबीटी और बी.एड. हैं और वे भी अतिथि शिक्षक पद से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। छोटी मधुबाला भी पोस्ट ग्रेजुएट हैं और वे सेवा में नहीं हैं। बड़े बेटे विनय ने एम.ए. अर्थशास्त्र, एम.कॉम. कम्प्यूटर साईंस में एम.एससी. और टूरिज्म व होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया और 20.06.2024 को हृदयाघात से उनका आकस्मिक निधन हो गया। छोटा बेटा सुखदेव सिंह प्राचीन इतिहास, पुरातत्व और संस्कृति में पी.एचडी. है और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है। सौजन्य -ओमसिंह अशफ़ाक

लेखक – सत्यपाल सिवाच

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