ऋत्विक घटक की अजांत्रिकः मानवीय भावलोक की एक करुण, चमकती हुई स्मृति

सिनेमा संसार

ऋत्विक घटक की अजांत्रिकः मानवीय भावलोक की एक करुण, चमकती हुई स्मृति

उर्वशी

ऋत्विक घटक की 1958 की फिल्म ‘अजांत्रिक’ भारतीय सिनेमा की उन विरल कृतियों में है, जो समय के साथ पुरानी नहीं होतीं — बल्कि और अधिक अर्थवान हो जाती हैं। यह फिल्म तकनीकी प्रगति के चमकीले शोर के बीच छूटते जा रहे मानवीय भावलोक की एक करुण, चमकती हुई स्मृति है। यहाँ कथा मनुष्य की नहीं, मशीन की नहीं — बल्कि मनुष्य और मशीन के बीच जन्मी आत्मीयता की है।

एक जर्जर, थकी हुई, पुरानी शेवरले कार — ‘जगद्दल’ — इस फिल्म में वस्तु नहीं, चरित्र है। वह चलती-फिरती धातु नहीं, एक जीवित उपस्थिति है। और उसका मालिक बिमल — छोटानागपुर की पथरीली धरती पर टैक्सी चलाने वाला एक साधारण आदमी — दरअसल आधुनिक सभ्यता की उस त्रासदी का प्रतीक है, जहाँ मनुष्य भी धीरे-धीरे वस्तु में बदलता जा रहा है, पर वस्तुएँ स्मृतियों से भरकर मानवीय हो उठती हैं।

बिमल अकेला है। उसके जीवन में न कोई परिवार का विस्तार है, न भावनात्मक सहारा। लेकिन उसके पास जगद्दल है। वह उससे झुँझलाता है, उसे डाँटता है, पुचकारता है, उससे बातें करता है — जैसे दो बूढ़े साथी, जिन्होंने जीवन की धूल साथ खाई हो। घटक इस रिश्ते को कभी हास्यास्पद नहीं बनने देते। वे इसे एक गहरी मानवीय ज़रूरत की तरह प्रस्तुत करते हैं — जुड़ाव की ज़रूरत, चाहे वह किसी मनुष्य से हो या किसी निर्जीव वस्तु से।

फिल्म की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ध्वनि-संरचना है। जगद्दल का चरमराना, इंजन की काँपती आवाज़, धातु की थकी हुई खनक — ये सिर्फ यांत्रिक ध्वनियाँ नहीं हैं; ये बिमल के भीतर की थकान, टूटन और अनकहे अकेलेपन की प्रतिध्वनियाँ हैं। घटक संगीत नहीं सजाते, वे ध्वनियों से ही संगीत रचते हैं। हवा, सन्नाटा, मशीन — सब मिलकर एक ऐसी ध्वन्यात्मक कविता रचते हैं, जहाँ संवादों से अधिक मौन बोलता है।

बिमल की यात्राएँ सड़कों पर कम, अपने भीतर अधिक घटती हैं। हर सफ़र जैसे जीवन के अर्थ की खोज है। और जब अंततः जगद्दल को स्क्रैप के लिए ले जाया जाता है, तो वह दृश्य सिर्फ एक कार की विदाई नहीं — एक युग के भावलोक का अंतिम संस्कार है। वह क्षण बिमल के भीतर के उस हिस्से की मृत्यु है, जहाँ स्मृति, स्नेह और निर्बल मनुष्य की छोटी-सी दुनिया बसी थी।

फिल्म यह प्रश्न उठाती है —

क्या आधुनिकता हमें सुविधाएँ देकर हमारी संवेदनाएँ छीन लेती है?

क्या विकास की रफ़्तार में हम उन वस्तुओं, संबंधों और स्मृतियों को खो देते हैं, जिनसे हमारी आत्मा बनी होती है?

‘अजांत्रिक’ दरअसल खोने के शोक की फिल्म है। उन चीज़ों के लिए शोक, जिन्हें दुनिया बेकार समझकर फेंक देती है — पर जिनमें किसी का पूरा जीवन धड़कता रहा होता है। बिमल का जगद्दल से प्रेम मूर्खता नहीं, बल्कि उस गहरी मानवीय आकांक्षा का प्रमाण है, जहाँ मनुष्य, पूरी दुनिया से कट जाने के बाद भी, किसी न किसी से जुड़कर जीवित रहना चाहता है।

ऋत्विक घटक यहाँ सिर्फ फिल्मकार नहीं, एक करुण दार्शनिक की तरह उपस्थित हैं। वे हमें बताते हैं —

सभ्यता आगे बढ़ती है, पर मनुष्य पीछे छूटता जाता है।

और उस छूटते मनुष्य की सबसे धीमी, सबसे सच्ची आवाज़ है — अजांत्रिक।

यह फिल्म भारतीय सिनेमा में एक मूक किंतु अमिट प्रतिध्वनि है —

विकास के कोलाहल में दबा हुआ वह स्वर,

जो अब भी सुनाई देता है…

अगर हम थोड़ी देर रुककर सुनना चाहें।

डॉ उर्वशी के फेसबुक वॉल से साभार

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