सिनेमा
भूपेन हजारिका : उज्ज्वल व अविस्मरणीय अध्याय
राम आह्लाद चौधरी
भूपेन हजारिका (8 सितंबर 1926 – 5 नवंबर 2011) भारतीय सांस्कृतिक जगत के एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे गायक, गीतकार, लेखक, फिल्म निर्माता और राजनीतिज्ञ के रूप में समान रूप से प्रतिष्ठित रहे। उन्होंने मुख्यतः असमिया भाषा में गीतों की रचना की और उन्हें स्वर दिया। उनके गीत मानवता, करुणा और सार्वभौमिक भाईचारे की भावना से गहराई से अनुप्राणित हैं।
भूपेन हजारिका के गीतों का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ, जिनमें हिंदी और बंगाली प्रमुख हैं। सांप्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याय और मानवीय सहानुभूति जैसे विषयों पर आधारित उनके गीत असम, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के लोगों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय रहे। हिंदी सिनेमा के माध्यम से उन्होंने असम और पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति तथा लोकसंगीत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्हें 1975 में सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1987), पद्म श्री (1977), पद्म भूषण (2001), दादा साहब फाल्के पुरस्कार (1992) — जो भारत में सिनेमा के क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान है — तथा संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप (2008), अकादमी का सर्वोच्च पुरस्कार, प्रदान किया गया।
भूपेन हजारिका को मरणोपरांत 2012 में भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण और 2019 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया। उन्होंने दिसंबर 1998 से दिसंबर 2003 तक संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष के रूप में भी सेवाएँ प्रदान की।
सच तो यह है कि महान स्रष्टा भूपेन हजारिका के स्वरों में उत्पीड़न की सच्चाई विद्यमान है।इस दृष्टि से विचार करने पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि
मार्क्सवादी सांस्कृतिक आलोचना यह मानती है कि कला और संस्कृति किसी निरपेक्ष, तटस्थ या आत्मनिर्भर क्षेत्र में उत्पन्न नहीं होतीं। वे सामाजिक उत्पादन संबंधों, वर्ग-संघर्ष और सत्ता संरचनाओं से गहराई से जुड़ी होती हैं। संस्कृति या तो वर्चस्वशाली वर्ग की विचारधारा को स्वाभाविक और शाश्वत बनाती है, या फिर वह उत्पीड़ित वर्गों की चेतना को स्वर देकर प्रतिरोध का औज़ार बनती है। भूपेन हजारिका का संगीत स्पष्टतः दूसरी परंपरा से जुड़ा हुआ है। उनके स्वरों में जो “सच” व्यक्त होता है, वह शासक वर्ग द्वारा गढ़ा गया आधिकारिक सच नहीं, बल्कि शोषित वर्गों के जीवनानुभव से निकला हुआ ऐतिहासिक सच है। इसीलिए भूपेन हजारिका को केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि जनसंघर्षों से संबद्ध सांस्कृतिक कर्मी के रूप में समझना आवश्यक है। लोकसंस्कृति को अक्सर शासक वर्ग द्वारा “पिछड़ा” या “अराजनीतिक” बताकर हाशिए पर डाल दिया जाता है। किंतु भूपेन हजारिका लोकसंस्कृति को वर्ग-संघर्ष की जीवंत स्मृति के रूप में ग्रहण करते हैं। असम की ब्रह्मपुत्र घाटी—जहाँ उनका सृजन विकसित हुआ—औपनिवेशिक शोषण, सामंती अवशेषों और पूँजीवादी विकास की असमानताओं का क्षेत्र रही है। यहाँ किसान, मछुआरे, नाविक और जनजातीय समुदाय लगातार विस्थापन, गरीबी और राज्य की उपेक्षा का शिकार रहे हैं। भूपेन हजारिका के गीत इस वर्गीय यथार्थ को सौंदर्यशास्त्रीय आवरण में छिपाते नहीं, बल्कि उजागर करते हैं। उनके यहाँ लोकगीत शासक वर्ग की संस्कृति का पूरक नहीं, बल्कि उसका विकल्प बनते हैं। भूपेन हजारिका के गीतों में बार-बार नदी का प्रतीक उभरता है। मार्क्सवादी आलोचना के संदर्भ में नदी यहाँ केवल प्रकृति नहीं, बल्कि श्रम का भूगोल है।
जिस तरह पॉल रॉब्सन के यहाँ मिसिसिपी नदी अश्वेत श्रमिकों के शोषण की साक्षी है, उसी तरह भूपेन हजारिका के यहाँ ब्रह्मपुत्र नदी मेहनतकश जनता के दुःख और संघर्ष की ऐतिहासिक साक्षी बन जाती है—
“बिस्तीर्णो पारोरे, असंख्य जनोरे/हाहाकार शुनीओ…”
यह “हाहाकार” किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि वर्गीय उत्पीड़न का परिणाम है। नदी यहाँ उत्पादन-प्रक्रिया से जुड़ी है—वह श्रम को ढोती है, लेकिन श्रमिक को उसका न्याय नहीं दिला पाती। यही पूँजीवादी व्यवस्था का मूल अंतर्विरोध है, जिसे भूपेन हजारिका अपने स्वरों में उजागर करते हैं।
भूपेन हजारिका उत्पीड़न को नैतिक पतन या व्यक्तिगत दुर्भाग्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करते। मार्क्सवादी चेतना के अनुरूप वे इसे सामाजिक-आर्थिक संरचना का परिणाम मानते हैं।गरीबी, विस्थापन और बेरोज़गारी उनके गीतों में किसी “भाग्य” की देन नहीं, बल्कि भूमि, संसाधनों और श्रम पर पूँजी और राज्य के नियंत्रण का नतीजा हैं।
यह दृष्टि उन्हें भावुक मानवतावाद से अलग करती है और उनके संगीत को राजनीतिक अर्थ देती है। उनके गीत यह प्रश्न उठाते हैं कि विकास किसके लिए है और उसकी कीमत कौन चुका रहा है।
मुख्यधारा की लोकप्रिय संस्कृति नायकों को अभिजात वर्ग से चुनती है—राजा, नेता, प्रेमी या उपभोक्ता। इसके विपरीत, भूपेन हजारिका के यहाँ इतिहास का नायक श्रमिक वर्ग है।
नाव खेने वाला मजदूर, खेत में काम करता किसान, शहर की रोशनी से दूर खड़ा श्रमजीवी—ये सभी उनके गीतों के केंद्र में हैं।यह चयन मार्क्सवादी अर्थों में वर्गीय पक्षधरता का संकेत है। भूपेन हजारिका इतिहास को ऊपर से नहीं, नीचे से देखते हैं—यानी शोषित वर्गों की दृष्टि से। उत्तर-पूर्व भारत लंबे समय से भारतीय राष्ट्र-राज्य की राजनीतिक और सांस्कृतिक परिधि पर रखा गया क्षेत्र रहा है। भूपेन हजारिका के गीत इस क्षेत्रीय और जातीय शोषण की ओर भी संकेत करते हैं।
हालाँकि वे जाति या नस्ल का नाम लेकर नारेबाज़ी नहीं करते, लेकिन उनके स्वरों में हाशिए पर धकेले गए समुदायों की पीड़ा स्पष्ट रूप से मौजूद है।
मार्क्सवादी आलोचना के अनुसार, यह मौन शोषण पूँजीवादी राष्ट्र-राज्य की एक रणनीति है,जहाँ असमानता को सामान्य और अदृश्य बना दिया जाता है। भूपेन हजारिका का संगीत इस अदृश्यता को तोड़ता है। “हम होंगे कामयाब” दरअसल वर्गीय आशा का गीत है। “हम होंगे कामयाब एक दिन” को यदि मार्क्सवादी दृष्टि से पढ़ा जाए, तो यह केवल आशावाद नहीं, बल्कि वर्गीय चेतना का गीत है। यह गीत बताता है कि इतिहास स्थिर नहीं है; वह संघर्ष से आगे बढ़ता है। शोषण शाश्वत नहीं, बल्कि परिवर्तनशील है।
इस गीत की सामूहिकता—“हम”—पूँजीवादी व्यक्तिवाद के विरुद्ध खड़ी होती है। यह “मैं” की जगह “हम” को स्थापित करती है, जो मार्क्सवादी राजनीति का मूल आधार है। उल्लेखनीय है कि मार्क्सवादी सिद्धांत में कला को अधिरचना (superstructure) का हिस्सा माना जाता है, जो आधार (base) यानी उत्पादन संबंधों से प्रभावित होती है। लेकिन भूपेन हजारिका की कला केवल आधार की परछाईं नहीं है; वह अधिरचना के भीतर से प्रतिरोध की संभावना को साकार करती है। वे यह सिद्ध करते हैं कि कलाकार यदि वर्गीय यथार्थ को समझे, तो वह प्रभुत्वशाली विचारधारा को चुनौती दे सकता है। इसीलिए भूपेन हजारिका सत्ता के सांस्कृतिक उपकरण नहीं बनते, बल्कि उसके आलोचक बनते हैं।
पूँजीवादी व्यवस्था संस्कृति को भी माल में बदल देती है। दुःख, प्रेम और संघर्ष—सब कुछ बिकाऊ बन जाता है। भूपेन हजारिका का संगीत इस बाज़ारवादी तर्क का प्रतिरोध करता है। वे उत्पीड़न को “उत्पाद” नहीं बनाते, बल्कि उसे राजनीतिक प्रश्न में बदलते हैं।
यही कारण है कि उनका संगीत आज भी प्रासंगिक है, जबकि बाज़ार-निर्मित कई लोकप्रिय कृतियाँ समय के साथ खोखली हो जाती हैं।
सांस्कृतिक प्रतिरोध की परंपरा को आगे बढ़ाने में भूपेन हजारिका की छवि उज्ज्वल है। मार्क्सवादी सांस्कृतिक आलोचना के ढाँचे में भूपेन हजारिका का मूल्यांकन हमें यह समझने में मदद करता है कि वे क्यों एक महान स्रष्टा हैं। उनके स्वरों में उत्पीड़न का सच किसी व्यक्तिगत करुणा का परिणाम नहीं, बल्कि वर्गीय चेतना और ऐतिहासिक समझ की उपज है।
भूपेन हजारिका का संगीत हमें यह सिखाता है कि संस्कृति या तो शोषण को वैध ठहराती है, या फिर उसे चुनौती देती है। उन्होंने स्पष्ट रूप से दूसरा रास्ता चुना।
इसी अर्थ में, भूपेन हजारिका का सृजन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में जनपक्षधर प्रतिरोध की परंपरा का एक उज्ज्वल और अविस्मरणीय अध्याय है।
(लेखक साहित्य, समाज और संस्कृति के अध्येता हैं)

लेखक – राम आह्लाद चौधरी
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