साहित्य मेले (लिट फेस्ट ) और हिन्दू धर्म

साहित्य मेले (लिट फेस्ट ) और हिन्दू धर्म

जगदीश्वर चतुर्वेदी

साहित्य मेले वस्तुतः मासकल्चर के पैकेज में हो रहे हैं। कल तक साहित्य, संस्कृति का हिस्सा था,लेकिन साहित्यमेलों ने इसे मासकल्चर का अंग बना दिया है। साहित्यमेले वस्तुतःटाइमपास के पैकेज का अंग हैं।यह परिवर्तन साहित्य का अवमूल्यन है।
दिलचस्प है विभिन्न नगरों में साहित्य मेले हो रहे हैं लेकिन साहित्य के सवाल गायब हैं ,किताबों का करोड़ों का व्यापार हो रहा है।लेखक-अलेखक बड़ी संख्या में हिस्सा ले रहे हैं ,लेकिन साहित्य की समस्याओं पर कोई गर्मी समाज में नहीं दिख रही,मुंबईया फिल्म उद्योग की तरह अब साहित्य-साहित्यकारों ने भी मीडियामार्ग पकड़ लिया है। साहित्य मेले से लेखक-पाठक वैसे ही खाली हाथ लौट रहे हैं जिस तरह सिनेमाहॉल से दर्शक लौटते हैं।
सवाल यह है साहित्य चर्चा से जीवन के दुख गायब कैसे हो गए ?
मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं उन दु:खों का प्रहाण अपने सही ज्ञान द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता। सत्य या यथार्थता का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है। अत: सत्य की खोज दु:खमोक्ष के लिए परमावश्यक है।
खोज अज्ञात सत्य की ही की जा सकती है। यदि सत्य किसी शास्त्र, आगम या उपदेशक द्वारा ज्ञात हो गया है तो उसकी खोज नहीं। अत: बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को नकार दिया और अपने लिए नए सिरे से उसकी खोज की। बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न तो अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा। उन्होंने कहा कि मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कही है। उस पर भी सन्देह करो और विविध परीक्षाओं द्वारा उसकी परीक्षा करो। जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो, यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो।
यही कारण था कि उनका धर्म रहस्याडम्बरों से मुक्त, मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत एवं हृदय को सीधे स्पर्श करता था। हिन्दू धर्म आडम्बरपूर्ण जीवन से मुक्त नहीं करता। प्रश्नाकुलता पैदा नहीं करता। साहित्य मेले हिन्दू धर्म और मासकल्चर के प्रभाव में हैं यही वजह है साहित्य अब प्रश्नाकुलता पैदा नहीं करता।

जगदीश्वर चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार

लेखक – जगदीश्वर चतुर्वेदी

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